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पेट के रोगों का मानसिक कनेक्शन भी हो सकता है क्या आपने कभी सोचा है ? कुछ लोगों में आये दिन पेट की परेशानी बनी रहती है। पेट में दर्द, पेट में गैस बनना, सुबह ठीक से पेट साफ न होना, पेट में मरोड़ रहना जैसे लक्षण जिनको होते हैं वो परेशान इस बात से ज्यादा रहते हैं कि उन्होने तो पेट के लिए सारे टेस्ट करवा लिए लेकिन कोई बीमारी नहीं निकली तो फिर उनको पेट की कौन सी बीमारी है ? आज हम इसी सवाल के जवाब को यहां जानने की कोशिश करगें। पेट में हमेशा दर्द, मरोड़ और गैस वाले मरीज जब सोनोग्राफी, एंडोस्कोपी, कॉलोनिस्कोपी जैसी सारी जांच कराने के बाद भी यह नहीं जान पाते कि कौन सा रोग है तो उनको इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम की बीमारी हो सकती है जो एक तरह से मानसिक बीमारी है। आइए, इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम के बारे में विस्तार से जानते हैं।
इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम की समस्या सामान्यतया युवाओं में पायी जाती है। आंकड़ों की बात करें तो 15 से 18 प्रतिशत युवाओं में यह बीमारी पायी जाती है। इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम की बीमारी सबसे ज्यादा महिलाओं में होती है। पुरुषों की तुलना में अगर देखा जाय तो महिलाओं में इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम बीमारी होने के दोगुने चांस होते हैं ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि महिलाओं में एस्ट्रोजन हॉर्मोन पाया जाता है।
अगर आपको आये दिन पेट में हल्का दर्द, कब्ज, बार-बार दस्त लगना, ठीक से नींद न आना, थकावट बनी रहे और सरदर्द की परेशानी भी रहे तो इसे इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम के लक्षण कह सकते हैं। कुछ लोगों में यह परेशानी आजीवन रहती है। ऐसा नहीं है कि इसका इलाज नहीं हो सकता है इसका इलाज हो सकता है।
इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम बीमारी में बड़ी आंत के संकुचन को संभव बनाने वाली तंत्रिकाओं , मांस पेशी एवं सेरोटोनिन ज़ैसे रसायनों की कार्यप्रणाली में मामूली परिवर्तन होता है। तंत्रिकाओं एवं न्यूरोट्रांसमिटर के क्रियाकलाप में ये मामूली परिवर्तन किसी जांच में नहीं पकड़ा जा सकता अतः सभी जांचें सामान्य आती हैं।
तांत्रिका तंत्र का मुख्य नियंत्रण मस्तिष्क में होता है अतः अवसाद, स्ट्रेस, चिंता , अनिद्रा इत्यादि इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम का कारण भी बनते हैं एवं इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम होने पर ये सब भी होते हैं। अतः मरीज़ का इलाज मस्तिष्क की इन समस्याओं को भी ध्यान में रखकर करना होता है ।
हालांकि इस समस्या में सभी जांचें जैसे रक्त, यूरिन, स्टूल, सोनोग्राफी, एंडोस्कोपी , सी टी स्कैन इत्यादि सामान्य आती हैं किंतु इन जांचों की आवश्यकता डॉक्टर को अन्य बीमारियों की संभावना को देखने हो सकती है। यदि सभी जांचें सामान्य आती हैं लेकिन लक्षण होते हैं तब हम इसे इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम कह सकते हैं ।
इलाज़ मुख्यतः न्यूरोट्रांसमिटर , मस्तिष्क पर आधारित होता है। दवाओं में anxiety, अथवा डिप्रेशन की दवा कुछ माह तक लेनी हो सकती है । कई बार बिना दवा के ही इलाज संभव है। क्योंकि यह बीमारी जीवन पर खतरा नहीं उत्पन्न करती न ही आगे बढ़ती है अतः बिना दवा के भी इसे बेहतर किया जा सकता है। लेकिन अवसाद, अनिद्रा अधिक होने पर दवाईं आवश्यक हैं।
वहीं व्यायाम, जिम, योगा, खेल इत्यादि बेहतर रसायनों, हैप्पी हॉर्मोन एंडोर्फिन का स्त्राव कर स्ट्रेस को कम करते हैं । जिससे इनकी आंतों के संकुचन में मदद मिलती है ।
हफ़्ते में 5 दिन इन मरीजों को व्ययाम अवश्य करना चाहिए ।
इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम के इन मरीजों के लिए ये व्यायाम बेहद कारगर हो सकता है कुछ ही हफ्तों में ।
करना यह है कि सीधे लेट जाएं फिऱ पैरों की उंगलियों, एड़ी को तेज संकुचित करें कुछ सेकंड बाद रिलैक्स कर दें ।
फिऱ यही प्रक्रिया पिंडली, जांघों, हिप, पीठ, हाथों से होते हुए आंखों तक करें। संकुचित और रिलैक्स करने की ।
आंतों के संकुचन और रिलैक्स होने की प्रक्रिया को भी मस्तिष्क लगातार महसूस करता है और इन मरीज़ों में अधिक संवेदनशील हो जाता है इन्हें महसूस करने में ।
इस व्यायाम से मरीज़ को, मस्तिष्क को मदद मिलेगी अनुकूलन में ।
सब कुछ खा सकते हैं किंतु गेहूं एवं दूध की मात्रा कम करके देख सकते हैं।
दरदरे अनाज़, फ़ल , सब्ज़ियां अधिक लेने से रेशे मिलेंगे जो आंतों की सफाई और संकुचन में मदद का कार्य करते हैं।
महीन पिसे अनाज़ जैसे मैदे ,बेसन से बनी चीजें न लें या कम लें तो बेहतर होगा ।
मैडिटेशन अच्छी नींद , अच्छी दिनचर्या, प्रकृति से जुड़ना एवं जीवन की घटनाओं को हल्के से लेना स्ट्रेस फ्री होने में मदद करेगा ।