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Medically Verified By: Dr. Malini Saba
Insaan Sachha Kab Hota Hai: अक्सर समाज में यह धारणा बन चुकी है कि जो व्यक्ति बहस या लड़ाई के दौरान रोने लगता है, वही ज्यादा सच्चा होता है। कई लोग यह मान लेते हैं कि आंसू अपने-आप में सच्चाई का प्रमाण हैं। लेकिन मनोविज्ञान इस सोच को पूरी तरह सही नहीं मानता। हर बार रोना सच्चे होने का संकेत नहीं होता। साइकोलॉजिस्ट और महिला एवं मानवाधिकारों की समर्थक डॉक्टर मालिनी सबा बताती हैं कि लड़ाई के दौरान रोना एक भावनात्मक प्रतिक्रिया होती है, न कि सच या झूठ का पैमाना। कई बार व्यक्ति खुद भी नहीं समझ पाता कि वह अचानक इतना असहज क्यों महसूस करने लगता है।
जैसा कि अक्सर अपनी धारणाओं के आधार पर लोग मानते हैं कि लड़ते समय इमोशनल होने वाले व्यक्ति की बातों में सच्चा पन होता है या सच्चे लोग ही अपनी बात रखते समय रो देते हैं। लेकिन ऐसा हर बार हो, यह जरूरी नहीं है। कभी-कभार आपका लड़ते समय रो देने के पीछे कुछ गहरे कारण हो सकते हैं, जो आपको अंदर से कमजोर महसूस कराते हैं। आइए जानते हैं ऐसे ही 5 कारण।

डॉक्टर कहती हैं कि कई लोग अपनी भावनाओं और विचारों को साफ शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते हैं। जब सामने वाला उनकी बात नहीं समझता या बीच में टोक देता है, तो व्यक्ति खुद को बेबस महसूस करता है। यही बेबसी धीरे-धीरे आंसुओं का रूप ले लेती है। इसका सच्चाई से सीधा संबंध नहीं होता।
कई बार रोना वर्तमान बहस की वजह से नहीं, बल्कि पुराने अनुभवों की वजह से होता है। साइकोलॉजिस्ट कहती हैं कि पहले की अनसुनी बातें, दबा हुआ गुस्सा या पुराने रिश्तों की चोटें अचानक सामने आ जाती हैं। लड़ाई सिर्फ एक कारण बनती है, असली दर्द अंदर से निकलता है।
लगातार तनाव, काम का दबाव या पारिवारिक जिम्मेदारियां व्यक्ति को अंदर से थका देती हैं। जब सहन करने की सीमा पार हो जाती है, तो छोटी-सी बात भी भारी लगने लगती है। ऐसे में बहस के दौरान रोना भावनात्मक बोझ के बाहर आने का तरीका बन जाता है।
अगर किसी व्यक्ति को यह लगने लगे कि उसकी भावनाओं को महत्व नहीं दिया जा रहा, या उसे बार-बार गलत साबित किया जा रहा है, तो अंदर से डर और असुरक्षा पैदा होती है। यह असुरक्षा आंसुओं के रूप में सामने आ सकती है। इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्ति कमजोर है, बल्कि वह खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहा।
हर इंसान को भावनाओं को संभालना नहीं सिखाया जाता। कुछ लोग गुस्से में चिल्लाते हैं, कुछ चुप हो जाते हैं और कुछ रोने लगते हैं। रोना भी भावनाओं को बाहर निकालने का एक तरीका है। यह न तो ड्रामा है और न ही सच्चाई का प्रमाण।

डॉ. मालिनी सबा मानती हैं कि लड़ाई के दौरान रोना कमजोरी नहीं है, लेकिन यह जरूर बताता है कि व्यक्ति अंदर से बहुत दबाव में है। इसे सच या झूठ से जोड़ने के बजाय, इसे समझने की जरूरत होती है।
डॉक्टर कहती हैं कि 'अगर आप बार-बार बहस के दौरान रोने लगते हैं, तो खुद से यह सवाल करें कि क्या आप अपनी बात खुलकर रख पा रहे हैं। क्या आप लंबे समय से अपनी भावनाओं को दबा रहे हैं। ऐसे में खुद को समय देना, अपनी भावनाओं को पहचानना और जरूरत पड़े तो किसी विशेषज्ञ से बात करना मददगार हो सकता है।'
आखिर में साइकोलॉजिस्ट ने बताया कि रोना सच्चाई का प्रमाण नहीं होता, बल्कि यह आपके मन की स्थिति को दर्शाता है। भावनाओं को समझना और उन्हें सही तरीके से व्यक्त करना ही मानसिक संतुलन की असली पहचान है। इसलिए पहले तो अपने इमोशन्स पर कंट्रोल रखें और रोने को अपने सही होने से कम्पेयर न करें।
Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।