
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Written By: Vidya Sharma | Published : April 10, 2026 4:33 PM IST
Medically Verified By: Dr. Malini Saba
Image credits by: Iran-Israel War
Iran Or Israel War Indians Ki Mental Health Par Kya Asar Pad Rha Hai: ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ता तनाव सिर्फ भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है- यह ईंधन की कीमतों, वित्तीय प्रणालियों, समाचार, और सबसे ज्यादा असर हमारे दिमाग पर डाल रहा हैं। भारत में भले ही युद्ध सीधे नहीं हो रहा, लेकिन इसका असर यहां साफ दिख रहा है। आइए साइकोलॉजिस्ट और महिला एवं मानवाधिकारों की समर्थक डॉक्टर मालिनी सबा से इस बारे में विस्तार से जानते हैं।
पहली नजर में देखने में ये सब आम लगता है लेकिन, पेट्रोल-डीजल की कमी, और एलपीजी गैस की दिक्कत, बढ़ती महंगाई, शेयर बाजार में गिरावट, और आर्थिक मंदी का डर, ये सब मिलकर लोगों के मन और दिमाग पर गहरा असर कर रहा है। पहले से ही डिमोनेटाइजेशन, लॉकडाउन, रोजगार की चुनौती, नौकरियों की संख्या, सोशल प्रेशर के कारण भारतवासी चिंता , और तनाव से गुजर रहे हैं।
आर्थिक संकट केवल आंकड़े नहीं है, यह स्तिथि के कंट्रोल, और सर्वाइवल इंस्टिंक्ट से जुड़ा है, जब कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा होता है तो इसका सीधा असर, रोजमर्रा के चीजों सहित ट्रांसपोर्ट किराये, खादित पदार्थो में महंगाई आदि पर पड़ता है और सबसे ज़्यादा इसका दुष्प्रभाव पड़ता हैं मिडल और लोअर मिडल क्लास वर्ग के परिवारों पर। उनके लिए यह एक निरंतर तनाव का विषय बना हुआ होता हैं की वे अपना जीवन कैसे व्यापन करें, अगर हालात और बिगड़ गए तो क्या होगा?
अगर इन स्थितियों को समय रहते ठीक न किया जाए तो यह डिप्रेशन और एंग्जायटी डिसऑर्डर जैसी मानसिक दिक्कतों का रूप ले लेता हैं।
मौजूदा स्थिति का सबसे बड़ा खतरा यह हैं की तनाव धीरे-धीरे बढ़ता है। लोग अपनी बेचैनी को नहीं मानते और इस पर खुलकर बात नहीं करते, मगर फिर भी तनाव और उसके लक्ष्ण जैसे कि छोटी-छोटी बातो पर गुस्सा करना, हमेशा थका हुआ महसूस करना या चीजों भूलना, वे खुद कभी-कभी और उनके आस-पास के लोग उसको नोटिस करते हैं। कई व्यक्ति इस तनाव को व्यक्त करने के बजाय अपने भीतर दबा लेते हैं। परिणामस्वरूप, भावनात्मक तनाव धीरे-धीरे बढ़ता जाता है और गंभीर रूप ले लेता हैं।
आर्थिक मंदी का डर नौकरी की असुरक्षा को बढ़ाता हैं। रोजगार सिर्फ आय का स्रोत नहीं है; यह समाज में पहचान, आत्मसम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है।
युवा और परिवार के ऐसे लोग जिन पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी और उमीदो का भार होता हैं, उन पर यह दबाव और भी ज्यादा होता है।
हर समय खबरें और सोशल मीडिया पर युद्ध की बातें देखने से मन पर असर पड़ता है। लगातार नकारात्मक खबरें देखने से दिमाग खतरे को ज्यादा महसूस करने लगता है। इससे मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विकारियस ट्रॉमा कहा जाता है, जिसमें हमारा दिमाग और मन बताए गए खतरे और वास्तविक खतरे के बीच की रेखा को धुंधला करने लगता है। जिसमे हम किसी घटना को सीधे नहीं झेलते, फिर भी उसका असर हम पर पड़ता है।
हम जो देख और महसूस कर रहे हैं वह केवल व्यक्तिगत तनाव नहीं है, बल्कि एक सामाजिक मनोवैज्ञानिक तनाव है। जब बड़ी आबादी एक साथ संदेह का सामना करती है, तो यह सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करता है, लोग जल्दी गुस्सा होते हैं, धैर्य कम हो जाता है, और रिश्तों में तनाव बढ़ सकता है।
भले ही युद्ध और दुनिया की स्थिति को नहीं बदल सकते, लेकिन अपने मन को संभाल सकते हैं-
इतिहास गवाह है कि युद्ध अर्थव्यवस्थाओं को भले ही अस्त-व्यस्त कर देते हैं, लेकिन उनका सबसे गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव अक्सर मनोवैज्ञानिक होता है। इसे समझना ही इसका सामना करने की दिशा में पहला कदम है। यह क्षण घबराहट का नहीं, समझदारी और संतुलन बनाए रखने का हैं,क्योंकि कभी-कभी, सबसे महत्वपूर्ण लड़ाइयां सीमाओं पर नहीं, बल्कि हमारे भीतर लड़ी जा रहीं होती हैं ।
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