
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Written By: Vidya Sharma | Published : June 17, 2026 5:41 PM IST
Medically Verified By: Dr. Mukesh batra
ब्लड क्लॉटिंग
जब खून गाढ़ा हो जाता है और ब्लड वेसल्स के अंदर एक गांठ बन जाती है, तब इसे ब्लड क्लॉट कहा जाता है। मेडिकल भाषा में इसे थ्रोम्बोसिस कहते हैं। इस दौरान ब्लड सर्कुलेशन कुछ समय के लिए या पूरी तरह से रुक जाता है। यह स्थिति गंभीर हो सकती है, खासकर तब जब क्लॉट पैरों, फेफड़ों या दिमाग में बने। लंग्स, ब्रेन या हार्ट में पहुंचा ब्लड क्लॉट जानलेवा स्थिति पैदा कर सकता है, इसलिए इसके लक्षण दिखने पर तुरंत मेडिकल हेल्प लेनी चाहिए। लोगों को किसी खास हिस्से में सूजन, दर्द, गर्माहट या भारीपन जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं, हालांकि कभी-कभी यह बिना किसी लक्षण के भी हो सकता है।
पारंपरिक चिकित्सा की बात करें तो उसमें इस समस्या का इलाज आमतौर पर तुरंत किया जाता है और इसका मुख्य मकसद क्लॉट को बढ़ने या आगे बढ़ने से रोकना होता है। डॉ. बत्राज ग्रुप के संस्थापक और एक प्रसिद्ध भारतीय होम्योपैथ डॉक्टर मुकेश बत्रा बताते हैं कि “होम्योपैथी इस स्थिति को ज्यादा सपोर्टिव और हर व्यक्ति के हिसाब से अलग तरीके से देखती है। इसमें इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि शरीर में खराब सर्कुलेशन या क्लॉट बनने की प्रवृत्ति क्यों पैदा हुई।" आइए हम डॉक्टर के बताए इन तरीकों के बारे में जानते हैं, जो ब्लड क्लॉट को मैनेज करने में मदद कर सकते हैं-
यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की MedlinePlus रिपोर्ट के अनुसार-
मरीज की जांच उसके लक्षणों, मेडिकल हिस्ट्री और शारीरिक बनावट के आधार पर की जा सकती है। इससे ऐसी दवा चुनने में मदद मिल सकती है जो व्यक्ति की स्थिति से सबसे ज्यादा मेल खाती हो। बता दें कि क्लॉटिंग की एक जैसी समस्या वाले दो लोगों को भी अलग-अलग दवाएं दी जा सकती हैं। यह इलाज पूरी तरह से अकेले व्यक्ति के हिसाब से होता है, यानी कि किसी एक व्यक्ति विशेष के आधार पर किया जाता है।
डॉक्टर बत्रा बताते हैं कि “कुछ होम्योपैथिक दवाओं का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से सर्कुलेशन और उससे जुड़े लक्षणों को सपोर्ट करने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए कुछ दवाइयों पर अक्सर तब विचार किया जा सकता है जब दर्द, चोट जैसा एहसास या चोट लगने के कारण क्लॉट बनने का खतरा हो।
होम्योपैथी खून के धीमे बहाव और नसों में जमाव को ठीक करने पर भी ध्यान देती है। इस दौरान नसों में भरापन या दबाव महसूस हो सकता है। इसका मकसद ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाना हो सकता है, लेकिन इसका इस्तेमाल इमरजेंसी में नहीं किया जा सकता है।
ब्लड क्लॉटिंग की रिकवरी को लेकर डॉक्टर बताते हैं कि क्लॉट के पारंपरिक इलाज के बाद, रिकवरी में मदद के लिए होम्योपैथी का इस्तेमाल किया जा सकता है। यह प्रभावित हिस्से में लंबे समय से बने हुए दर्द, सूजन या कमजोरी में मदद कर सकता है। मरीजों को सेफ लिमिट के अंदर एक्टिव रहने की एडवाइज भी दी जाती है। कुछ मरीज रिकवरी के दौरान होम्योपैथी को सपोर्टिव केयर के रूप में अपनाते हैं, हालांकि इसकी प्रभावशीलता को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण सीमित हैं।
एक्सपर्ट ने बताया कि मरीजों को लंबे समय तक इनएक्टिव रहने से बचने और शरीर में पानी की कमी न होने देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। हल्की-फुल्की हलचल और बैलेंस्ड लाइफस्टाइल को जरूरी माना जाता है। खान-पान और स्ट्रेस मैनेजमेंट भी रक्त वाहिकाओं की सेहत में मदद करते हैं। ये आदतें भविष्य में क्लॉट बनने के जोखिम को कम करने में मदद करती हैं।
डिस्क्लेमर: अगर आपको अपनी नसों में गांठ बनती महसूस हो रही है तो उसे अनदेखा न करें। डॉक्टर से परामर्श लें और कोशिश करें कि समय-समय पर नॉर्मल हेल्थ चेकअप करवाते रहें। ब्लड क्लॉट एक मेडिकल इमरजेंसी हो सकती है। होम्योपैथी को कभी भी आपातकालीन या मुख्य उपचार के विकल्प के रूप में नहीं अपनाना चाहिए।