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Written By: Kishori Mishra | Updated : June 19, 2020 11:36 AM IST
World Sickle Cell Day 2020 : सिकल सेल से ग्रस्त बच्चों के पहले डॉक्टर हैं माता-पिता।
World Sickle Cell Day 2020: 'विश्व सिकल सेल दिवस' (World Sickle Cell Day 2020) प्रत्येक वर्ष 19 जून को मनाया जाता है। यह एक दुर्लभ बीमारी है, पर भारत में इससे ग्रस्त लोगों की संख्या इतनी ज्यादा है कि इसे विश्व में दूसरे स्थान पर माना जाता है। सिकल सेल रोग (Sickle Cell Disease) खून का अनुवांशिक विकार है। इसमें पीड़ित व्यक्ति के एचबीएस में दोष होता है। आमतौर पर हीमोग्लोबिन का आकार ‘ओ’ शेप (एचबीए) का होता है। हीमोग्लोबिन शरीर के विभिन्न हिस्सों तक ऑक्सीजन पहुंचाता है।
सिकल सेल (Sickle Cell Disease) से पीड़ित बच्चों के माता-पिता के लिए बार-बार अस्पताल जाना सबसे खराब अनुभव होता है, लेकिन हॉस्पिटल ना जाएं, तो बच्चे की जान के लिए खतरा बन सकता है। क्लस्टर धमनियों और शिराओं में बाधा बन जाते हैं और जिसकी वजह से ऑक्सीजन से युक्त रक्त का प्रवाह शरीर में ठीक से नहीं हो पाता। इससे व्यक्ति कई (World Sickle Cell Day 2020) जटिलताओं का शिकार हो जाता है।
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सामान्य आरबीसी की उम्र तकरीबन 120 दिन होती है, जबकि ये दोषपूर्ण सेल ज्यादा से ज्यादा 10-20 दिनों तक जीवित रह पाते हैं। इस वजह से शरीर में हीमोग्लोबिन से युक्त कोशिकाओं की संख्या गिरती चली जाती है और व्यक्ति क्रोनिक एनिमिया का शिकार हो जाता है। इस रोग से पीड़ित मरीज के खून में पर्याप्त ऑक्सीजन न होने के कारण उसे जल्दी थकान होती है।
सिकल सेल के लक्षणों को समय रहते पहचान लेना बहुत ही जरूरी है। इससे कारण बच्चों को शरीर में दर्द, तेज बुखार, आंखों में धुंधलापन नजर आता है। वहीं, लड़कों को प्राइवेट पार्ट्स में भी दर्द होता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर्स की सलाह लेनी चाहिए।
सिकल सेल रोग विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बीमारी से पीड़ित बच्चों के इलाज में माता-पिता पहले डॉक्टर होते हैं। सिकल सेल से पीडि़त बच्चों को बार-बार अस्पताल ले जाना पड़ता है। पर अगर वे चाहें तो थोड़ी सी अहतियात बरत घर में ही इन बच्चों को सही देखभाल दे सकते हैं।
बच्चे की रक्त कोशिकाएं सभी शरीर के अंगों में ऑक्सीजन और पोषक तत्वों को पहुंचाती हैं, लेकिन वे सिकल सेल के कारण क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। वे टूटना शुरू करती हैं और हर बार जब वो टूटती हैं तो वे काम करना बंद कर देती हैं और ब्लॉक हो जाती हैं। जब वे किसी विशेष स्थान पर ब्लॉक होती हैं तो बाधा उत्पन्न हो जाती है। जिसके चलते बच्चे को असहनीय दर्द होता है।
कभी-कभी दर्द शरीर के बहुत महत्वपूर्ण भागों को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए बच्चे को सीने में दर्द होता है, तो यह हो सकता है कि छाती के अंगों में से एक में बाधा हो। घर पर किसी भी तरह की देरी होने से सांस लेने में मुश्किल और मौत हो सकती है।
किसी भी तरह के दर्दनिवारक से बेहतर है पानी। अगर बच्चे को दर्द महसूस हो तो उसे पानी पिलाना चाहिए और खुली हवा देने की कोशिश करनी चाहिए। इस बीमारी में बच्चों को शरीर के अलग-अलग हिस्सों में दर्द होता है। जिसके लिए डॉक्टर दर्द निवारक देते हैं। पर इनका साइड इफैक्ट यह होता है कि सिकल सेल में दर्द निवारक का मुकाबला करने की क्षमता बढ़ती जाती है। जिससे दर्द निवारक देने के बाद भी दर्द कम नहीं होता। तब इसकी डोज बढ़ानी पड़ती है।
दर्द के दौरान दर्द निवारक देने की बात कही जाती है, लेकिन कई माता-पिता नहीं जानते कि उन्हें कब और कैसे दिया जाए। वे दर्दनाशक बच्चों को तब देते हैं जब उन्होंने कुछ खाया न हो। ये दर्द को बढ़ाता है, आंतों को जलाता है और लंबे समय तक ऐसा होने पर अल्सर विकसित करता है। यदि दवा और पानी देने के दो घंटे बाद भी दर्द खत्म नहीं होता है, तो बच्चे को अस्पताल ले जाएं। बच्चे का शरीर आमतौर पर कुछ दर्द की दवा का प्रतिरोधी बन जाता हैं ताकि वे और ज्यादा मात्रा में दर्द की दवा ले सके। घर पर सबसे अच्छा दर्द कम करने का समाधान है पानी।
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