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विशेष अवसरों पर करते हैं हवन, तो जान लें इसके फायदे

यज्ञ के पीछे एक सांइटिफिक कारण होता है क्‍योंकि यज्ञ मेँ सब जड़ी बूटिया ही डाली जाती हैँ।

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Written By: Yogita Yadav | Updated : October 17, 2018 12:10 PM IST

क्‍या आप भी विशेष अवसरों पर यज्ञ कर ईश्‍वर का शुक्रियादा करते हैं। भारतीय सनातन परंपरा में मौजूद शुक्राने की यह आदत सिर्फ आध्‍यात्मिक शांति ही नहीं देती, बल्कि इसके कई वैज्ञाि‍निक स्‍वास्‍थ्‍यकर लाभ भी हैं। आम की लकड़ी, देशी घी, तिल, जौं, शहद, कपूर, अगर तगर, गुग्गुल, लौंग, अक्षत, नारियल शक्कर और अन्य निर्धारित आहूतियांं बनस्पतियाँ मानी गई हैं। आयुर्वेद ने इन्‍हें औषधियों की संज्ञा दी है। वहीं नवग्रह के लिए आक, पलाश, खैर,शमी,आपामार्ग, पीपल, गूलर, कुश, दूर्वा आदि सब आयुर्वेद मेँ प्रतिष्ठित आषधियां हैँ। यज्ञ में मंत्रोंच्‍चार के साथ इन्‍हें अर्पित किया जाता है। मंत्रोंच्‍चार और पवित्र औषधियों के धुएं से आंतरिक बाह्य और मानसिक शुद्धि भी होती है। साथ ही मानसिक और शारीरिक बल तथा सकारात्मक ऊर्जा भी मिलती है।

क्‍या कहता है विज्ञान 

यज्ञ मेँ जो आहूतियांं देते है, वह अग्नि यानी हाई टेम्परेचर मेँ ऑर्गेनिक मैटीरियल (Organic material) जल जाता है और  इनऑर्गेनिक (inorgnic residue)  शेष रह जाता है जो दो प्रकार का होता है। एक ओर कई complex chemical compounds टूट कर सिम्पल या सरल रूप मेँ आ जाते है वहीँ कुछ सरल और जटिल react कर और अधिक complex compound बनाते हैँ। ये सब यज्ञ के धुएं के साथ शरीर मेँ श्वास और त्वचा से प्रवेश करते हैँ और उसे स्वस्थ बनाते हैँ।

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लाभदायक हैं एल्‍केलॉइड

सभी वनस्पतियों में कुछ तरल/तैलीय द्रव्य होते हैं जिन्हे विज्ञान की भाषा में एल्केलॉइड कहा जाता है। आज वैज्ञानिक इन्ही एलेकेलॉइड्स पर शोध कर वि‍भिन्न पौधों से कई नई दवाइयाँ बना रहे हैं। यज्ञ या हवन में जब ये वनस्पतियां जलती हैं तो ये अल्केलॉइड्स धुएं के साथ उड़ कर आपके शरीर से चिपक जाते हैं और और श्वास से भीतर जाते हैं और धुआं मनुष्य के शरीर में सीधे असरकारी होता है और यह पद्वति दवाओं की अपेक्षा सस्ती और टिकाउ भी है। यानि सिर्फ हवन करने से ही नही. बल्कि हवन में हिस्सा लेने और उसके धुएं से भी आप विभिन्न रोगों से बच सकते हैं और अपने शरीर को स्वस्थ बना सकते हैं।

यज्ञ की भभूत भी है काम की

यज्ञ की शेष भभूत सिर्फ चुटकी भर माथे पर लगाने और खाने पर बेहद लाभ देती है क्योँकि ये भभूत micronised/ nano particles के रूप मेँ होती है और शरीर के द्वारा बहुत आसानी से अवशोषित(absorb) कर ली जाती है। जिस हवन मेँ जौँ एवं तिल मुख्य घटक यानि आहूति सामग्री के रूप मेँ उपयोग किये गये होँ बहाँ से थोड़ी सी भभूत प्रसाद स्वरूप ले लेँ और बुखार, खाँसी, पेट दर्द, कमजोरी तथा मूत्र विकार आदि मेँ एक चुटकी सुबह शाम पानी से फाँक ले तो दो तीन दिन मेँ ही आराम मिल जाता है।

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ygya-benefits-3 हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है। © Shutterstock

