
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Written By: Vidya Sharma | Updated : May 6, 2026 2:51 PM IST
Medically Verified By: Dr. Mukesh batra
होम्योपैथिक में इलाज
हम अक्सर अपनी बीमारियों को ठीक करने के लिए अंग्रेजी दवाइयों का सहारा लेते हैं, लेकिन कुछ क्रोनिक डिजीज ऐसी होती हैं जिन्हें ठीक करने के लिए लोग होम्योपैथी का सहारा लेते हैं। क्रॉनिक डिजीज वह बीमारियां होती हैं जो लंबे समय या सरल शब्दों में कहें तो 3 महीने से अधिक या जीवन भर रहती हैं। लेकिन क्या होम्योपैथी में इन क्रोनिक बीमारियों का इलाज संभव है? यह जानने के लिए हमने होम्योपैथी डॉक्टर मुकेश बत्रा से बात की।
उन्होंने बताया कि 'पुरानी बीमारियां अब आधुनिक समय की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन गई हैं। डब्लूयएचओ और आईसीएमआर के डेटा के अनुसार गैर-संक्रामक बीमारियों (NCDs) के कारण दुनिया भर में होने वाली मौतों में से लगभग 75% और भारत में 60–65% से ज्यादा मौतें होती हैं, जो एक बहुत बड़े और बढ़ते बोझ को दिखाता है। लाखों लोग लंबे समय से बीमारियों के साथ जी रहे हैं, इसलिए बहुत से लोग पारंपरिक इलाज के साथ-साथ होम्योपैथी जैसी थैरेपीज को भी आजमा रहे हैं।
डॉक्टर बताते हैं कि ‘हालांकि होम्योपैथी कोई आजमाया हुआ इलाज नहीं है, फिर भी इसका इस्तेमाल अक्सर लक्षणों को नियंत्रित करने और पूरी हेल्थ को बेहतर बनाने में मदद के लिए किया जाता है।’ इसलिए आज हम इस लेख में आपको पांच मुख्य पुरानी बीमारियों के बारे में बताने वाले हैं और साथ ही यह भी बताया गया है कि होम्योपैथी इनमें कैसे भूमिका निभा सकती है।
WHO के अनुसार डायबिटीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। WHO के अनुसार भारत में लगभग 77 मिलियन लोग (18+ age) डायबिटीज से प्रभावित हैं। IDF के 2024 के डेटा के अनुसार भारत में लगभग 89.8 मिलियन एडल्ट (10.5%) डायबिटीज के साथ जी रहे हैं।
होम्योपैथी का सारा जोर मेटाबोलिक बैलेंस को बेहतर बनाना व थकान, प्यास और तनाव जैसे लक्षणों को कम करने पर होता है। इसमें दी जाने वाली दवाएं हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग होती हैं। ये सिर्फ ब्लड शुगर के स्तर को कंट्रोल करने के बजाय व्यक्ति की शारीरिक बनावट और प्रकृति के अनुसार दी जाती हैं।
यह पाचन को बेहतर और मीठा खाने की क्रेविंग को कम करता है, जिससे सही और बेहतर तरीके से ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है। होम्योपैथिक इंसुलिन, एब्रोमा ऑगस्टा और यूरेनियम नाइट्रिकम जैसी दवाएं ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने और बार-बार पेशाब आने व मुंह सूखने जैसे लक्षणों को दूर करने में काफी असरदार साबित हुई हैं।
डॉक्टर बताते हैं कि भारत में 30% से ज्यादा एडल्ट को हाई बीवी प्रभावित करता है। यानी कि 200 मिलियन से ज्यादा लोगों को और दुनिया भर में भी इसकी स्थिति लगभग ऐसी ही है। डॉक्टर कहते हैं कि अक्सर इसके कई लक्षण दिखाई नहीं देते, लेकिन यह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ा देता है।
होम्योपैथी का उद्देश्य तनाव, चिंता और खराब लाइफस्टाइल जैसी समस्याओं के मूल कारणों को दूर करना है। यह तनाव के कारण अचानक बढ़ जाने वाले ब्लड प्रेशर को कम करने में भी मदद करता है। उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने के लिए होम्योपैथी में आमतौर पर रौवोल्फिया सर्पेन्टाइना का इस्तेमाल किया जाता है।
