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Written By: Yogita Yadav | Published : May 22, 2019 9:12 PM IST
सिजोफ्रेनिया से भारत में लगभग 40 लाख लोग पीड़ित हैं। सिज़ोफ्रेनिया को एक प्रकार की मानसिक स्थिति या रोग कह सकते हैं, जिसमें व्यक्ति काल्पनिक और वास्तविक वस्तुओं को समझने में भूल कर बैठता है। © Shutterstock.
सिजोफ्रेनिया से भारत में लगभग 40 लाख लोग पीड़ित हैं। प्रभावितों की गिनती सिर्फ इतनी ही नहीं है, बल्कि सिजोफ्रेनिया के एक मरीज के साथ उसके परिवार और दोस्त भी प्रभावित होते हैं। क्योंकि इस बीमारी में व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति प्रभावित होती है। वास्तविक भावनाओं से अलग वह एक काल्पनिक दुनिया में रहने लगता है। मानसिक बीमारियों के सबसे गंभीर विकार सिजोफ्रेनिया का इलाज नहीं होने पर करीब 25 प्रतिशत मरीजों के खुदकुशी कर लेने का खतरा होता है। सिजोफ्रेनिया के इलाज से वंचित करीब 90 प्रतिशत रोगी भारत जैसे विकासशील देशों में हैं। करीब एक अरब की आबादी वाले हमारे देश भारत में विभिन्न डिग्री के सिजोफ्रेनिया से लगभग 40 लाख लोग पीड़ित हैं, जिसके कारण कुल मिलाकर ढाई करोड़ लोग प्रभावित हो रहे हैं। यह बीमारी प्रति एक हजार वयस्कों में से करीब 10 लोगों और ज्यादातर 16-45 आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित करती है।
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बीमारी और इलाज के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए 24 मई को विश्व सिजोफ्रेनिया दिवस (World Schizophrenia Day 2019) मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सिजोफ्रेनिया को युवाओं की सबसे बड़ी क्षमतानाशक बीमारी घोषित किया है। विश्व की 10 सबसे बड़ी अक्षम बनाने वाली बीमारियों में शामिल सिजोफ्रेनिया की चपेट में आने पर रोगी के साथ ही परिवारीजनों की दिक्कत भी बढ़ जाती है। सिज़ोफ्रेनिया एक मानसिक स्थिति है जो मस्तिष्क के सामान्य कामकाज को प्रभावित करती है। यह स्थिति व्यक्ति की महसूस करने, कार्य करने और सोचने की क्षमता को प्रभावित करती है।
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सिज़ोफ्रेनिया को एक प्रकार की मानसिक स्थिति या रोग कह सकते हैं, जिसमें व्यक्ति काल्पनिक और वास्तविक वस्तुओं को समझने में भूल कर बैठता है। परिणामस्वरूप रोगी का वास्तविकता से संबंध टूट जाता है, जिसके कारण उसके सोचने समझने की क्षमता पर असर पड़ता है, और वह जीवन की ज़िम्मेदारियों को संभालने में असमर्थ रहता है।
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सिज़ोफ्रेनिया का कोई एक कारण नहीं है, अनुसंधान के अनुसार अनुवांशिक, मनोवैज्ञानिक और पर्यावरणीय कारण हैं जिनसे सिज़ोफ्रेनिया की स्थिति विकसित होती है।
हालांकि इसके निदान का कोई परीक्षण नहीं है, रोगी में सिज़ोफ्रेनिया के लक्षण नज़र आने पर डाक्टर उसका चिकित्सा इतिहास देखते है, और कभी-कभी शारीरिक परीक्षण भी करते हैं। इसका इलाज आमतौर पर लंबा होता है, यदि रोगी का शुरुआती चरण में ही उपचार दिया जाए तो समस्या पकड़ में आ जाती है। मनोवैज्ञानिक थैरेपी के ज़रिये मरीज़ के व्यवहार पर काम करने की कोशिश की जाती है। साथ ही रोगी के परिवार वालों को भी काउंसिलिंग दी जाती है ताकि वे रोगी को संभाल सकें। सिज़ोफ्रेनिया से बचाव का कोई तरीका नहीं है।
सभी तरह के नशीले पदार्थों का सेवन मना होता है। जबकि ओमेगा 3 फैटी एसिड युक्त खाद्य पदार्थ जैसे सोयाबीन, पालक, स्ट्राबेरी, खीरा आदि लेने चाहिए। साथ ही विटामिन बी, विटामिन सी, विटामिन ए और विटामिन ए युक्त पदार्थ लेने चाहिए। इसके अलावा स्वस्थ जीवनशैली नियमित व्यायाम का पालन करना चाहिए।