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Written By: Anshumala | Published : August 21, 2018 6:26 PM IST
भारत में ऑस्टियोअर्थराइटिस के मामले दिन ब दिन बढ़ते जा रहे हैं। आज वर्ल्ड सीनियर सिटिजन डे के मौके पर इन्द्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल ने ‘गोल्डन नी’ इंप्लांट्स के महत्व एवं फायदों के बारे में जानकारी दी। ‘गोल्ड नी’ इंप्लांट किस तरह वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, इस पर इस हॉस्पिटल के सीनियर कंसलटेंट, ऑर्थोपेडिक्स एंड जॉइन्ट रिप्लेसमेंट सर्जन डॉ. (प्रोफेसर) राजू वैश्य ने चर्चा की। पहली बार इस वर्ष 26 मई को डॉ. वैश्य ने पहली ‘गोल्डन नी’ इंप्लांट सर्जरी की थी, तब से वे 25 सफल गोल्डन नी इंप्लांट रिप्लेसमेंट कर चुके हैं।
80 फीसदी आबादी ऑस्टियोअर्थराइटिस से पीड़ित
डॉ. वैश्य का कहना है कि 65 साल से अधिक उम्र की लगभग 80 फीसदी आबादी ऑस्टियोअर्थराइटिस से पीड़ित है। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसमें कार्टिलेज डीग्रेडेशन के कारण शरीर के जोड़ों में दर्द होने लगता है। यह घुटनों में आमतौर पर पाई जाती है। दुनिया भर में यह सभी बीमारियों में आठवें स्थान पर है और मस्कुलोस्केलेटल बीमारियों के लगभग 15 फीसदी मरीज इसी समस्या से पीड़ित होते हैं। उम्र बढ़ने के साथ यह समस्या बढ़ती जाती है।
क्या है गोल्डन नी इंप्लांट?
डॉ. वैश्य कहते हैं कि गोल्डन नी टोटल नी रिप्लेसमेंट इंप्लांट (प्रोस्थेसिस) का आधुनिक रूप है जो ऑस्टियोअर्थराइटिस के मरीजों के लिए सर्वश्रेष्ठ समाधान है। इस इंप्लांट में एक ‘बायोनिक गोल्ड’ सरफेस होती है, जो इंप्लांट के बेस मैटीरियल को आस-पास के टिश्यू के संपर्क में नहीं आने देती। इससे किसी तरह के पार्टिकल या आयन नहीं निकलते, जिससे मेटल एलर्जी (धातु के कारण एलर्जी) की संभावना खत्म हो जाती है। इस मेटल की सतह चिकनी होती है, इसलिए फ्रिक्शन कम होने के कारण यह इंप्लांट 30-35 साल तक चल जाता है, जबकि सामान्य इंप्लांट 15-20 साल तक ही चलता है।
गोल्डन नी इंप्लांट के फायदे
- किफायती है।
- बेहतरीन बायोकम्पैटिबिलिटी होती है।
- मेटल से एलर्जी होने की संभावना नहीं।
- आम इंप्लांट की तुलना में मजबूत (कोबाल्ट-क्रोमियम एलॉय) होता है।
- कम फ्रिक्शन के कारण लम्बा चलता है।
- अधिक केमिकल स्टेबिलिटी।
- सूजन और एंडोप्रोस्थेटिक लूजनिंग की संभावना नहीं।
- उच्च जोखिम वाले मरीजों जैसे युवाओं और मोटापे से ग्रस्त मरीजों के लिए उपयुक्त है।
क्या कहा पेशेंट ने
गोल्डन नी रिप्लेसमेंट करा चुकी मरीज प्रेमलता जैन के अनुसार, ‘‘जब मैं इस हॉस्पिटल में आई, तो मेरी हालत बहुत खराब थी। मैं ठीक से चल तक नहीं पाती थी। डॉक्टरों ने मुझे टोटल नी रिप्लेसमेंट कराने के लिए कहा। उन्होंने मुझे ‘गोल्डन नी’ कॉन्सेप्ट के बारे में बताया और मैंने यह सर्जरी करवा ली। मैं डॉ. वैश्य के प्रति आभारी हूं जिनकी वजह से आज मैं ठीक से चल सकती हूं।’’
महंगा अधिक नहीं
‘गोल्डन नी’ इंप्लांट सामान्य इंप्लांट से थोड़ा ही महंगा है। ऐसे में टोटल नी रिप्लेसमेंट कराने वाले मरीज इसका खर्च उठा सकते हैं। इस तरह के इंप्लांट से मरीज को बेहतर ‘फ्लेक्सिबिलिटी/प्रत्यास्थता (Elasticity)’ मिलती है। वे आसानी से सीढ़ियां चढ़ सकते हैं। जमीन पर बैठ सकते हैं।
चित्रस्रोत: Shutterstock.