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Written By: Yogita Yadav | Published : June 29, 2018 4:52 PM IST
जिन लोगों को प्रोफेशनली बहुत देर तक या बहुत तेज बोलना होता है उन्हें वॉइस डिसऑर्डर की समस्या हो सकती है। टीचर्स, वकील और भाषण देने वालेे लोगो में इसके जोखिम सबसे ज्यादा है। अगर समय रहते लाएं अपनी आदतों में बदलाव तो हो सकता है समाधान।
यूं बनती हैं आवाज
हमारे फेफड़ों से गुजरने वाली हवा जब वॉयस बॉक्स से गुजरती है, तो आवाज का निर्माण होता है। इसमें मांसपेशियों के दो वॉयस बैंड होते हैं, जिन्हें वोकल कॉर्ड कहा जाता है। हम क्या बोलना चाहते हैं, मस्तिष्क से मिले निर्देशों के बाद उत्पन हुए कंपन से वह शब्द और ध्वनियां नियंत्रित होती हैं। हम क्या हैं, क्या करते हैं और क्या करा चाहते हैं, यह सब आवाज के माध्यम से ही अभिव्यक्त होता है। हमारी आवाज हमारी सबसे बड़ी पहचान होती है। खास बात ये कि मिलती-जुलती होते हुए भी हर एक की आवाज अलग होती है। सोचिए क्या हो अगर आवाज ही न निकल पाएं। आवाज हमेशा दे आपका साथ, इसके लिए जरूरी है कि अभी से रखें अपनी आवाज का ध्यान।
ऐसे खराब होती है वोकल कॉर्ड
दिल्ली के ईएनटी स्पेशलिस्ट डॉ विनीत नरूला कहते हैं, कई बार हमारी रोजमर्रा की जिम्मेदारियां या आदतें हमारी वोकल कॉर्ड को नुकसान पहुंचाती हैं। जो लोग बहुत बोलते हैं या बहुत चिल्लाते हैं, उससे उनकी वोकल कॉर्ड को चोट पहुंचती है। जैसे टीचर्स, वकील, भाषण देने वाले इन लोगों की आवाज खराब होने या बुढ़ापे में बिल्कुल बंद होने का जोखिम ज्यादा रहता है। इसके अलावा पेट में गैस रहने, संक्रमण होने या अधिक धूम्रपान करने से भी आवाज खराब होने का खतरा रहता है। कैंसर भी आवाज बाधित करने का एक कारण हो सकता है।
आवाज खराब होने के लक्षण
अमूमन बड़ी उम्र में आवाज खराब होने के लक्षण महसूस होते हैं। जैसे-जैसे हम बूढ़े होने लगते हैं, हमारी आवाज पर से हमारा नियंत्रण, उसकी गुणवत्ता और उतार चढ़ाव प्रभावित होने लगते हैं। हमारी आवाज ढीली पड़ने लगती है और उसकी रेंज कम हो जाती है। पर यदि ये लक्षण कम उम्र में ही नजर आने लगें, तो इन पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।
जरूरी है जांच
ईएनटी स्पेशलिस्ट डॉ विनीत नरूला कहते हैं, जैसे ही आपको इनमें से कोई एक भी लक्षण महसूस हो तो फौरन ईएनटी स्पेशलिस्ट से मिलें। समय पर वॉइस डिस्ऑर्डर की पहचान हो जाए तो उसे बहुत हद तक नियंत्रित किया जाता सकता है। शुरूआती बदलाव में अपनी आदतों को सुधार कर भी फर्क महसूस किया जा सकता है। जबकि समस्या बढ़ने पर इसका इलाज करवाना पड़ता है। लैंगोस्कॉपी के जरिए इसे ठीक भी किया जा सकता है।
चित्रस्रोत: Shutterstock.