डॉक्टर बत्रा कुछ आंकड़ों का हवाला देते हुए बताते हैं कि 'बढ़ती उम्र के साथ-साथ गठिया की समस्या भी तेजी से आम होती जा रही है। दुनिया भर में, लगभग 15-20% लोग किसी न किसी प्रकार के गठिया से पीड़ित हैं, और भारत में भी ऐसे मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है।' साथ ही वह कहते हैं कि होम्योपैथिक दवाएं लक्षणों के पैटर्न के आधार पर चुनी जाती हैं और सूजन और बेचैनी कम करने में मदद कर सकती हैं। रुस टॉक्सिकोडेंड्रोन का इस्तेमाल अक्सर जोड़ों की अकड़न और दर्द के लिए किया जाता है, जो आराम करने पर और बढ़ जाता है।
पुरानी सांस की बीमारियां दुनिया भर में करोड़ों लोगों को प्रभावित करती हैं। एक्सपर्ट बताते हैं कि दुनिया में लगभग 26 करोड़ लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं। जबकि कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक अकेले भारत में वैश्विक अस्थमा के लगभग 13 प्रतिशत मामले सामने आए हैं हाल के अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि अकेले COPD ही लगभग 13% भारतीय वयस्कों (18 साल से बड़े) को प्रभावित कर सकता है, जो एक बड़ी और बढ़ती हुई समस्या को उजागर करता है।
होम्योपैथी का इस्तेमाल अक्सर धूल और एलर्जी पैदा करने वाली चीजों के प्रति संवेदनशीलता को कम करने के लिए किया जाता है। यह सांस लेने की क्षमता को भी मजबूत करती है और मौसम बदलने पर होने वाले लक्षणों की बार-बार वापसी को कम करने में मदद करती है। आर्सेनिकम एल्बम का इस्तेमाल अक्सर सांस फूलने और अस्थमा के लक्षणों के लिए किया जाता है, खासकर रात के समय।
WHO की रिपोर्ट के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं, खासकर डिप्रेशन, अब एक बड़ी और पुरानी चिंता बन गई हैं। दुनिया भर में, 280 मिलियन से ज्यादा लोग डिप्रेशन से पीड़ित हैं। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार अकेले भारत में ही, अनुमान है कि लगभग 197–200 मिलियन लोग मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे हैं, जिनमें मुख्य रूप से एंग्जायटी और डिप्रेशन शामिल हैं। लगभग 60% मामले 35 साल से कम उम्र के लोगों में देखे जाते हैं।
माना जाता है कि लगभग 10–13% लोगों में ऐसी कोई बीमारी होती है जिसका निदान किया जा सकता है, फिर भी चौंकाने वाली बात यह है कि 70–90% लोगों को सही इलाज नहीं मिल पाता है। होम्योपैथी मेंटल हेल्थ को अलग-अलग देखने की बजाय एक इकाई के तौर पर देखती है, जिसमें इमोशनल पैटर्न और स्ट्रेस पर विचार किया जाता है। यह समय के साथ एंग्जायटी को कम करने और व्यक्ति को भावनात्मक रूप से मजबूत बनने में भी मदद करती है।
डिस्क्लेमर- होम्योपैथी एक समग्र दृष्टिकोण अपनाती है, जो सिर्फ बीमारी पर नहीं, बल्कि व्यक्ति पर ध्यान केंद्रित करती है। यह पुरानी बीमारियों में लक्षणों को नियंत्रित करने, जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने और भावनात्मक स्वास्थ्य को सहारा देने में मददगार हो सकता है। पुरानी बीमारियों के इलाज और प्रबंधन के लिए हमेशा किसी योग्य होम्योपैथी विशेषज्ञ से सलाह लें।
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