World Hepatitis Day 2020 : ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस के लक्षण, कारण और इलाज

ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस एक ऐसी बीमारी है, जिसमें अज्ञात कारणों से लिवर में क्रोनिक सूजन होने लगती है। ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस की समस्या होने पर मरीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता विफल हो जाती है, इसके कारण मरीज का इम्यून सिस्टम (Immune System) खुद ही लिवर की कोशिकाओं पर हमला करने लगता है।

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Written By: Kishori Mishra | Updated : July 28, 2020 11:01 AM IST

Autoimmune Hepatitis : हर साल 28 जुलाई को विश्व हेपेटाइटिस दिवस 2020 (World Hepatitis Day 2020) मनाया जाता है। इस मौके पर आज हमको ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस (Autoimmune Hepatitis) के बारे में बताने जा रहे हैं। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसमें किसी अज्ञात कारणों से लिवर में क्रोनिक सूजन होने लगती है। ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस की समस्या होने पर मरीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता विफल हो जाती है, इसके कारण मरीज का इम्यून सिस्टम (Immune System) खुद ही लिवर की कोशिकाओं पर हमला करने लगता है। लिवर हमारे शरीर का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण अंग है। लिवर के प्रमुख कार्य ब्लड में मौजूद विषैले पदार्थों को साफ करना, पाचन में मदद करना और दवाओं का अपघटन करना है। साथ ही यह खून का थक्का जमने से रोकने में हमारी मदद करता है।

ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस (एआईएच) के प्रकार (Types of Autoimmune Hepatitis)

ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस दो प्रकार के होते हैं। आइए जानते हैं इसके बारे में-

टाइप-1 : ये बहुत ही साधारण तरह की बीमारी है। ये किसी भी उम्र के लोगों को हो सकता है। टाइप-1 ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस, पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को अधिक होता है। इस बीमारी के एक तिहाई मरीजों में इसका कारण अन्य ऑटोइम्यून बीमारियां होती हैं। जैसे- थॉयराइडिटिस, आर्थराइटिस,  युर्मेटॉइड और अल्सरेटिव कोलाइटिस।

टाइप 2 : वयस्कों में टाइप 2 ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस अधिक होता है। महिलाओं की तुलना में पुरुष इस बीमारी के अधिक शिकार होते हैं। अन्य ऑटोइम्यून बीमारियों से ग्रसित होने के कारण यह बीमारी होती है। आमतौर पर यह अधिक गंभीर रूप धारण करता है। शुरुआती लक्षण दिखने के तुरंत बाद ही यह अडवांस्ड लिवर रोग में बदल जाता है।

ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस के कारक (Causes of Autoimmune Hepatitis)

ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस होने के कई अन्य कारण भी होते हैं, जिससे इसके होने की संभावना बढ़ जाती है। यदि किसी व्यक्ति के परिवार में मीजल्स (खसरा),  एपस्टीन-बार वायरस या फिर  हर्पीज सिम्पलेक्स के संक्रमण का इतिहास है, तो ऐसे लोगों में ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस की संभावना बढ़ सकती है। हेपेटाइटिस ए, बी या सी का संक्रमण भी इसी बीमारी से जुड़ा होता है।

अनुवांशिक कारणों से भी यह बीमारी होती है। ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस (Autoimmune Hepatitis) किसी भी उम्र की महिलाओं और पुरुषों को हो सकता है, लेकिन महिलाओं में इसकी संभावना सबसे अधिक होती है।

ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस के लक्षण (Symptoms of Autoimmune Hepatitis )

रोग के शुरुआती लक्षण हैं थकान, पीलिया, मितली, पेट में दर्द और आथ्रालजियस, लेकिन चिकित्सकीय दृष्टि से इसके लक्षण गंभीर रूप ले सकते हैं। बहुत से मरीजों में इसके कोई लक्षण दिखाई नहीं देते, और रूटीन लिवर फंक्शन टेस्ट में ही बीमारी का निदान होता है।

ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस के निदान के लिए जांच जरूरी है। अगर लीवर एंजाइम में बढ़ोतरी होती है, तो इसका पता रक्त जांच से चल जाता है। इसके अलावा अन्य रक्त परीक्षणों के द्वारा एंटी-स्मूद मसल एंटीबॉडी, एंटीन्यूक्लियर फैक्टर एंटीबॉडी और एंटी एलकेएम एंटीबॉडी की जांच की जाती है। रक्त में इम्यूनोग्लोब्यूलिन जी का स्तर बढ़ सकता है। निदान की पुष्टि के लिए लिवर बायोप्सी भी की जा सकती है।

ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस का इलाज (Treatment of Autoimmune Hepatitis)

ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस लिवर से संबंधित समस्या है, इसलिए इस बीमारी का इलाज थेरेपी के जरिए काफी अच्छे से किया जा सकता है। इसके इलाज के लिए मुख्य रूप से कोर्टिकोस्टेरॉयड का इस्तेमाल किया जाता है। इन दवाइयों से लिवर की सूजन को कम किया जाता है। इसके साथ ही मायकोफिनॉलेट मोफेटिल,  एजाथियोप्रिन,  टेक्रोलिमस या  मेथोट्रेक्सेट जैसी दवाइयों का इस्तेमाल भी ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस के इलाज में किया जाता है। हालांकि, कुछ मरीजों को इस तरह की दवाइयां नहीं दी जाती हैं, क्योंकि उन्हें विशेष इलाज की जरूरत नहीं होती, लेकिन ऐसे मरीजों को नियमित फॉलो अप करवाना चाहिए। इसके अलावा कुछ गंभीर परिस्थितियों में लिवर ट्रांसप्लान्ट से भी इलाज संभव होता है।

यदि समय पर ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस का इलाज ना कराया जाए, तो यह सिरहोसिस या लिवर फेलियर का कारण बन सकता है। समय पर इलाज से मरीजों को ऐसी स्थिति में पहुंचने से रोका जा सकता है। इसका इलाज किसी भी अवस्था में संभव हो सकता है, यहां तक कि सिरहोसिस होेने के बाद भी डॉक्टर्स इस बीमारी को नियंत्रित कर सकते हैं।

लाइफस्टाइल में किस तरह करें बदलाव (Prevention of Autoimmune Hepatitis)

1. इस बीमारी से बचने के लिए अधिक शराब का सेवन ना करें, क्योंकि शराब के अधिक सेवन से लिवर को नुकसान पहुंच सकता है। वहीं, अगर आप ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस से ग्रसित हैं, तो आपके लिए थोड़ी सी मात्रा में भी शराब जानलेवा

2. साबित हो सकती है।

3. मरीजों को दें संतुलित आहार।

4. नियमित रूप से व्यायाम करें।

5. वजन को करें कंट्रोल, क्योंकि मोटापे से फैटी लिवर डिजीज की संभावना बढ़ती है।

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