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ग्लूटेन एक प्रकार का प्रोटीन है जो गेहूं, राई, जौ जैसे अनाजों में पाया जाता है। इन अनाजो से बनी चीज़ों में भी यह ग्लूटेन मौजूद होता है। जैसे रवा या सूजी, दलिया, सेवइयां, पास्ता और मैदा गेहूं से बने उत्पाद हैं, इनमें भी ग्लूटेन होता है। कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसे ग्लूटेन से एलर्जी है उन्हें ग्लूटेन-फ्री डायट की सलाह दी जाती है। लेकिन क्या ऐसे लोग जिन्हें ग्लूटेन-सेंसिटीविटी नहीं है, उन्हें ग्लूटेन-फ्री भोजन खाना ज़रूरी है? और सचमुच में किसे ग्लूटेन-फ्री डायट खानी चाहिए? रोहिणी एस., फूड साइंटिस्ट, नुट्रीपैराडाइज़, सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट्यूशन इस बारे में बता रही हैं विस्तार से।
ग्लूटेन-फ्री डायट किसे खानी चाहिए?
ग्लूटेन गेहूं, राई और जौ में मौजूद प्रोटीन है। सेलियक रोग वाले व्यक्ति थोड़ी-सी मात्रा में भी ग्लूटेन बर्दाश्त नहीं कर पाते। ऐसे लोगों को ग्लूटेन-फ्री डायट खानी चाहिए क्योंकि ग्लूटेन इन लोगों में एक तरह की इम्यून प्रतिक्रिया कराते हैं जो ऐसी एंटीबॉडिज़ का निर्माण करते हैं जो भोजन के अवशोषण के दौरान आंत में ग्लूटेन से छुटकारा पाने की कोशिश करती हैं।
क्या नॉन-सेलियक ग्लूटेन सेंसिटिविटी एक वास्तविक चीज़ है?
जी हां, नॉन-सेलियक ग्लूटेन सेंसिटिविटी या एनसीजीएस (non-celiac gluten sensitivity) एक वास्तविक चीज है। यह रोग एक ऑटोइम्यून आनुवंशिक रूप से पूर्वव्यापी स्थिति है। सेलियक बीमारी से पीड़ित लोग ग्लूटेन वाला भोजन नहीं खा सकते। ग्लूटेन खाने से, रोग- प्रतिरोधक प्रणाली छोटी आंत की आंतरिक परत को नुकसान पहुंचाता है, इस समस्या को विली (villi) भी कहा जाता है। आंत की सूजन के कारण, पोषक तत्वों के अवशोषण से संबंधित अन्य बीमारियां हो सकती हैं। यह एक सिंड्रोम है, जिसमें ग्लूटेन सेंसिटीविटी के लिए कोई आनुवंशिक गड़बड़ी नहीं हो सकती है और फिर भी एंटीबॉडी के उत्पादन के बिना व्यक्ति सेलियक रोग के लक्षणों से ग्रस्त है। इस समस्या का अंदाज़ा खुद ही लगता है और एनसीजीएस के लिए पैथोलॉजी की अभी तक खोज की जा रही है।
नॉन-सेलियक ग्लूटेन सेंसिटिविटी का पता कैसे लगाया जा सकता है?
एनसीजीएस की शिकायत अक्सर रोगियों द्वारा खुद की जाती हैं। पेट में दर्द, मतली, कब्ज, दस्त, उल्टी, सिरदर्द, थकान, और रैशेज जैसी समस्याओं की मदद से मरीज़ खुद ही इसका पता लगा सकते हैं। अगर ये लक्षण दिखायी पड़ते हैं, तो इंस्टेटाइनल सेल्स में एंटीबॉडी की उपस्थिति की जांच करने के लिए हिस्टोलॉजिकल डायग्नोसिस किया जा सकता है।
क्या लो एफओडीएमएपी डायट (FODMAP diet) एक ग्लूटेन-फ्री डायट है:
लो एफओडीएमएपी (फेमेन्टनीय ऑलिगोसेकेराइड डिसैकैराइड्स मॉनोसैकेराइड और पॉलिऑल्स) डायट ग्लूटेन-फ्री डायट होती है। इस तरह के आहार में, ग्लूटेन वाली चीज़ें (गेहूं, राई और जौ) को पूरी तरह नज़रअंदाज किया जाता है। कई स्टडीज़ में ऐसा भी कहा गया है कि एफओडीएमएपी डायट सचमुच में एनसीजीएस और सेलियक बीमारियों के लक्षणों को कम करने में मदद करती है।
ग्लूटेन इनटॉलरेंस या सेंसिटीविटी के लक्षण क्या हैं
ग्लूटेन इनटॉलरेंस एक ऑटोइम्यून एंटरोपैथी है जहां शरीर ग्लूटेन को एक खतरे के रूप में देखता है और इसके खिलाफ लड़ने के लिए एंटीबॉडी उत्पन्न करते हैं। इससे छोटी आंत की आंतरिक सतह में सूजन होती है। जब ग्लूटेन सेंसिटीविटी वाले लोग ग्लूटेन खाते हैं, तो उन्हें पेट में दर्द, डायरिया, रैशेज़, सिरदर्द, चक्कर आना, खुजली और एक्जिमा जैसी समस्याएं महसूस हो सकती है। सेंसिटीविटी के बावजूद लगातार ग्लूटेन खाने के कारण सूजन वाली छोटी आंत के माध्यम से मैलेब्रोशोप्शन के कारण अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी भी होने लगती है।
क्या ग्लूटेन-फ्री डायट सचमुच डिटॉक्स करने में मदद करते हैं?
ग्लूटेन-फ्री डायट वास्तव में हमारे सिस्टम के लिए एक डिटॉक्स (detox) ही है? एक ग्लूटेन-फ्री डायट आपको आपके सिस्टम से ग्लूटेन को निकालने में मदद कर सकता है। यह ग्लूटेन की वजह से होने वाले नुकसान से आपकी छोटी आंत को आराम दिला सकता है और लक्षणों को खत्म करने में आपकी सहायता कर सकता है। नुकसान से राहत प्रक्रिया की गंभीरता के आधार पर इसमें कई महीनों तक का समय लग सकता है। आप अपने ग्लूटेन-फ्री डायट को अधिक गंभीरता से लेना चाहिए, तो आपको रिकवरी में जल्दी होती है।
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अनुवादक-Sadhana Tiwari
चित्रस्रोत- Shutterstock