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हाई ब्लड प्रेशर को हाइपरटेंशन भी कहते हैं। हाई ब्लड प्रेशर आज शहरी जीवन की सामान्य बीमारियों में से एक हो गई है। अपने आस-पास नजर दौड़ाएं तो आपको कोई न कोई एक व्यक्ति हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित दिख जाएगा। एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारतीय शहरों में रहने वाले हर चार वयस्क में से एक उच्च रक्तचाप यानी हाई ब्लड प्रेशर का शिकार पाया गया है। विश्व स्वास्थ संगठन ने भी इस विषय पर चेताया है कि ‘उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) पर नियंत्रण करना दुनियाभर में सरकारी स्वास्थ अधिकारियों के लिए एक बड़ी चुनौती है, मरीजों के साथ-साथ आबादी के स्तर पर भी। आखिर क्या वजह
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सिबिया मेडिकल सेंटर के निदेशक डॉ.एस.एस. सिबिया का कहना है कि हमारा दिल लगातार रक्त वाहिकाओं के जरिए शरीर के विभिन्न हिस्सों को खून सप्लाई करता है। खून के बहाव का दबाव वाहिका की दीवार पर पड़ता है। इसी दबाव की माप को रक्तचाप यानी ब्लड प्रेशर कहते हैं। जब यह दबाव एक निश्चित मात्रा से बढ़ जाता है, तो इसे हाइपरटेंशन या हाइ ब्लड प्रेशर कहा जाता है। किसी भी व्यक्ति में उच्च रक्तचाप को समान्य के बाद तीन भागों में बांट सकते हैं।
इसमें प्रारंभिक, मध्यम व अत्याधिक उच्च रक्तचाप को अलग-अलग स्तरों पर रखते हैं। प्रारंभिक और मध्यम स्तर तक बढ़े हुए रक्तचाप के आमतौर पर कोई खास लक्षण व्यक्ति में नजर नहीं आते। इसी कारण इसे ‘साइलेंट किलर’ की संज्ञा भी दी जाती है।
हाई ब्लड प्रेशर के लक्षणों पर गौर करें तो बार-बार होने वाला सिर दर्द, धुंधला दिखाई देना, नींद न आना, चक्कर आना आदि उच्च रक्तचाप के संकेत हो सकते हैं। उच्च रक्तचाप के द्वारा स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसके कारण हृदय और किडनी डिजीज, मस्तिष्क आघात (ब्रेन स्ट्रोक) आंखों को क्षति पहुंचना जैसे गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
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उच्च रक्तचाप के उपचार के लिए लोग भिन्न-भिन्न पद्धतियां अपनाते हैं। कुछ एलोपैथी पर यकीन करते हैं और कुछ का भरोसा होम्योपैथी पर होता है। इसके अलावा और भी कई तरीकों से उच्च रक्तचाप का उपचार किया जा रहा है। एक्यूपंक्चर की कोरियाई तकनीक एक उपचार पद्धति है, जिसमें हाथों-पैरों की उंगलियों में कुछ खास बिन्दुओं पर सुइयां चुभा कर रोग का उपचार किया जाता है। संगीत के द्वारा भी इस रोग का उपचार किया जाता है। ऐसी संगीत रचनाएं जिनकी ताल इंसान के दिल की धडकन के बराबर (72 प्रति मिनट) होती है, बहुत राहत देने वाली होती है।
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डॉ. सिबिया का कहना है कि दिल के रोगियों के लिए एसीटी प्रक्रिया नया वैकल्पिक उपचार है, जिसमें रक्त धमनियों में हुई ब्लॉकेज (रुकावट) खोलने का काम सफलतापूर्वक किया जाता है। इस उपचार में एक रोगी को तीस बार तक ग्लूकोज में दवाएं मिलाकर ड्रिप दी जाती है, जिसमें लगभग तीन घंटे का समय हर बार लगता है। इसमें रोगी का ऑपरेशन नहीं करना पड़ता है। दूसरा फायदा रोगी को अस्पताल में भर्ती भी नहीं होना होता और तीन घंटे के उपचार के बाद वह खुद घर जा सकता है। दवा पी सकता है और बैठे-बैठे अपना अन्य काम कर सकता है। इस एसीटी प्रक्रिया से हार्ट के रोगियों को काफी राहत मिलती है। इस प्रक्रिया को किलेशन थेरेपी कहते हैं।