
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Written By: Vidya Sharma | Updated : April 23, 2026 9:53 AM IST
Medically Verified By: Dr. Malini Saba
Image credits by: चेरोफोबिया क्या होता है?
Cherophobia Ke Kya Lakshan Hote Hain: आजकल मृणाल ठाकुर और सिद्धार्थ चतुर्वेदी की नई फिल्म 'दो दीवाने शहर में' खूब चर्चा में है। इसकी स्टोरी बहुत ही ज्यादा प्यारी है। क्योंकि यह एक कॉमेडी और रोमेंटिक फिल्म है, इसलिए जैन जी से लेकर मिलेनियल तक, हर कोई इसे पसंद कर रहा है और अपना प्यार ढूंढ रहा है। लेकिन इस फिल्म की कहानी सिर्फ प्यार पर जाकर ही खत्म नहीं होती है, बल्कि इसमें एक ऐसे डर या फीलिंग की बात की है, जिसके बारे में कोई बात नहीं करता, लेकिन फील जरूर करता है।
हम बात कर रहे हैं चेरोफोबिया की, शायद आप इसका नाम ही पहली बार सुन रहे होंगे। बता दें कि यह एक अनोखी मानसिक स्थिति है। मृणाल ठाकुर ने अपनी इस फिल्म में एक चेरोफिबिक का पात्र निभाया है। यानी कि एक ऐसी लड़की जो खुश तो होती है, लेकिन साथ ही उसके दिल में आने वाले दुख का ख्याल भी पैदा हो जाता है। आपको ये लाइन पढ़ के ऐसा लग रहा होगा न कि ‘अरे ये तो मेरी ही बात हो रही है।’ आइए साइकोलॉजिस्ट और महिला एवं मानवाधिकारों की समर्थक डॉक्टर मालिनी सबा से जानते हैं आखिर यह चेरोफोबिया यानी 'खुशी से डर' क्या है।
चेरोफोबिय शब्द ग्रीक शब्द 'Chairo' से आया है, जिसका मतलब है 'खुशी'। सीधे शब्दों में कहें तो यह खुश होने का डर है। इसमें इंसान को खुशी से नफरत नहीं होती, बल्कि उसे यह डर सताता है कि अगर वह बहुत ज्यादा खुश हुआ या उसने मजे किए, तो पक्का कुछ बहुत बुरा होने वाला है। इसे 'Aversion to happiness' भी कहा जाता है।
चेरोफोबिया से जूझ रहा व्यक्ति कुछ इस तरह व्यवहार कर सकता है-
पार्टी या सोशल इवेंट्स से बचना- उन्हें लगता है कि बाहर जाकर एन्जॉय करना 'खतरे की घंटी' है।
अच्छे मौकों पर घबराहट- लाइफ में जब कुछ बहुत अच्छा होता है (जैसे प्रमोशन या नया रिश्ता), तो वे खुश होने के बजाय एंग्जायटी महसूस करने लगते हैं।
खुशी को 'अपशकुन' मानना- उन्हें लगता है कि ज्यादा हंसने के बाद रोना ही पड़ेगा।
गिल्ट महसूस करना- उन्हें लगता है कि खुश रहना एक तरह की बुराई है या वे इसके लायक नहीं हैं।
चेरोफोबिया अचानक नहीं होता, इसके पीछे गहरे मानसिक कारण हो सकते हैं-
बचपन का ट्रॉमा- अगर किसी ने बचपन में ऐसा कुछ झेला हो कि जब भी वह खुश हुआ, उसके तुरंत बाद कुछ दर्दनाक घट गया, तो उसका दिमाग खुशी को दर्द से जोड़ लेता है।
परफेक्शनिज्म- कई बार बहुत ज्यादा 'परफेक्ट' बनने की चाहत रखने वाले लोगों को लगता है कि मजे करना वक्त की बर्बादी है।
पनिशमेंट का डर- कुछ लोगों को लगता है कि 'ब्रह्मांड' या 'किस्मत' उनसे खुशी का बदला लेगी।
जी हां, बिल्कुल! यह कोई लाइलाज बीमारी नहीं है, बल्कि एक 'डिफेंस मैकेनिज्म' है जिसे बदला जा सकता है-
CBT (Cognitive Behavioral Therapy)- इसमें डॉक्टर मरीज की गलत सोच (जैसे- "खुशी के बाद दुख आएगा") को पहचानने और उसे बदलने में मदद करते हैं।
एक्सपोजर थेरेपी- धीरे-धीरे छोटे-छोटे खुशी के पलों को बिना डरे जीना सिखाया जाता है।
पास्ट ट्रॉमा पर काम करना- पुरानी बुरी यादों को सुलझाकर इस डर को जड़ से खत्म किया जा सकता है।
मनोविज्ञान में इसे अक्सर एंग्जायटी डिसऑर्डर से जोड़कर देखा जाता है। अगर फिल्म में मृणाल ठाकुर का किरदार इस दौर से गुजर रहा है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि कैसे एक इंसान अपनी ही खुशी का दुश्मन बन जाता है। क्या आपने कभी महसूस किया है कि बहुत ज्यादा हंसने के बाद अचानक मन में डर बैठ गया हो कि "अब कुछ बुरा होगा"? यह चेरोफोबिया की एक हल्की झलक हो सकती है।
निष्कर्ष- कभी-कभी बुरी चीजों का आभास होना सामान्य है, यह मानव प्रवृत्ति है, लेकिन अगर आपको हर बार खुशियां आने पर डर लगता है। ऐसा महसूस होता है कि खुशी के बाद कुछ न कुछ बुरा हो जाएगा या वह ज्यादा खुश हुआ तो फिर पक्का कुछ न कुछ बुरा होगा, तो ऐसी स्थिति में किसी अच्छी साइकोलॉजिस्ट या साइकेट्रिस्ट के पास जाएं।
व्यक्ति को सांस लेने में तकलीफ, चक्कर आना, सिर हल्का महसूस होना और कंपकंपी महसूस होती है। उन्हें लगता है कि वे अपना नियंत्रण खो रहे हैं और उनकी हृदय गति तेज हो जाती है।
व्यक्तियों को खुशी के विचार मात्र से ही अत्यधिक भय का अनुभव हो सकता है, जिसके परिणामस्वरूप अक्सर खुशी के क्षणों के दौरान हृदय गति में वृद्धि, पसीना आना या मतली जैसे शारीरिक लक्षण दिखाई देते हैं।
चेरोफोबिया से ग्रसित व्यक्ति का मानना होता है कि खुश होने के बाद निश्चित रूप से कुछ बुरा होगा, इसलिए वे खुशी के पलों को टालते हैं या उनमें शामिल नहीं होते।
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