
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Written By: Vidya Sharma | Published : April 28, 2026 6:21 PM IST
Image credits by: मेंटल हेल्थ और भारत
Mental Health Report: भारत में धीरे-धीरे मानसिक स्वास्थ्य को अहम समझा जाने लगा है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि लोग इसके बारे में बातचीत करने को तैयार हैं। आज भी सिर्फ मेंटली पीस न मिल पाने पर लोग सुसाइड कर रहे हैं या फिर डिप्रेशन में जा रहे हैं। ग्लोबल मेंटल हेल्थ की स्टडी में देखें तो भारत दुनियाभर के देशों में 60वें स्थान पर है। साथ ही और भी हैरानी की बात यह है कि यह रिसर्च 18 से 34 साल के युवाओं पर की गई है। यानी कि आगे चलकर देश का भविष्य बनने वाले अधिकतर युवा किसी न किसी मानसिक बीमारी या समस्या का सामना कर रहे हैं। आइए आपको इस विषय पर थोड़ा विस्तार से बताते हैं।
सेपियन लैब्स द्वारा भारतीयों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी ग्लोबल माइंड हेल्थ 2025 की एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई, जिसका मुख्य डाटा यह बताता है कि भारत के युवा (18–34 वर्ष) मानसिक स्वास्थ्य और खुशहाली के मामले में 84 देशों में से 60वें स्थान पर रहे। उस रिपोर्ट में माइंड हेल्थ कोशिएंट स्कोर 33 आया है जबकि 55 साल के भारतीयों का स्कोर 96 रहा, जो उन्हें वैश्विक स्तर पर 49वें स्थान पर रखता है और मानसिक स्वास्थ्य के कार्यात्मक मानदंडों के साथ अधिक निकटता से मेल खाता है।
| ग्लोबल माइंड हेल्थ 2025 |
| श्रेणी | विवरण |
| अध्ययन संस्था | सैपियन लैब्स |
| प्रोजेक्ट नाम | ग्लोबल माइंड प्रोजेक्ट |
| भारत का कुल सैंपल साइज | 78,093 साक्षर इंटरनेट उपयोगकर्ता |
| भारत में 18-34 आयु वर्ग | 29,594 व्यक्ति |
| भारत में 55 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग | 24,088 व्यक्ति |
| भारत में अन्य आयु वर्ग | 24,411 व्यक्ति |
| वैश्विक कवरेज | 84 देश |
| शामिल क्षेत्र | एशिया, अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका |
| वैश्विक कुल उत्तरदाता | 10 लाख से अधिक |
| शोधकर्ताओं का निष्कर्ष | यह बदलाव महामारी के बाद का अस्थायी असर नहीं, बल्कि बहु-वर्षीय संरचनात्मक पीढ़ीगत परिवर्तन है |
| अध्ययन फोकस | मानसिक स्वास्थ्य, पीढ़ीगत बदलाव, डिजिटल जीवनशैली प्रभाव |
WHO की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में बीमारियों में मानसिक स्वास्थ्य का अहम योगदान रहा है। जहां आत्म की दर 21 प्रति 100,000 आबादी है जो उम्र के हिसाब से अनुमानित है। वहीं मानसिक विकारों के कारण आर्थिक नुकसान- $1 ट्रिलियन यानी कि 1 लाख करोड़ रुपये है। यह 2012–2030 का अनुमान है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा 2 सितंबर 2025 को जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार- '1 अरब से अधिक लोग मानसिक स्वास्थ्य विकारों के साथ जी रहे हैं। चिंता और अवसाद जैसी स्थितियां लोगों और अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डाल रही हैं।
2 सितंबर 2025 को WHO की रिपोर्ट (World mental health today) में प्रकाशित निष्कर्षों के अनुसार आत्महत्या एक विनाशकारी परिणाम बनी हुई है, जिसने अकेले 2021 में अनुमानित 727,000 लोगों की जान ले ली। यह सभी देशों और सामाजिक-आर्थिक परिवेशों में युवाओं के बीच मृत्यु का एक प्रमुख कारण है। वैश्विक प्रयासों के बावजूद, आत्महत्या से होने वाली मौतों को कम करने की दिशा में प्रगति इतनी धीमी है कि 2030 तक आत्महत्या की दरों में एक-तिहाई की कमी लाने के संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDG) को पूरा करना संभव नहीं लगता। मौजूदा गति को देखते हुए, उस समय सीमा तक केवल 12% की कमी ही हासिल हो पाएगी।
मानसिक स्वास्थ्य को हल्के में न लें क्योंकि जब यह अपनी चरम सीमा पर पहुंचता है तो व्यक्ति गलत से गलत कदम उठा लेते हैं। ऐसी स्थिति पैदा होने पर किसी अच्छा साइकोलॉजिस्ट या फीजियोथेपैपिस्ट से बात करें।
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