
प्रिया मिश्रा
प्रिया को पिछले 4 सालों से हेल्थ और लाइफस्टाइल विषयों पर लिखने का अनुभव है। इन्हें हेल्थ और ... Read More
Written By: priya mishra | Published : August 24, 2025 3:44 PM IST
Medically Verified By: Kapil Gupta
Difference Between Shyness And Social Anxiety: कितनी बार आपने किसी बच्चे या बड़े को ये कहते हुए सुना होगा कि, “मैं तो शर्मीला हूँ” या “लोगों के बीच मुझे अच्छा नहीं लगता”? और कई बार पेरेंट्स या घरवाले इसका ये जवाब दे देते हैं कि “अरे, ये थोड़ा शर्माता है बस… थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा।” पर सच्चाई ये है कि हर बार ये शर्म नहीं होती। कई बार ये कुछ और गहरा, और ज़्यादा गंभीर होता है, जिसे सोशल एंग्जायटी (Social Anxiety Disorder) कहते हैं। इसलिए शर्म और सोशल एंग्जायटी के बीच फर्क समझना बेहद जरूरी है। अधिकतर लोग इन दोनों के बीच फर्क नहीं कर पाते और दोनों को एक ही समझ लेते हैं। हालांकि, शर्मीलापन और सोशल एंग्जायटी, दोनों बिल्कुल अलग मानसिक स्थितियां हैं। ऐसे में इनकी पहचान करना जरूरी है। आज इस लेख में मेंटल हेल्थ एक्टिविस्ट और SOlh wellness एप के फाउंडर कपिल गुप्ता से जानते हैं कि शर्मीलेपन और सोशल एंग्जाइटी में क्या अंतर है?
कपिल गुप्ता बताते हैं कि शर्मीलेपन को हम एक प्राकृतिक व्यक्तित्व गुण के रूप में देख सकते हैं। नए लोगों से मिलते समय थोड़ी झिझक होना, भीड़ में शुरुआत में असहज महसूस करना या अचानक स्पॉटलाइट में आकर असहज हो जाना बिल्कुल सामान्य है। लेकिन जैसे ही आपको थोड़ा समय और अपना कम्फर्ट ज़ोन मिलता है, आप सामान्य व्यवहार करने लगते हैं। शर्म आपकी ज़िंदगी की पसंद को रोकती नहीं,ब स हल्की-सा असुविधा देती है। यानी यह स्थायी नहीं है। आप धीरे-धीरे ढल जाते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।
कपिल गुप्ता बताते हैं कि सोशल एंग्जायटी सिर्फ़ झिझक नहीं है, बल्कि ये एक मानसिक स्वास्थ्य स्थिति है। इसमें डर और चिंता इतने प्रबल हो जाते हैं कि व्यक्ति सामाजिक परिस्थितियों से बचने लगता है।
अत्यधिक डर: भीड़, सार्वजनिक बोलना या लोगों से बातचीत का विचार ही डर पैदा करता है।
शारीरिक लक्षण: पसीना आना, कांपना, तेज़ दिल की धड़कन, गले में सूखापन।
जरूरत से ज़्यादा सोचना: हर बात में यही चिंता कि “लोग क्या सोचेंगे?”
टालमटोल करना: जरूरी कार्यक्रम, करियर के अवसर, यहाँ तक कि दोस्तों और परिवार की मुलाक़ातों से भी बचना।
कपिल गुप्ता के मुताबिक, तनाव सोशल एंग्जायटी का असली फ्यूल होता है। जब भी आप सामाजिक परिस्थितियों से बचते हैं, तो तनाव कम नहीं होता उल्टा और बढ़ जाता है। दिमाग ओवरथिंकिंग और रुमिनेशन के जाल में फंस जाता है। यानी दिमाग में एक ही बात बार-बार चलती रहती है। यह लगातार बना रहने वाला तनाव शरीर पर भी असर डालता ह, जिससे नींद में गड़बड़ी, पाचन संबंधी समस्याएं, कमजोर इम्यूनिटी, चिड़चिड़ापन और थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
तनाव को पहचानें और स्वीकार करें: इस बात को स्वीकार करें कि यह सिर्फ़ शर्म नहीं है।
बचाव की आदत तोड़ें: छोटे-छोटे कदम लें और धीरे-धीरे सामाजिक मेलजोल की तरफ़ बढ़ें।
सहने की तकनीकें अपनाएं: सांस पर ध्यान, सजगता और जर्नलिंग की मदद लें।
पेशेवर मदद लें: किसी थेरेपिस्ट या एक्सपर्ट की मदद लें। याद रखें आपको अकेले नहीं लड़ना है।
Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।