
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Written By: Vidya Sharma | Updated : May 21, 2026 11:18 AM IST
Medically Verified By: Dr. Malini Saba
Image Credit- ChatGPT
Mahangai Or Mental Health: महंगाई इतनी बढ़ गई है कि सभी चीजें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो रही हैं। खासकर वे चीजें जो अब हमारी जिंदगी का आम और रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली जरूरतों में शामिल हो गई हैं। हम बात कर रहे हैं पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की, जो सुबह घर से निकलते समय हर आम आदमी के दिमाग में दवाब डालती हैं। जब कोई व्यक्ति पेट्रोल पंप पर गाड़ी रुकवाता है और हर दूसरे दिन पेट्रोल व सीएनजी की बढ़ती कीमतों को देखता है, तो उसका असर सिर्फ उसकी जेब तक ही सीमित नहीं रहता। बल्कि यह जाने-अनजाने धीरे-धीरे मन के भीतर चिंता के रूप में जगह बना लेता है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि आजकल पेट्रोल, डीजल और CNG के बढ़ते दाम सिर्फ आर्थिक परेशानी नहीं हैं, बल्कि यह आम आदमी के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में साइकोलॉजिस्ट और महिला एवं मानवाधिकारों की समर्थक डॉक्टर मालिनी सबा बताती हैं कि 'एक मध्यम वर्गीय परिवार की जिंदगी पहले ही कई जिम्मेदारियों से घिरी होती है। घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई, दवाइयां, बिजली के बिल और रोजमर्रा के खर्च किसी तरह संतुलित किए जाते हैं।'
'लेकिन जैसे ही ईंधन के दाम बढ़ते हैं, हर चीज महंगी लगने लगती है। बाजार तक जाने का खर्च बढ़ता है, सब्जियों और राशन की कीमतें बढ़ती हैं और लोगों को अपने बजट में बार-बार बदलाव करना पड़ता है। यही लगातार चलने वाला दबाव मानसिक थकान पैदा करता है।' आइए और जानते हैं कि यह फैक्टर आम आदमी के मानसिक स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है।
साइकोलॉजिस्ट बताती हैं कि कई लोग बाहर से नॉर्मल दिखते हैं, लेकिन भीतर ही भीतर लगातार हिसाब लगा रहे होते हैं कि महीने का खर्च कैसे पूरा होगा? कुछ लोग अपने शौक छोड़ देते हैं, कुछ घूमना-फिरना कम कर देते हैं और कई माता-पिता अपने बच्चों की छोटी-छोटी इच्छाएं पूरी न कर पाने पर खुद को दोषी महसूस करते हैं। यह स्थिति व्यक्ति के आत्मविश्वास को भी प्रभावित करती है।
सबसे अधिक दबाव उन लोगों पर पड़ता है जिनकी रोजी-रोटी सीधे ईंधन पर निर्भर करती है। जैसे ऑटो चालक, टैक्सी ड्राइवर, डिलीवरी एजेंट और छोटे व्यापारी हर दिन बढ़ती कीमतों का बोझ महसूस करते हैं। उनकी कमाई बढ़ती नहीं, लेकिन खर्च लगातार बढ़ता जाता है। ऐसे में चिड़चिड़ापन, बेचैनी और गुस्सा बढ़ना स्वाभाविक है। यही कारण है कि अक्सर आपको कई ऑटो वाले लड़ते हुए या गुस्से में दिखेंगे।
साइकोलॉजिस्ट बताती हैं कि घर के माहौल पर भी महंगाई का असर साफ दिखाई देता है। फाइनेंशियल स्ट्रेस अक्सर रिश्तों में तनाव लेकर आता है। छोटी-छोटी बातों पर बहस होने लगती है, परिवार के सदस्य मानसिक रूप से थकान महसूस करते हैं और कई बार लोग अपनी चिंता किसी से साझा भी नहीं कर पाते। बच्चों पर भी इसका असर पड़ता है। वे घर की परिस्थितियों को देखकर असुरक्षित महसूस करने लगते हैं, भले ही उन्हें पूरी स्थिति समझ न आए।
आज के समय में सबसे बड़ी समस्या केवल महंगाई नहीं, बल्कि लगातार बनी रहने वाली अनिश्चितता है। लोगों को यह डर सताने लगा है कि आने वाले समय में खर्च और बढ़ेगा। यही डर मानसिक तनाव को और गहरा बना देता है।ऐसे समय में मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
परिवार के साथ खुलकर बातचीत करना, खर्चों की व्यावहारिक योजना बनाना और खुद को लगातार तनाव में डुबोकर न रखना बहुत जरूरी है। मानसिक शांति बनाए रखने के लिए थोड़ी देर टहलना, योग करना, संगीत सुनना या अपने प्रियजनों के साथ समय बिताना भी मददगार हो सकता है।
डिस्क्लेमर: समाज को यह समझने की जरूरत है कि महंगाई केवल आर्थिक आंकड़ों का विषय नहीं है। इसका असर लोगों की सोच, व्यवहार, रिश्तों और मानसिक संतुलन पर भी पड़ता है। जब आम आदमी लगातार दबाव में जीता है, तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर दिखाई देता है। इसलिए आर्थिक नीतियों के साथ-साथ लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीरता से ध्यान देना आज की आवश्यकता है।