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Written By: Editorial Team | Published : October 17, 2017 11:33 AM IST
भारत में, सबसे मशहूर कन्फेक्शनरी, बेकरी और मिठाई की दुकानें निर्धारित सीमा के भीतर ऐसे फूड कलर्स का इस्तेमाल करती हैं जिनके उपयोग को मान्यता मिली है। हालांकि, छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों की छोटी-छोटी मिठाई की दुकानों, आइसक्रीम और खाने-पीने की चीज़ें बनानेवाली कंपनियां, अपने उत्पादों में ऐसे रंगों के उपयोग से जुड़ी जागरूकता की कमी के कारण करते हैं। दरअसल ये नकली रंग बहुत सस्ती दरों पर खरीदे जा सकते हैं। जिसके चलते दुकानदार अपनी मिठाइयों को रंगीन और आकर्षक दिखाने के लिए इनका काफी ज़्यादा मात्रा में इस्तेमाल करते हैं। नॉन-परमिटेड रंगों(non-permitted colours) के सेहत पर पड़नेवाले बुरे प्रभावों के बारे में उन लोगों को पता होना चाहिए जो इनसे बनी चीज़ें खरीदते और खाते हैं। इस विषय पर फूडसेफ्टीहेल्पाइन.कॉम के संस्थापक और औरिगा रिसर्च और अरब्रो फार्मास्यूटिकल्स के डायरेक्टर डॉ. सौरभ अरोड़ा ने कुछ विशेष बातें बताई है कि नॉन-परमिेटेड कलर का सेहत पर क्या असर पड़ता है।
नॉन-परमिटेड रंगों का सेहत पर बुरा असर –
चूंकि परमिटेड कलर्स या अनुमति प्राप्त प्राकृतिक रंग महंगे हैं, इसीलिए दीवाली जैसे त्योहारों में मिठाइयों की भारी मांग, पैसे की बचत और बाक़ी व्यापारियों से मुकाबले में ठहरने के लिए कई दुकानदार और हलवाई जानबूझकर बिना-अनुमति वाले रंगों का इस्तेमाल करते हैं। प्राकृतिक और स्वीकृत सिंथेटिक रंगों का उपयोग करने की जिम्मेदारी फूड बिजनेस ऑपरेटर (Food Business Operators) के पास है, जो खुद इसके उपभोक्ता भी हैं। उन्हें खुद जांच करके यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे सही रंगों का उपयोग कर रहे हैं। समय-समय पर इस बात की भी जांच करनी चाहिए कि उन्हें केवल वही रंग उपलब्ध कराए जा रहे हैं जिनकी अनुमति दी गई है, ना कि नकली या प्रतिबंधित रंग।
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अनुवादक: Sadhna Tiwari
चित्रस्रोत : Shutterstock Images