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Fail Hone Wale Bacho Ko Mentally Support Kaise Kare: ऐसा बिल्कुल नहीं है कि बोर्ड परीक्षा में सभी बच्चे पास होते हैं। कुछ बच्चे फेल भी होते हैं और उनके लिए ये एक ट्रामा की तरह होता है। नंबर कम लाने वाले या फेल होने वाले बच्चे पूरी मेहनत करने के बाद भी जब असफल हो जाते हैं तो उनका मनोबल टूट जाता है। जब बच्चा फेल होता है, तो सबसे ज्यादा डर उसे पढ़ाई से नहीं लगता, घर से लगता है- ‘मम्मी क्या कहेंगी?, पापा नाराज होंगे’ ताऊ जी क्या कहेंगे?’, कई बच्चे रिजल्ट से ज्यादा इस पल से घबराते हैं।
यहीं पर माता-पिता का रोल सबसे बड़ा हो जाता है। कैसे? यह जानने के लिए हमने साइकोलॉजिस्ट और महिला एवं मानवाधिकारों की समर्थक डॉक्टर मालिनी सबा से बात की। हमने उन्हें पूछा कि जो बच्चे फेल हो जाते हैं उनके मनोबल को कैसे बढ़ाएं और आगे आने वाली चुनौतियों के लिए उन्हें कैसे तैयार करें? आइए हम इस बारे में विस्तार जानते हैं।
ना लेक्चर, ना प्लान, ना भविष्य की चिंता। बस अपने बच्चे को, सामान्य तरीके से ट्रीट कीजिए। अगर वह चुप है, तो उसे चुप रहने दीजिए। अगर वह पास आकर बैठता है, तो बस उसके साथ बैठ जाइए। कई बार ‘कुछ नहीं करना’ ही सबसे सही तरीका होता है।
फेल होने के बाद बच्चे के मन में एक अजीब सी शर्म आ जाती है। वह खुद को दूसरों से कम समझने लगता है। इस समय अगर घर में भी उसे ऐसा ही महसूस हुआ, तो वह अंदर से टूट जाता है। इसलिए बहुत जरूरी है कि उसे यह महसूस हो ‘घर अभी भी मेरा ही है, यहां मैं सुरक्षित हूं।’
हमारी आदत होती है कि उसी दिन सब ठीक कर दें। लेकिन सच यह है कि उस दिन बच्चा कुछ भी समझने की हालत में नहीं होता। अगले दिन या दो दिन बाद, जब चीजें थोड़ी सामान्य लगें, तब धीरे से बात शुरू करें। सीधे सवाल मत पूछिए, बस ऐसे कहिए- ‘अगर तुम बताना चाहो, तो बताओ क्या मुश्किल लगा था?’ फर्क आप खुद देखेंगे।
हम जल्दी-जल्दी सलाह देने लगते हैं- ‘ट्यूशन लगवा देंगे’, ‘फोन बंद कर देंगे’,‘अब टाइम टेबल बनेगा’, लेकिन बच्चे को भी मौका दीजिए कि वह खुद सोचे- उसे कहां दिक्कत हुई, क्या बदल सकता है। जब वह खुद समझता है, तभी बात टिकती है।
फेल होने के बाद किताब खोलना भी भारी लगता है।तो शुरुआत आसान रखें- ‘चलो, बस 15 मिनट बैठते हैं।’ ‘आज सिर्फ एक छोटा सा टॉपिक देखते हैं।’ धीरे-धीरे यही 15 मिनट बढ़ते हैं। बीच-बीच में जिंदगी भी रहने दीजिए हर समय पढ़ाई की बात होगी, तो बच्चा थक जाएगा। कभी उसके साथ चाय पी लें, टीवी देख लें, बाहर घूम आएं। उसे यह महसूस होना चाहिए कि जिंदगी अभी भी चल रही है, रुकी नहीं है।
यह बात जितनी बार कही जाए, कम है। दूसरों से तुलना करना सबसे जल्दी नुकसान करता है। हर बच्चे की अपनी स्पीड होती है। कोई जल्दी सीखता है, कोई थोड़ा समय लेता है, दोनों ठीक हैं। थोड़ा समय दीजिए, सब तुरंत ठीक नहीं होगा। कभी वह ठीक लगेगा, कभी उदास रहेगा, कभी चिड़चिड़ा भी हो सकता है। यह सब सामान्य है। आपका काम उसे हर दिन ‘ठीक’ करना नहीं है, बस उसके साथ बने रहना है।
फेल होना उतनी बड़ी बात नहीं है, जितना हम उसे बना देते हैं। बड़ी बात यह है कि उस समय बच्चे को कैसा माहौल मिलता है। अगर उसे डांट से ज्यादा समझ मिले, और डर से ज्यादा साथ मिले, तो वह खुद ही धीरे-धीरे संभल जाता है। क्योंकि सच में, उस समय बच्चे को रास्ता नहीं, बस कोई अपना चाहिए होता है, जो कहे- ‘ठीक है, फिर से शुरू करते हैं।’
Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।