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Written By: akhilesh dwivedi | Updated : January 29, 2020 9:56 AM IST
World Leprosy Day 2020: कुष्ठ रोग की पहचान और इलाज | TheHealthSite Hindi
कुष्ठ रोग (Leprosy) के मरीजों के प्रति गलत अवधारणा के कारण आज भी उनके साथ भेदभाव किया जाता है। ऐसे में वे समाज से अलग और अकेले रहने के लिए मजबूर हो जाते हैं। कुष्ठ रोग एक जीर्ण, प्रगतिशील संक्रमण है, जिसका असर व्यक्ति की त्वचा, आंखों, श्वसन तंत्र एवं परिधीय तंत्रिकाओं पर पड़ता है। यह एक प्रकार के जीवाणु मायकोबैक्टीरियम लैप्री के कारण होता है। हालांकि, यह बीमारी बहुत ज्यादा संक्रामक नहीं है, लेकिन मरीज के साथ लगातार संपर्क में रहने से संक्रमण हो सकता है। बीमार व्यक्ति के छींकने या खांसने पर बैक्टीरिया हवा से फैल सकता है। अगर यह बैक्टीरिया स्वस्थ व्यक्ति की सांस में चला जाए तो उसे कुष्ठ रोग का संक्रमण हो सकता है।
यह बीमारी पांच साल तक इन्क्यूबेशन पीरियड में रहती है। हालांकि, कई बार 20 साल तक भी रोग के लक्षण दिखाई नहीं देते। त्वचा पर घाव, दानेदार उभार, उंगुलियों के पोरों का सुन्न होना, मांसपेशियों में कमजोरी आदि रोग के आम लक्षण हैं। रोग के संक्रमण, इसके प्रकार एवं अवस्था की जांच के लिए लेप्रोमाइन स्किन टेस्ट किया जाता है। संक्रमण की शुरुआती अवस्था में सही निदान होना इलाज के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
कुष्ठ रोग के इलाज में देरी के परिणाम गंभीर हो सकते हैं। इससे व्यक्ति को शारीरिक अपंगता हो सकती है। उसके अंग कुरूप हो सकते हैं। तंत्रिकाएं स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। इसका असर हाथों, पैरों और बाजुओं पर पड़ता है।
कुष्ठ रोग के मरीज की भौहों और पलकों के बाल गिर जाते हैं। वह ग्लुकोमा, आयरिस में सूजन, अंधेपन, इरेक्टाइल डिस्फंक्शन, किडनी फेलियर, नेजल कंजेशन या कई अन्य जटिलताओं का शिकार हो सकता है, इसलिए जरूरी है कि समय पर निदान कर जल्द से जल्द इलाज किया जाए, इससे पहले कि मरीज के टिशू को गंभीर नुकसान पहुंचे।
कुष्ठ रोग का इलाज संभव है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा 1995 में विकसित मल्टी-ड्रग थेरेपी (MDT) इस संक्रमण के इलाज में बेहद प्रभावी पाई गई है। भारत सरकार कुष्ठ रोग का निःशुल्क इलाज उपलब्ध कराती है। हालांकि, बहुत से लोग उनके साथ होने वाले भेदभाव और समाज में फैली गलत अवधारणाओं के चलते अपना इलाज नहीं करवाते हैं
आपको संक्रमित व्यक्ति के साथ लंबे समय तक संपर्क में नहीं रहना चाहिए, लेकिन कुष्ठ रोग के मरीज को बिल्कुल अलग करना भी जरूरी नहीं है। साथ ही सही इलाज के बाद मरीज संक्रमण से मुक्त हो सकता है और इसके बाद वह बिल्कुल संक्रामक नहीं रहता।
कुष्ठ रोगी ठीक होने के बाद समाज के उत्पादक सदस्य के रूप में अपना जीवन जी सकता है लेकिन समाज में कुष्ठ रोग के बारे में फैली गलत अवधारणााओं के कारण अक्सर ऐसा नहीं हो पाता।