होली खेलने का मन है पर भीड़ में जाने से लगता है डर? कहीं आपको ये मानसिक बीमारी तो नहीं?
Holi Ki Bheed Mai Jane Se Dar Kyu Lagta Hai: क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि होली खेलने का मन करता है पर भीड़ में जाने से डर लगता है? आइए जानते हैं ऐसा क्यों होता है।
Holi Khelne Se Dar Kyu Lagta Hai: होली का नाम सुनते ही रंगों की बौछार, ढोल की आवाज और दोस्तों की हंसी दिलो-दिमाग में गूंजने लगती है। लेकिन हम में से कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनका दिल होली खेलने का तो करता है, पर भीड़ का ख्याल आते ही उन्हें घबराहट होने लगती है? वह सोचते हैं कि चारों तरफ लोग होंगे, तेज आवाजें होंगी, अचानक कोई रंग डाल देगा या कोई गलत हरकत कर देगा आदि-आदि बातों को लेकर मन में अजीब-सा डर बैठ जाता है।
साइकोलॉजिस्ट और महिला एवं मानवाधिकारों की समर्थक डॉक्टर मालिनी सबा कहती हैं कि कई लोग त्योहारों को लेकर एक्साइटेड तो होते हैं, लेकिन भीड़, शोर और अनजान लोगों के बीच जाने से घबराहट महसूस करते हैं। अगर आपका भी मन होली खेलने का है, लेकिन भीड़ में जाने से दिल तेज धड़कने लगता है, पसीना आता है या बेचैनी होने लगती है, तो इसे हल्के में न लें। इसे सोशल एंग्जाइटी कहा जाता है। आइए आपको इस विषय पर थोड़ा विस्तार से बताते हैं।
क्या यह सामान्य डर है?
कभी-कभी भीड़ से असहज महसूस करना बिल्कुल सामान्य है।
- बहुत ज्यादा शोर
- धक्का-मुक्की
- अनजाने लोगों का पास आना
- रंग या पानी से असहजता
इन कारणों से कोई भी व्यक्ति थोड़ा घबरा सकता है। यह जरूरी नहीं कि हर डर एक मानसिक बीमारी हो।
कब हो सकता है यह मानसिक समस्या?
अगर भीड़ का डर इतना बढ़ जाए कि-
- आप बाहर जाना ही बंद कर दें
- त्योहारों या सामाजिक कार्यक्रमों से बचने लगें
- भीड़ का नाम सुनते ही घबराहट या पैनिक जैसा महसूस हो
- सांस फूलने लगे या चक्कर आए
तो यह सोशल एंग्जायटी या एगोराफोबिया जैसी समस्या का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को लगता है कि वह भीड़ में सुरक्षित नहीं है या कोई अनहोनी हो सकती है, जबकि वास्तविक खतरा नहीं होता।
ऐसा क्यों होता है?
डॉक्टर मालिनी सबा के अनुसार, इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:
- पहले कोई बुरा अनुभव
- आत्मविश्वास की कमी
- लोगों द्वारा जज किए जाने का डर
- अधिक संवेदनशील व्यक्तित्व
कई बार परिवार या समाज का दबाव भी डर को बढ़ा देता है।
क्या करें?
- अगर आपको भीड़ से डर लगता है, तो खुद को मजबूर न करें। धीरे-धीरे कदम बढ़ाएं।
- छोटे और सुरक्षित समूह में होली खेलें
- ऐसे लोगों के साथ रहें जिन पर आपको भरोसा हो
- गहरी सांस लेने का अभ्यास करें
- अपनी सीमाएं तय करें और “ना” कहना सीखें
अगर डर बहुत ज्यादा है और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डाल रहा है, तो किसी मनोवैज्ञानिक से सलाह लेना फायदेमंद हो सकता है।
डॉक्टर सबा की सलाह
डॉक्टर मालिनी सबा कहती हैं कि हर डर बीमारी नहीं होता, लेकिन हर डर को नजरअंदाज करना भी सही नहीं है। खुद को समझना और स्वीकार करना ही पहला कदम है। त्योहार खुशी के लिए हैं, दबाव के लिए नहीं।’
अगर आपका मन होली खेलने का है लेकिन भीड़ से डर लगता है, तो यह जरूरी नहीं कि आपको कोई गंभीर मानसिक बीमारी हो। कभी-कभी यह सिर्फ स्वभाव, अनुभव या असुरक्षा का परिणाम होता है। महत्वपूर्ण यह है कि आप अपनी भावनाओं को समझें, खुद पर दबाव न डालें और जरूरत पड़े तो सही मार्गदर्शन लें। याद रखें कि त्योहार का असली रंग खुशी और सुकून में है, न कि भीड़ में खुद को खो देने में।
Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।