
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Written By: Vidya Sharma | Updated : January 29, 2026 6:42 PM IST
Medically Verified By: Dr. Malini Saba
Gen Z Or Millennial Ke Bich Difference: आजकल आपको दो शब्द बहुत ही ज्यादा सुनने को मिल रहे होंगे, यह हैं जेन जी और मिलेनियल्स। जेन जी वह होते हैं जो 1997–2012 के साल में जन्में होते हैं। वहीं 1965 से 1980 के सन में जन्मे लोग मिलेनियल्स कहलाते हैं। जेन जी और मिलेनियल्स का जिक्र वर्क कल्चर में सबसे अधिक देखने को मिलता है, क्योंकि एक ओर जहां मिलेनियल्स पूरी जी जान से ऑफिस का काम करते हैं और अपने पूरे एफर्ट्स डालते हैं। वहीं जेन जी सिर्फ उतना ही काम करते हैं जितना उनसे हो सकता है। वह काम का ज्यादा प्रेशर नहीं लेते हैं।
ऐसे में आज के ऑफिस कल्चर में अक्सर यह सवाल उठता है आखिर जेन ज़ी (Gen Z) को काम का प्रेशर ज्यादा क्यों लगता है? जबकि मिलेनियल पीढ़ी अतिरिक्त काम भी संभाल लेती है। कई लोग इसे आलस या कमजोरी से जोड़ देते हैं, लेकिन मनोविज्ञान के अनुसार इसके पीछे गहरे सामाजिक और मानसिक कारण होते हैं। साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर मालिनी सबा कहती हैं कि हर पीढ़ी का मानसिक ढांचा उसके समय, माहौल और अनुभवों से बनता है। इसलिए दोनों पीढ़ियों की तुलना करते समय उनके बैकग्राउंड को समझना जरूरी है।
मिलेनियल्स ने ऐसा समय देखा है जहां नौकरी मिलना बड़ी उपलब्धि थी, लंबे घंटों तक काम करना सामान्य माना जाता था और 'काम पहले, आराम बाद में' की सोच थी। वहीं जेन ज़ी ऐसे दौर में बड़ी हुई है जहां मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात होती है, वर्क-लाइफ बैलेंस को महत्व दिया जाता है, काम के साथ खुश रहना भी जरूरी माना जाता है। इसलिए जेन ज़ी दबाव को पहचानती है और उसे नजरअंदाज नहीं करती।

मिलेनियल अक्सर सोचते हैं: ‘काम करना है तो करना है।’ जबकि जेन ज़ी जनरेशन पूछती है कि यह काम क्यों जरूरी है? क्या यह मेरी भूमिका का हिस्सा है? इससे मेरे मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा? आदि-आदि। डॉक्टर सबा के अनुसार, सवाल पूछना विद्रोह नहीं बल्कि जागरूकता का संकेत है। यही कारण है कि कुछ कंपनियां जेन जी को जॉब पर कम रख रही हैं।
जेन ज़ी पूरी तरह डिजिटल युग में पली-बढ़ी है। वह पूरे दिन सोशल मीडिया, 24×7 ऑनलाइन रहने की उम्मीद, लगातार तुलना और प्रदर्शन का दबाव महसूस करते हैं। जिससे ऑफिस का काम खत्म होने के बाद भी दिमाग बंद नहीं हो पाता। यह मानसिक थकानजेन ज़ी में जल्दी दिखती है।
वहीं मिलेनियल्स ने ‘एडजस्ट करना’ सीखा है। वह कम संसाधनों में काम करना जानते हैं, बॉस की बात चुपचाप मान लेते हैं, तनाव को दबाकर आगे बढ़ना जानते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें तनाव नहीं हुआ- बस उन्होंने उसे कभी जाहिर नहीं किया। मिलेनियल्स के लिए डॉ. सबा बताती हैं कि दबा हुआ तनाव आगे चलकर थकान, चिड़चिड़ापन और स्वास्थ्य समस्याओं में बदल सकता है।
डॉक्टर सबा कहती हैं कि जेन ज़ी यह मानती है कि हर काम तुरंत करना जरूरी नहीं, ‘ना’ कहना भी ठीक है, जरूरत पड़े तो ब्रेक लेना गलत नहीं आदि। यह आदत कुछ लोगों को कमजोरी लग सकती है, लेकिन असल में यह स्वस्थ कार्य संस्कृति की ओर इशारा करती है।
डॉ. मालिनी सबा के अनुसार, अगर ऑफिस दोनों पीढ़ियों को समझे तो मिलेनियल्स का अनुभव और जेन ज़ी की मानसिक जागरूकता मिलकर एक बेहतर, संतुलित और टिकाऊ वर्क कल्चर बना सकते हैं।
डॉ. मालिनी सबा कहती हैं, ‘हर पीढ़ी अपने समय की सच्चाई के साथ आगे बढ़ती है। किसी को कमजोर या मजबूत कहना, समस्या को समझे बिना किया गया निष्कर्ष होता है।’
Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।