
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Written By: Vidya Sharma | Updated : February 26, 2026 12:11 PM IST
Medically Verified By: Dr. Malini Saba
Second Time Maa Banne Ki Feeling: मां बनना किसी भी महिला के जीवन का बड़ा और गहरा अनुभव होता है। पहली बार मातृत्व का अनुभव नया, उत्साह भरा और चुनौतीपूर्ण होता है। लेकिन जब कोई महिला दूसरी बार मां बनती है, तो उसका यही एक्सपीरिएंस और मानसिक स्थिति काफी हद तक बदल जाती हैं। ऐसा कई मांओं के साथ हो सकता है।
साइकोलॉजिस्ट और महिला एवं मानवाधिकारों की समर्थक डॉक्टर मालिनी सबा कहती हैं कि ‘दूसरी बार मां बनने पर महिला का दिमाग पहले की तुलना में अधिक सजग और व्यावहारिक हो सकता है। हालांकि हर महिला का अनुभव अलग होता है, फिर भी कुछ सामान्य बदलाव देखे जाते हैं।’ लेकिन इस दौरान महिलाओं को किन समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है? आइए आपको बताते हैं।
पहली बार मां बनने पर कई महिलाओं के मन में डर और असमंजस रहता है कि बच्चे की देखभाल कैसे करें, रोने का कारण कैसे समझें, दिनचर्या कैसे संभालें आदि। दूसरी बार मां बनने पर महिला पहले के अनुभवों से सीख चुकी होती है। उसे शिशु की जरूरतों को समझने में अधिक आत्मविश्वास होता है। यह आत्मविश्वास मानसिक स्थिरता लाने में मदद करता है।
दूसरे बच्चे के आने के बाद जिम्मेदारियां दोगुनी हो जाती हैं। अब केवल नवजात शिशु ही नहीं, बल्कि बड़े बच्चे की जरूरतों का भी ध्यान रखना होता है। इस कारण महिला के दिमाग पर मानसिक दबाव बढ़ सकता है। समय प्रबंधन, नींद की कमी और थकान भावनात्मक तनाव को बढ़ा सकते हैं।
दूसरी बार मां बनने पर कुछ महिलाओं में भावनात्मक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं। हार्मोनल बदलाव इसके पीछे एक बड़ा कारण होता है। डॉक्टर मालिनी सबा के अनुसार, यदि महिला को पर्याप्त सहयोग और समझ न मिले, तो वह चिड़चिड़ापन, चिंता या उदासी महसूस कर सकती है। इसलिए परिवार का सहयोग अत्यंत आवश्यक है।
कई महिलाओं को यह चिंता होती है कि वे दोनों बच्चों को समान समय और प्यार दे पा रही हैं या नहीं। कभी-कभी उन्हें लगता है कि बड़े बच्चे की उपेक्षा हो रही है। यह अपराध बोध मानसिक तनाव का कारणबन सकता है।
दूसरी बार मां बनने पर महिला की सोच और प्राथमिकताएं और अधिक स्पष्ट हो जाती हैं। वह अपने समय, ऊर्जा और रिश्तों को नए तरीके से व्यवस्थित करने लगती है। उसका दिमाग अधिक व्यावहारिक और योजना बनाने वाला हो जाता है, क्योंकि अब उसे दो बच्चों की जरूरतों को संतुलित करना होता है।
कुछ मामलों में दूसरी बार भी प्रसवोत्तर अवसाद (पोस्टपार्टम डिप्रेशन) हो सकता है। अगर महिला लगातार उदासी, थकान या निराशा महसूस कर रही हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। डॉ. मालिनी सबा कहती हैं कि मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना उतना ही जरूरी है जितना शारीरिक स्वास्थ्य का।
दूसरी बार मां बनना एक नया अनुभव है, जिसमें आत्मविश्वास और चुनौतियां दोनों साथ आती हैं। दिमाग पर इसका असर सकारात्मक भी हो सकता है और कभी-कभी तनावपूर्ण भी।
डॉ. मालिनी सबा मानती हैं कि सही सहयोग, समझ और देखभाल से महिला इस दौर को संतुलित और सशक्त तरीके से पार कर सकती है। मातृत्व एक यात्रा है - हर बार अलग, हर बार सीख से भरी। सबसे जरूरी है कि मां का मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य सुरक्षित रहे, क्योंकि स्वस्थ मां ही स्वस्थ परिवार की नींव होती है।
Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।