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डिटॉक्सिफिकेशन प्रक्रिया में आमतौर पर संतुलित खानपान और लाइफस्टाइल से सम्बंधित बदलाव किया जाता है। इस प्रक्रिया को आपके शरीर का डिटॉक्सिफिकेशन सिस्टम को बेहतर करने के लिए डिज़ाइन किया गया हैं। आपको बाजार में बहुत सारे डिटॉक्स डाइट मिलेंगी जो विटामिन, मिनिरल्स, मूत्रवर्धक, जुलाब और चाय जैसी डिटॉक्सिफाइंग गुणों वाली चीजें होती है। दुर्भाग्य से डिटॉक्सिफिकेशन और वजन घटाने में इन डाइट की प्रभावशीलता को लेकर बहुत ही कम सबूत मौजूद है। आइए कुछ सरल तरीकों पर नज़र डालते हैं जिसकी मदद से आपके शरीर की प्राकृतिक डिटॉक्सिफिकेशन प्रक्रिया को बेहतर किया जा सकता है।
आपके द्वारा पी जाने वाली शराब का 90 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा लीवर में मेटाबोलाइज्ड होता है। शराब का सेवन लीवर को नुकसान पहुंचाता है, जिससे फैट का निर्माण होता है, लीवर के ऊतकों में सूजन और निशान पड़ जाते हैं। यह लीवर को उसकी क्षमता पर काम करने में बाधा डालता है, जिससे आपके शरीर से विषाक्त पदार्थों को खत्म करने के काम में परेशानी पहुँचती है। अगर आप चाहते हैं कि आपके शरीर का डिटॉक्सिफिकेशन सिस्टम मजबूत बना रहे तो शराब के सेवन से बचना जरूरी है।
हर रात आठ घंटे की नींद लेना आपके शरीर के डिटॉक्सीफिकेशन सिस्टम को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण होता है। नींद मस्तिष्क को खुद को रिचार्ज करने और विषाक्त पदार्थों के इकठ्ठा होने से रोकने में मदद मिलती है। अगर आप अपने आप को पर्याप्त नींद नहीं दे पाते हैं तो आपके शरीर को विषाक्त पदार्थों को खत्म करने का समय नहीं मिल पायेगा जिसके परिणामस्वरूप बहुत सारे नुकसान आपको हो सकते हैं। कई रिसर्च ने खराब और कम नींद को चिंता, तनाव, डायबिटीज, हृदय की बीमारी, हाई ब्लड प्रेशर और मोटापे से जुड़ा हुआ पाया है। अगर आपको सोने में कठिनाई होती है, तो एक सख्त शेड्यूल का पालन करें और सुनिश्चित करें कि आप सोने से पहले कम से कम आधे घंटे कंप्यूटर स्क्रीन और मोबाइल का इस्तेमाल करना बंद कर दें।
पानी शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है, जॉइंट्स (जोड़ों) को चिकनाई प्रदान है, पोषक तत्वों के अवशोषण और पाचन में मदद करता है और शरीर को डिटॉक्सीफाई करता है। भोजन में मौजूद पोषक तत्वों को उपयोगी ऊर्जा में तोड़कर कोशिकाओं को ठीक से काम करने के लिए खुद को हाइड्रेट रखना जरूरी है। इस प्रक्रिया से सिस्टम में अपशिष्ट पदार्थ बनता है, जिससे हानिकारक परिणाम होता है। पानी पेशाब और पसीने के जरिए अपशिष्ट को बाहर निकालने में मदद करता है। हर दिन कम से कम 3 लीटर पानी पीने का नियम बनाना चाहिए। पानी की यह मात्रा आपके खानपान और आपके द्वारा हर रोज किये जाने वाले एक्सरसाइज के लेवल के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। अपने शरीर के लिए पानी की सटीक जरूरतों को जानने के लिए अपने डॉक्टर से कंसल्ट करें।
सल्फर युक्त खाद्य पदार्थ जैसे प्याज, लहसुन और ब्रोकली हानिकारक भारी धातुओं के प्रतिकूल प्रभावों का मुकाबला करने में मदद करते हैं। वे ग्लूटाथियोन के कामकाज को बेहतर करने में भी मदद करते हैं। एंटीऑक्सिडेंट डिटॉक्सिफिकेशन में प्रमुख भूमिका निभाता है। सीताफल के साथ भोजन को गार्निश करें क्योंकि यह शरीर को कीटनाशकों और फथैलेट्स (Phthalates) को बाहर निकालने में मदद करता है। डिटॉक्सिफिकेशन सिस्टम को अच्छा बनाए रखने के लिए आंत का स्वास्थ्य अच्छा होना महत्वपूर्ण है। अपने पेट को स्वस्थ रखने के लिए आपको आर्टिचोक, टमाटर, शतावरी, केला, जई, प्याज और लहसुन जैसे ज्यादा प्रीबायोटिक खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए। ये खाद्य पदार्थ आंत के स्वस्थ बैक्टीरिया खाते हैं, जिससे उन्हें फैटी एसिड बनाने में मदद मिलती है, फैटी एसिड आपके स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता हैं।
शुगर (चीनी) और जंक फूड का ज्यादा सेवन हमारे स्वास्थ्य को ख़राब बना सकता है। इससे डायबिटीज, मोटापा, हृदय की बीमारी और कैंसर हो सकता है। ये सभी बीमारियां आपके शरीर की डिटॉक्सिफिकेशन प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाती हैं, किडनी और लीवर जैसे अंगों पर हानिकारक प्रभाव डालती है। स्वीट ड्रिंक और जंक फूड फैटी लीवर को बढ़ाते हैं, जिससे डिटॉक्सिफिकेशन कठिन हो जाता है। आप जंक फ़ूड या शुगर का ज्यादा सेवन कर रहे हैं और इसका प्रभाव आप डिटॉक्सिफिकेशन पर जानना चाहते हैं तो आप शरीर में ट्राइग्लिसराइड्स के लेवल को जानने के लिए खून की जांच करवा सकते हैं। अगर यह लेवल 150mg/dl से ज्यादा है, तो आपको जंक फूड को पूरी तरह से न बोलना होगा। इसके बजाय आपको साबुत अनाज, और फाइबर युक्त फलों और सब्जियों को खाने पर जोर देगा।
डॉ श्रीकांत एच के अनुसार, अगर आप डिटॉक्सिफिकेशन तरीके को अमल में लाने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं तो इस प्रक्रिया को शुरू करने से पहले आपको अपने डॉक्टर या नेचुरोपैथ से कंसल्ट करने की सलाह दी जाती है। हर किसी का बॉडी मास इंडेक्स, डेली रूटीन और मेटाबॉलिज्म रेट अलग-अलग होता है, और कोई भी खानपान में बदलाव करने से पहले इन सभी फैक्टर को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
(इनपुट्स: डॉ श्रीकांत एच., सीनियर नेचुरोपैथ, जिंदल नेचरक्योर इंस्टीट्यूट)