क्या कहती है हवन पर हुई वैज्ञानिक खोजें

  • एक वेबसाइट रिपोर्ट के अनुसार फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमे उन्हें पता चला की हवन मुख्यतः आम की लकड़ी पर किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नमक गैस उत्पन्न होती है जो कि खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओ को मारती है तथा वातावरण को शुद्ध करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला। गुड़ को जलने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है।
  • टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में यह पाया कि यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।
  • हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च की, क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्द होता है और जीवाणु नाश होता है अथवा नही।
  • उन्होंने ग्रंथो. में वर्णित हवन सामग्री जुटाई और जलने पर पाया कि ये विषाणु नाश करती है।
  • फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा कि सिर्फ आम की लकड़ी १ किलो जलने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलायी गयी एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बैक्‍टीरिया का स्तर 94 % कम हो गया।
  • यही नही. उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजुद जीवाणुओ का परीक्षण किया और पाया कि कक्ष के दरवाज़े खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के 24 घंटे बाद भी जीवाणुओ का स्तर सामान्य से 96 प्रतिशत कम था। बार-बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था। यह रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र (resarch journal of Ethnopharmacology 2007) में दिसंबर 2007 में छप चुकी है।
  • रिपोर्ट के अनुसार हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बैक्टीरिया का भी नाश होता है। जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है।

क्या हो हवन की समिधा (जलने वाली लकड़ी)

समिधा के रूप में आम की लकड़ी सर्वमान्य है, परन्तु अन्य समिधाएँ भी विभिन्न कार्यों हेतु प्रयुक्त होती हैं।

सूर्य की समिधा मदार की, चन्द्रमा की पलाश की, मङ्गल की खैर की, बुध की चिड़चिडा की, बृहस्पति की पीपल की, शुक्र की गूलर की, शनि की शमी की, राहु दूर्वा की और केतु की कुशा की समिधा कही गई है।

मदार की समिधा रोग को नाश करती है, पलाश की सब कार्य सिद्ध करने वाली, पीपल की प्रजा (सन्तति) काम कराने वाली, गूलर की स्वर्ग देने वाली, शमी की पाप नाश करने वाली, दूर्वा की दीर्घायु देने वाली और कुशा की समिधा सभी मनोरथ को सिद्ध करने वाली होती है।

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yagya-benefits2 आक, पलाश, खैर,शमी,आपामार्ग, पीपल, गूलर, कुश, दूर्वा आदि सब आयुर्वेद मेँ प्रतिष्ठित आषधियाँ हैँ। © Shutterstock

हव्य (आहुति देने योग्य द्रव्यों) के प्रकार

प्रत्येक ऋतु में आकाश में भिन्न-भिन्न प्रकार के वायुमण्डल रहते हैं। सर्दी, गर्मी, नमी, वायु का भारीपन, हलकापन, धूल, धुआंं, बर्फ आदि का भरा होना। विभिन्न प्रकार के कीटणुओं की उत्पत्ति, वृद्धि एवं समाप्ति का क्रम चलता रहता है। इसलिए कई बार वायुमण्डल स्वास्थ्यकर होता है। कई बार अस्वास्थ्यकर हो जाता है। इस प्रकार की विकृतियों को दूर करने और अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने के लिए हवन में ऐसी औषधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं, जो इस उद्देश्य को भली प्रकार पूरा कर सकती हैं।

होम द्रव्य 4 प्रकार के कहे गए हैं

  • सुगन्धित : केशर, अगर, तगर, चन्दन, इलायची, जायफल, जावित्री छड़ीला कपूर कचरी बालछड़ पानड़ी आदि।
  • पुष्टिकारक : घृत, गुग्गुल, सूखे फल, जौ, तिल, चावल शहद नारियल आदि।
  • मिष्ट - शक्कर, छूहारा, दाख आदि।
  • रोग नाशक -गिलोय, जायफल, सोमवल्ली ब्राह्मी तुलसी अगर तगर तिल इंद्रा जव आमला मालकांगनी हरताल तेजपत्र प्रियंगु केसर सफ़ेद चन्दन जटामांसी आदि।

सामान्य हवन सामग्री

तिल, जौं, सफेद चन्दन का चूरा , अगर , तगर , गुग्गुल, जायफल, दालचीनी, तालीसपत्र , पानड़ी , लौंग , बड़ी इलायची , गोला , छुहारे नागर मौथा , इन्द्र जौ , कपूर कचरी , आँवला ,गिलोय, जायफल, ब्राह्मी तुलसी किशमिशग, बालछड़ , घी।