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जानिए कैसे आपका मोटापा आपकी हड्डियों और जोड़ों को प्रभावित कर सकता है?

मोटापे जैसी शारीरिक स्थिति से बचने के लिए रोजाना थोड़ी बहुत एक्सरसाइज करना और हेल्दी लाइफस्टाइल का पालन करना काफी जरूरी है। अगर हार्मोन्स में असंतुलन है और ऐसी स्थिति का कम उम्र में सामना करना पड़ रहा है तो तुरंत इलाज करना शुरू कर दें।

Written By Atul Modi
Published : March 3, 2022 8:10 PM IST

मोटापा शरीर के लिए एक हानिकारक स्थिति होती है। इसमें शरीर में अतिरिक्त मात्रा में फैट जमा हो जाता है। इसके कारण शारीरिक गतिविधि करना मुश्किल हो जाता है और यह बहुत से रोगों का कारण होती है। शरीर में मोटापा होने की वजह से जोड़ों और हड्डियों पर भी काफी प्रेशर पड़ता है। इससे शरीर में हार्मोन्स और मेटाबॉलिज्म भी प्रभावित होते हैं जिस कारण इंफ्लेमेशन बढ़ सकता है।

WHO के मुताबिक ओबेसिटी की श्रेणी में वह लोग आते हैं जिनका बीएमआई 30 से ऊपर हो जाता है। अगर बीएमआई 25 से ऊपर है तो ओवर वेट की श्रेणी में रखा जाता है। 2016 में हुई एक स्टडी के मुताबिक दुनिया भर में 39% लोग मोटापे के शिकार हैं। 1975 से यह संख्या 75% बढ़ गई है। पिछले दो दशकों में लोगों की डाइट्री आदतों में काफी बदलाव देखने को मिला है। लोग हाई फैट और शुगर से युक्त चीजों का अधिक सेवन करना पसंद कर रहे हैं। लोगों की शारीरिक गतिविधियों में भी काफी कमी देखने को मिल रही है। इन कारणों की वजह से ही ओबेसिटी एक मुख्य समस्या बनती जा रही है। प्रतिदिन यह समस्या बढ़ती हुई ही देखी जा रही है और ओबेसिटी के बढ़ने से दिल की बीमारियों और डायबिटीज, कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का रिस्क भी बढ़ता जा रहा है। आइए जानते हैं मोटापे का जोड़ों और हड्डियों पर प्रभाव।

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मोटापे का जोड़ों पर प्रभाव

ओस्टियो अर्थराइटिस और रूमेटाइड अर्थराइटिस जोड़ों को प्रभावित करने वाली दो स्थितियां हैं। ओस्टियो अर्थराइटिस गतिविधियों और उम्र के साथ होने वाली जोड़ों की समस्या है। जबकि रूमेटॉयड अर्थराइटिस एक तरह की ऑटो इम्यून डिजीज है जो जोड़ों और अन्य टिश्यू को प्रभावित करती है। मोटापा इन दोनों ही शारीरिक स्थितियों का रिस्क बढ़ाता है और जोड़ों को बुरी तरह प्रभावित करता है।

मोटापा और ओस्टियो अर्थराइटिस

ओबेसिटी का जोड़ों पर फिजिकल और केमिकल दो तरह से असर पड़ता है। मोटापे से बढ़ने वाला मेकेनिकल ओवर लोड कार्टिलेज डिजनरेशन का रिस्क बढ़ाता है जो घुटनों और हिप्स को प्रभावित करता है। शरीर का फैट टिश्यू शरीर में कुछ केमिकल्स उत्पादित करते हैं जिसका असर कार्टिलेज डेमेज होता है। रिसर्च में यह साबित हुआ है कि ओए का रिस्क बढ़ने से घुटने, हिप्स, कलाई और हाथों के जोड़ों का रिस्क बढ़ता है।

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मोटापा और रूमेटॉयड अर्थराइटिस

इस स्थिति में साइटोकाइंस द्वारा शरीर के ज्वाइंट और टिश्यू में डेमेज होता है। ओबीस लोगों में फैट टिश्यू साइटोकाइन्स रिलीज करते हैं जिससे जाइंट्स में इंफ्लेमेशन पैदा होता है। ओबेसिटी से आरए का रिस्क बढ़ता है जिससे इलाज का भी असर कम मिलता है और जोड़ अधिक प्रभावित होते हैं।

ओबेसिटी और बोन मास

ओस्टियोपोरोसिस बोन मास का लॉस होता है जिसमें हड्डियों में चोट लग जाती है और फ्रैक्चर होने का रिस्क बढ़ जाता है। बॉडी फैट से बोन मास बढ़ता है। इससे मोटे लोगों में मेकेनिकल लोड बढ़ता है और फैट टिश्यू में एस्ट्रोजन का उत्पादन बढ़ता है। इस प्रकार मोटापे से हिप्स के फ्रैक्चर के प्रति सुरक्षित नतीजे देखने को मिले हैं। कुछ स्टडीज में यह भी देखा गया की बॉडी फैट के अधिक बढ़ जाने से बोन मास कम हो जाता है और इससे फ्रैक्चर का रिस्क बढ़ जाता है।

निष्कर्ष

ओबेसिटी से हड्डियों और जोड़ों पर एक नकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है। यह एक तरह की फिजिकल डिसेबिलिटी का प्रमुख कारण बनती है। मोटापे जैसी शारीरिक स्थिति से बचने के लिए रोजाना थोड़ी बहुत एक्सरसाइज करना और हेल्दी लाइफस्टाइल का पालन करना काफी जरूरी है। अगर हार्मोन्स में असंतुलन है और ऐसी स्थिति का कम उम्र में सामना करना पड़ रहा है तो तुरंत इलाज करना शुरू कर दें।

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