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यज्ञ के पीछे एक सांइटिफिक कारण होता है क्योँकि यज्ञ मेँ सब जड़ी बूटियाँ ही डाली जाती हैँ। © Shutterstock
क्या आप भी विशेष अवसरों पर यज्ञ कर ईश्वर का शुक्रियादा करते हैं। भारतीय सनातन परंपरा में मौजूद शुक्राने की यह आदत सिर्फ आध्यात्मिक शांति ही नहीं देती, बल्कि इसके कई वैज्ञािनिक स्वास्थ्यकर लाभ भी हैं। आम की लकड़ी, देशी घी, तिल, जौं, शहद, कपूर, अगर तगर, गुग्गुल, लौंग, अक्षत, नारियल शक्कर और अन्य निर्धारित आहूतियांं बनस्पतियाँ मानी गई हैं। आयुर्वेद ने इन्हें औषधियों की संज्ञा दी है। वहीं नवग्रह के लिए आक, पलाश, खैर,शमी,आपामार्ग, पीपल, गूलर, कुश, दूर्वा आदि सब आयुर्वेद मेँ प्रतिष्ठित आषधियां हैँ। यज्ञ में मंत्रोंच्चार के साथ इन्हें अर्पित किया जाता है। मंत्रोंच्चार और पवित्र औषधियों के धुएं से आंतरिक बाह्य और मानसिक शुद्धि भी होती है। साथ ही मानसिक और शारीरिक बल तथा सकारात्मक ऊर्जा भी मिलती है।
क्या कहता है विज्ञान
यज्ञ मेँ जो आहूतियांं देते है, वह अग्नि यानी हाई टेम्परेचर मेँ ऑर्गेनिक मैटीरियल (Organic material) जल जाता है और इनऑर्गेनिक (inorgnic residue) शेष रह जाता है जो दो प्रकार का होता है। एक ओर कई complex chemical compounds टूट कर सिम्पल या सरल रूप मेँ आ जाते है वहीँ कुछ सरल और जटिल react कर और अधिक complex compound बनाते हैँ। ये सब यज्ञ के धुएं के साथ शरीर मेँ श्वास और त्वचा से प्रवेश करते हैँ और उसे स्वस्थ बनाते हैँ।
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लाभदायक हैं एल्केलॉइड
सभी वनस्पतियों में कुछ तरल/तैलीय द्रव्य होते हैं जिन्हे विज्ञान की भाषा में एल्केलॉइड कहा जाता है। आज वैज्ञानिक इन्ही एलेकेलॉइड्स पर शोध कर विभिन्न पौधों से कई नई दवाइयाँ बना रहे हैं। यज्ञ या हवन में जब ये वनस्पतियां जलती हैं तो ये अल्केलॉइड्स धुएं के साथ उड़ कर आपके शरीर से चिपक जाते हैं और और श्वास से भीतर जाते हैं और धुआं मनुष्य के शरीर में सीधे असरकारी होता है और यह पद्वति दवाओं की अपेक्षा सस्ती और टिकाउ भी है। यानि सिर्फ हवन करने से ही नही. बल्कि हवन में हिस्सा लेने और उसके धुएं से भी आप विभिन्न रोगों से बच सकते हैं और अपने शरीर को स्वस्थ बना सकते हैं।
यज्ञ की भभूत भी है काम की
यज्ञ की शेष भभूत सिर्फ चुटकी भर माथे पर लगाने और खाने पर बेहद लाभ देती है क्योँकि ये भभूत micronised/ nano particles के रूप मेँ होती है और शरीर के द्वारा बहुत आसानी से अवशोषित(absorb) कर ली जाती है। जिस हवन मेँ जौँ एवं तिल मुख्य घटक यानि आहूति सामग्री के रूप मेँ उपयोग किये गये होँ बहाँ से थोड़ी सी भभूत प्रसाद स्वरूप ले लेँ और बुखार, खाँसी, पेट दर्द, कमजोरी तथा मूत्र विकार आदि मेँ एक चुटकी सुबह शाम पानी से फाँक ले तो दो तीन दिन मेँ ही आराम मिल जाता है।
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हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है। © Shutterstock
क्या कहती है हवन पर हुई वैज्ञानिक खोजें
क्या हो हवन की समिधा (जलने वाली लकड़ी)
समिधा के रूप में आम की लकड़ी सर्वमान्य है, परन्तु अन्य समिधाएँ भी विभिन्न कार्यों हेतु प्रयुक्त होती हैं।
सूर्य की समिधा मदार की, चन्द्रमा की पलाश की, मङ्गल की खैर की, बुध की चिड़चिडा की, बृहस्पति की पीपल की, शुक्र की गूलर की, शनि की शमी की, राहु दूर्वा की और केतु की कुशा की समिधा कही गई है।
मदार की समिधा रोग को नाश करती है, पलाश की सब कार्य सिद्ध करने वाली, पीपल की प्रजा (सन्तति) काम कराने वाली, गूलर की स्वर्ग देने वाली, शमी की पाप नाश करने वाली, दूर्वा की दीर्घायु देने वाली और कुशा की समिधा सभी मनोरथ को सिद्ध करने वाली होती है।
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आक, पलाश, खैर,शमी,आपामार्ग, पीपल, गूलर, कुश, दूर्वा आदि सब आयुर्वेद मेँ प्रतिष्ठित आषधियाँ हैँ। © Shutterstock
हव्य (आहुति देने योग्य द्रव्यों) के प्रकार
प्रत्येक ऋतु में आकाश में भिन्न-भिन्न प्रकार के वायुमण्डल रहते हैं। सर्दी, गर्मी, नमी, वायु का भारीपन, हलकापन, धूल, धुआंं, बर्फ आदि का भरा होना। विभिन्न प्रकार के कीटणुओं की उत्पत्ति, वृद्धि एवं समाप्ति का क्रम चलता रहता है। इसलिए कई बार वायुमण्डल स्वास्थ्यकर होता है। कई बार अस्वास्थ्यकर हो जाता है। इस प्रकार की विकृतियों को दूर करने और अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने के लिए हवन में ऐसी औषधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं, जो इस उद्देश्य को भली प्रकार पूरा कर सकती हैं।
होम द्रव्य 4 प्रकार के कहे गए हैं
सामान्य हवन सामग्री
तिल, जौं, सफेद चन्दन का चूरा , अगर , तगर , गुग्गुल, जायफल, दालचीनी, तालीसपत्र , पानड़ी , लौंग , बड़ी इलायची , गोला , छुहारे नागर मौथा , इन्द्र जौ , कपूर कचरी , आँवला ,गिलोय, जायफल, ब्राह्मी तुलसी किशमिशग, बालछड़ , घी।