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Written By: akhilesh dwivedi | Published : August 11, 2018 6:02 PM IST
किडनी की बीमारियों का पता तब चलता है जब बहुत देर हो चुकी होती है। हाल ही में हुए एक शोध में इस बात का खुलासा हुआ है कि एक विशेष जांच के द्वारा पांच साल पहले ही इस बात का पता चल सकता है कि किडनी में कैंसर हो सकता है या नहीं।
ब्रिघम एंड वूमेन हॉस्पिटल में हुए शोध में इस बात का पता चला है कि KIM-1 नामक तत्व की उच्च सांद्रता का पता लगाया जा सकता है जो आगे चलकर 5 साल बाद कैंसर का कारण बनता है। किडनी-इंजरी-मोलेक्यूल-1 (KIM-1) नामक तत्व सामान्यतया ब्लड या यूरिन में पाया जा सकता है। यह ज्यादातर उन लोगों में होता है जिनका फिटनेस लेवल बहुत निम्न होता है।
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शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि इस जांच की वजह से लोगों के बीच में अंतर करना आसान हो जाता है। इस जांच के माध्यम से उन लोग की आसानी से पहचान की जा सकती है जो आगे आने वाले 5 सालों में किडनी कैंसर के शिकार हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं में शामिल वेंकट सब्बिसेटी बताते हैं कि किडनी कैंसर की अगर शुरूआत में ही पहचान कर ली जाय तो इसका इलाज संभव है। लेकिन अगर एडवांस स्टेज में किडनी का कैंसर पहुंच जाता है तो मरीजों की मौत ज्यादा होती है।
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वेंकट बताते हैं कि हलांकि किडनी कैंसर का कोई खास पहचान नहीं है जब भी पता चलता है तो वह एडवांस स्टेज में पाया जाता है। हमारे शोध से यह पता चलता है कि हम केआईएम-१ के माध्यम से बहुत पहले ही किडनी के कैंसर वाले मरीजों की पहचान कर सकते हैं।
शोध के लेखकों के अनुसार किडनी-इंजरी-मोलेक्यूल-1 (KIM-1) की जांच बहुत उपयोगी साबित हो सकती है। खासकर उन क्षेत्रों में जहां किडनी के कैंसर होने की संभावना ज्यादा होती है। इस तकनीकी का उपयोग करके बार-बार सीटी स्कैनिंग से भी मरीज को छुटकारा मिल जायेगा। सीटी स्कैनिंग की वजह से मरीजों को रेडियेशन के प्रभावों और अत्यधिक खर्च के बोझ से भी बचाया जा सकता है।
इस शोध का प्रकाशन क्लिनिकल कैंसर रिसर्च जर्नल में किया जा चुका है।
चित्रस्रोत: Shutterstock.
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