
साधना तिवारी
साधना तिवारी 15 वर्षों से मीडिया क्षेत्र में हैं। लगभग 9 वर्षों से अधिक समय से ZEE ग्रुप के साथ जुड़ी हुई ... Read More
Written By: Sadhna Tiwari | Updated : April 11, 2025 10:14 PM IST
उम्र बढ़ने के साथ जिन बीमारियों का रिस्क बुज़ुर्गों में बढ़ जाता है उनमें डिमेंशिया और पार्किंसंस डिजिज भी शामिल हैं। पार्किंसंस की बीमारी में मरीजों के दिमागी शक्ति और याद्दाश्त धीरे-धीरे कम होने लगती है। भारत में भी पार्किंसंस की बीमारी बुज़ुर्गों में काफी अधिक देखी जाती है।
वर्ल्ड पार्किंसंस डे (World Parkinson’s Day) मनाने के पीछे यही मकसद है कि मरीज और मरीजों की देखभाल करने वाले लोगों में इस बीमारी के प्रति जागरूकता और जानकारी का स्तर बढ़ाया जा सके। हर साल 11 अप्रैल को विश्व भर में पार्किंसंस डे मनाया जाता है। यह दिन डॉ. पार्किंसंस (Dr. Parkinson’s) की याद में उनके जन्मदिन पर मनाया जाता है जिन्होंने इस बीमारी की खोज के बारे में सबसे पहले बात की थी।
डॉ. शुभोजित पाल (Dr Shubojit Pal, Consultant Neurologist, CMRI Hospital) कहते हैं कि “आमतौर पर पार्किसंस होने की उम्र 60 के बाद (Average age of onset of Parkinson) मानी जाती है, लेकिन, यह बीमारी 50 वर्ष से कम उम्र के लोगों में भी हो सकती है। पार्किंसंस की शुरूआत में मरीज अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों में स्लो होने लगता (slowing of movement) है। इसके साथ ही जो लक्षण दिखायी देते हैं उनमें हाथों-पैरों का कांपना (shaking of limbs) और शरीर का पोस्चर बिगड़ने (postural instability) जैसी समस्याएं प्रमुख हैं। फिर धीरे-धीरे शरीर में ये लक्षण भी दिखायी देने लगते हैं-
इस तरह धीरे-धीरे मरीज के लिए बिस्तर से उठ पाना भी मुश्किल होने लगता है। डॉ. शुभोजित कहते है कि, जब बीमारी गम्भीर होने लगती है तो कुछ और भी लक्षण दिखायी देने लगते हैं जैसे-
पार्किसंस एक क्रोनिक न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर (chronic neurological disorder) है जो ब्रेन में डोपामाइन बनाने वाली सेल्स के डिजनरेशन (degeneration of dopamine secreting cells in the brain) के कारण होता है। कुछ दवाओं की मदद से ब्रेन में डोपामाइन के निर्माण की प्रक्रिया को तेज किया जा सकता है। लेकिन, इन दवाओं के डोज और मरीज में दिखने वाले बदलावों पर बहुत अधिक ध्यान देने की जरूरत पड़ती है।
हालांकि, पार्किसंस के कुछ गम्भीर मामलों में दवा खिलाने के बाद भी मरीजों में कोई बेहतरी नहीं दिखायी देती। इस तरह के केसेस में हम मरीज की मदद के लिए अन्य तरीकों के बारे में विचार कर सकते है। जैसे, डीप ब्रेन स्टिम्युलस (deep brain stimulus) जिसमें, मरीज को ब्रेन में न्यूरोलॉजिकल गतिविधियां बढ़ाने के लिए इलेक्ट्रोरॉड्स की मदद ली जाती है। वहीं, कुछ डॉक्टरों द्वारा गोलियों की बजाय अलग-अलग दवाओं के घोल की मदद से मरीजों का इलाज करना पसंद करते हैं।
डॉ. शुभोजित कहते हैं कि, पार्किंसंस डिजिज के मैनैजमेंट (Management of the Parkinson’s disease) और इलाज के लिए बीमारी का जल्दी डायग्नोसिस और समय पर इलाज शुरू करने जैसे कदम उठाना बहुत महत्वपूर्ण है। इससे मरीज की जिंदगी बेहतर हो सकती है। ”
Disclaimer : प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।