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Importance of Hearing Test for Newborn: सुनने की समस्या केवल कानों तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह बच्चे के पूरे भविष्य को प्रभावित कर सकती है। अगर किसी बच्चे को जन्म से सुनने में दिक्कत है, तो उसका असर उसके बोलने, समझने, पढ़ाई करने और लोगों से घुलने-मिलने की क्षमता पर पड़ सकता है। चिंता की बात यह है कि काफी संख्या में न्यू बोर्न और छोटे बच्चों में सुनने की कमी पाई जा रही है। लगभग 25 प्रतिशत मामलों में सुनने की समस्या की पहचान शिशु या टॉडलर उम्र में ही होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय पर जांच न हो, तो दिमाग के विकास पर असर पड़ सकता है। जीवन के शुरुआती दिनों में बच्चे का दिमाग बहुत तेजी से विकसित होता है। ऐसे में जांच में थोड़ी भी देरी भविष्य में बड़ी चुनौती बन सकती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक साल 2050 तक दुनिया में लगभग 2.5 अरब लोगों को किसी न किसी स्तर पर सुनने की दिक्कत हो सकती है। इनमें से करीब एक-चौथाई प्रभावित बच्चे नवजात या छोटे बच्चों की उम्र के हो सकते हैं। इनमें ज्यादातर लोग भारत जैसे विकासशील देशों में रहते हैं, जहां कान और सुनने से जुड़ी जांच, इलाज और रिहैबिलिटेशन की सुविधाएं अभी भी हर जगह आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, नवजात शिशुओं में सुनने की समस्या का मुख्य कारण जन्म से मौजूद कुछ शारीरिक कमी या जन्मजात विकार होते हैं। भारत जैसे देशों में हर 1000 जन्मे बच्चों में से लगभग 4 से 6 बच्चों में सुनने की समस्या पाई जा सकती है।

“अगर बच्चे को जन्म से ही सुनने की समस्या हो, तो इसका असर उसके बोलने, भाषा सीखने, दिमागी विकास और पढ़ाई पर पड़ सकता है। इसलिए समय पर जांच बेहद जरूरी है। अगर पहचान में देरी हो जाए, तो आगे चलकर समस्या ज्यादा जटिल हो जाती है और उसका समाधान करना कठिन हो सकता है। जन्म के बाद के पहले 30 दिन दिमाग के विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान बच्चे के मस्तिष्क में लाखों न्यूरल कनेक्शन बनते हैं, जो उसकी बोलने की क्षमता, समझने की शक्ति और भावनात्मक विकास की नींव तैयार करते हैं।"
डॉ. मनीष मित्तल, सीनियर कंसल्टेंट, नियोनेटोलॉजी, कोकून हॉस्पिटल
दुनियाभर में डॉक्टर एक आसान नियम मानते हैं, जिसे “1-3-6” कहा जाता है। इसका सीधा मतलब है कि, बच्चे की सुनने की जांच जन्म के एक महीने के अंदर हो जानी चाहिए, अगर कोई समस्या हो तो तीन महीने तक उसकी पूरी पुष्टि हो जानी चाहिए और छह महीने की उम्र तक इलाज या जरूरी मदद शुरू कर देनी चाहिए। अगर यह समय सीमा फॉलो की जाए, तो बच्चे के बोलने और दिमागी विकास पर बुरा असर पड़ने से काफी हद तक बचाया जा सकता है।
"सेंसेरिन्यूरल हियरिंग लॉस का इलाज अब तक मुख्य रूप से हियरिंग एड और कॉक्लियर इम्प्लांट जैसी मशीनों के जरिए किया जाता रहा है। ये तकनीकें आज भी बेहद जरूरी और प्रभावी हैं। लेकिन आने वाले समय में कान के इलाज का फोकस सिर्फ सुनने की क्षमता को मशीनों से बेहतर बनाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कोशिश यह भी होगी कि कान के अंदरूनी हिस्से के प्राकृतिक जैविक वातावरण को सुरक्षित रखा जाए और जहां संभव हो, उसे दोबारा ठीक करने की दिशा में काम किया जाए।"
डॉ. अदिति कुंडू, मेडिकल डायरेक्टर, क्रायोवीवा लाइफ साइंसेज
“क्रायोवीवा में हम स्टेम सेल और एक्सोसोम से जुड़ी नई रिसर्च पर लगातार काम कर रहे हैं। खासतौर पर यह देखा जा रहा है कि ये तकनीक शरीर की इम्यूनिटी को संतुलित करने, नसों की रक्षा करने और खराब हो चुके ऊतकों की मरम्मत में किस तरह मदद कर सकती हैं। सेंसेरिन्यूरल हियरिंग लॉस में नुकसान कान के अंदर की बेहद नाजुक कोशिकाओं और नसों को होता है। वैज्ञानिक यह जांच रहे हैं कि स्टेम सेल से बने एक्सोसोम सूजन कम करने, नसों को सुरक्षित रखने और कोशिकाओं को मजबूत बनाने में कितने कारगर हो सकते हैं। हालांकि अभी इस पर दुनिया भर में रिसर्च और क्लिनिकल ट्रायल चल रहे हैं, लेकिन यह तरीका केवल लक्षणों को संभालने से आगे बढ़कर असली कारण पर काम करने और भविष्य में सुनने की क्षमता को बेहतर बनाने की दिशा में एक नई उम्मीद माना जा रहा है।”
डॉ. कुंडू ने आगे बताया कि नई तकनीक और समय पर जांच दोनों ही बहुत जरूरी है। “बच्चों में सुनने की देखभाल का सबसे असरदार तरीका आज भी समय पर की गई स्क्रीनिंग है। शोध बताते हैं कि अगर जन्म के पहले 30 दिनों के भीतर सुनने की जांच हो जाए, तो बच्चे के दिमागी और भाषा विकास को काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इसलिए आधुनिक नवजात देखभाल कार्यक्रमों में यूनिवर्सल हियरिंग स्क्रीनिंग को एक जरूरी और नियमित प्रक्रिया के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।”
“जैसे-जैसे नई चिकित्सा तकनीक विकसित हो रही हैं, हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि इलाज पूरी तरह वैज्ञानिक आधार पर हो, नैतिक नियमों का पालन किया जाए और समय पर जांच की जाए। हमारा लक्ष्य ऐसा भविष्य बनाना है, जहां सिर्फ मशीनों या थेरेपी के सहारे काम चलाने की बजाय, सुनने की क्षमता को बेहतर करने या दोबारा बहाल करने की दिशा में भी ठोस और सुरक्षित विकल्प उपलब्ध हों।”
अस्वीकरण: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।