
मुकेश शर्मा
मुकेश शर्मा दिल्ली यूनिर्विसिटी से जर्नलिज्म डिग्री होल्डर हैं और पिछले 8 साल से Health Journalism से जुड़े हुए ... Read More
Parkinson's Disease: पार्किंसंस की बीमारी अधिकतर 60 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोगों में होती थी परंतु अब यह 50 की कम उम्र के लोगों में भी हो रही है। यह बीमारी पूरी तरह से रोगी के नर्वस सिस्टम और ब्रेन से जुड़ी हुई होती है जो उसके क्रोनिक एंड प्रोग्रेसिव न्यूरोडीजेनेरेटिव डिसऑर्डर के कारण होती है। वैश्विक स्तर पर लोगों में इस रोग के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल 11 अप्रैल को वर्ल्ड पार्किंसन डे मनाया जाता है। इस बीमारी के समय किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए और क्या-क्या लापरवाहियां नहीं बरतनी चाहिए इन्हीं सब मुद्दों पर आज इस लेख में हम चर्चा करेंगे।
डॉ अरिंदम घोष, कंसल्टेंट - न्यूरोलॉजिस्ट, नारायणा अस्पताल, हावड़ा एंड एनएच आरएन टैगोर अस्पताल के अनुसार, पार्किंसंस रोग मस्तिष्क की एक बीमारी है जो भारत में प्रत्येक 1,00,000 लोगों में से 67 लोगों को प्रभावित करती है। यह मस्तिष्क में तंत्रिकाओं वाले डोपामाइन (एक ब्रेन कैमिकल ) के नुकसान के परिणामस्वरूप होता है। व्यक्ति इस कारण अपना मानसिक संतुलन खोने लगता है। इस रोग के कारण चलने फिरने की गति धीमी हो जाती है, मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं और शरीर में कंपन होने लगता है, साथ ही जकड़न, झुक कर चलना और याददाश्त संबंधी विकार भी इस बीमारी से जुड़े हुए होते हैं। इस न्यूरोडीजेनेरेटिव विकार के बारे पूरे विश्व के लोगों में जागरूकता और जानकारी फैलाने के लिए हर साल 11 अप्रैल को विश्व पार्किंसंस दिवस मनाया जाता है। फिलहाल इस बीमारी का संपूर्ण इलाज उपलब्ध नहीं है, फिर भी दवा रोग के लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद करती है। सामान्य रूप से 50 वर्ष की आयु से अधिक लोगों में इस बीमारी के लक्षण दिखाई देते हैं। इसमें व्यक्ति के लक्षणों को ध्यान में रखते हुए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए डॉक्टर कुछ दावों के माध्यम से मरीज को ठीक करने का प्रयास करते हैं साथ ही एक्सरसाइज, दिनचर्या को व्यवस्थित करने से धीरे-धीरे व्यक्ति ठीक होता है।
डॉ अमित श्रीवास्तव, डायरेक्टर एंड सीनियर कंसलटेंट - न्यूरोलॉजी, धर्मशिला नारायणा हॉस्पिटल, दिल्ली के अनुसार, पार्किंसंस रोग एक मनोदशा और गतिविधि से संबंधित विकार है। यह एक ऐसी स्थिति है जो समय के साथ बढ़ती है, इसकी शुरुआत इतनी धीमी गति से होती है कि आपको पता ही नहीं चल पाता है और जैसे-जैसे समय बीतता है, यह समस्या आपके हाथ में थोड़े से कंपन से शुरू होकर चलने, बात करने, सोने और सोचने के तरीके तक को प्रभावित कर सकती है। ज्यादातर बुजुर्ग अवस्था में 50 की उम्र के बाद होने वाली इस बीमारी के बारे में लोगों को जागरूकता कम है, इसलिए पार्किंसंस रोग के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से हर साल 11 अप्रैल को विश्व पार्किंसंस दिवस मनाया जाता है। इस दिन विभिन्न तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग इस बीमारी के बारे में जान सकें और समय से इसका प्रबंधन कर सकें। मांसपेशियों में कठोरता या अकड़न आ जाना, चलने फिरने के दौरान समस्या होना, नींद ना आना, सांस उखड़ना और लार टपकना जैसे लक्षण इस बीमारी से जुड़े हुए होते हैं। रोग के लक्षणों के प्रति सतर्कता आवश्यक है, अगर आपको भी इस तरह के लक्षण महसूस हों तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें साथ ही पौष्टिक आहार और व्यायाम को प्राथमिकता दें व्यायाम शरीर में लचीलापन और संतुलन बनाये रखने के साथ समग्र स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।
डॉ. बिप्लब दास, डायरेक्ट एंड सीनियर कंसलटेंट, न्यूरोलॉजी, नारायणा अस्पताल, गुरुग्राम ने बताया कि, पार्किंसंस रोग ब्रेन से जुड़ा हुआ एक विकार है जिसमें रोगी की चलने फिरने की गति प्रभावित हो जाती है, मांसपेशियों में अकड़न आ जाती है और किसी भी काम को करते वक्त शरीर में कंपन महसूस होने लगता है, यहां तक की शर्ट के बटन को बंद करने या कुर्सी पर उठने बैठने तक के छोटे कामों में भी हाथ पैर कांपने लगते हैं। यह एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में ज्यादा लोगों को नहीं पता होता है, ऐसे में विश्व भर के लोगों को इस बीमारी के बारे में जानकारी देने और जागरूकता के उद्देश्य से हर साल 11 अप्रैल को विश्व पार्किंसन दिवस मनाया जाता है। इस बीमारी का प्रभाव ज्यादातर बुजुर्ग अवस्था में देखा जाता है कम उम्र की आयु में इस बीमारी के प्रभाव ज्यादातर नहीं देखे जाते हैं। दरअसल इस बीमारी के दौरान मरीज के ब्रेन का वो हिस्सा प्रभावित हो जाता है जिससे वह शारीरिक गतिविधियों का नियंत्रित करता है। उपचार के तौर पर दवाओं के माध्यम से सिर्फ लक्षणों को कम करने का प्रयास किया जाता है क्योंकि इस बीमारी का पूर्ण इलाज नहीं है। मरीज को दवाओं के साथ संतुलित आहार लेने की सलाह दी जाती है साथ ही मांसपेशियों की गतिविधि, उनमें संतुलन और सुधार के लिए फिजिकल एक्सरसाइज भी कारगर होती है।
जैसे ही मरीज के लक्षण दिखाई दें तुरंत डॉक्टर के पास संपर्क करना चाहिए, डॉक्टर रोगी का कुछ न्यूरोलॉजिकल परीक्षण करते हैं और मेडिकल इतिहास देखकर मरीज का उपचार शुरू करते हैं। पार्किंसंस रोग में डॉक्टर डीबीएस तकनीक, इंजेक्शन और दवाओं के माध्यम से इलाज करते हैं। इसके अलावा इसमें कुछ सावधानी बरतने की भी सलाह दी जाती है व्यक्ति को अपनी डाइट में भरपूर खाद्य पदार्थ, विटामिन, कैल्शियम, मिनरल, आयरन, विटामिन बी1, सी, डी, ओमेगा-3 फैटी एसिड को लेने के बारे में सलाह दी जाती है। इससे तंत्रिका सूजन को कम करने, न्यूरोट्रांसमिशन को बढ़ाने और न्यूरोडीजेनरेशन को रोकने में मदद मिलती है। इसमें अधिक नमक, चीनी, हाई कोलेस्ट्रॉल वाले खाद्य पदार्थ सैचुरेटेड फैट, प्रोसैस्ड फूड आदि प्रकार की चीजों से दूरी बनानी होती है। इसके साथ ही एक्सरसाइज, योग और मसाज थेरेपी के माध्यम से इस रोग पर थोड़ा नियंत्रण पाया जा सकता है। पार्किंसन रोग पर नियंत्रण प्राप्त करने के लिए सावधानी बरतनी की बहुत जरूरत है और समय-समय पर डॉक्टर से चेकअप कराते रहना चाहिए।