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Written By: Yogita Yadav | Published : February 4, 2019 10:17 AM IST
आज वर्ल्ड कैंसर डे है। यानी कैंसर के खिलाफ एकजुट होने का दिन। ©Shutterstock.
आज वर्ल्ड कैंसर डे है। यानी कैंसर के खिलाफ एकजुट होने का दिन। आप भी किसी न किसी ऐसे व्यक्ति को जानते होंगे, जो या तो कैंसर का मुकाबला कर रहा है या जिसने कैंसर से जंग जीत ली है। जबकि कुछ लोगों का जीवन कैंसर से हार भी गया है। इन दिनों जैसे आम हो गई है यह खतरनाक बीमारी। पर क्या आप जानते हैं कि क्या है इन दिनों इस बीमारी के इस तरह बढ़ जाने का कारण।
डराते हैं आंकड़ें
ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में 42 फीसदी पुरुषों और 38 फीसदी औरतों को कैंसर होने की आशंका है। ब्रिटेन में तो यह आंकड़ा और भी ख़राब है। यहां 54 फीसदी पुरुषों और 48 फीसदी महिलाओं को कैंसर होने का डर है। 2015 में ब्रिटेन में पच्चीस लाख़ लोग इस बीमारी के शिकार थे। इसमें हर साल तीन फीसदी यानी चार लाख़ नए केस जुड़ जाते हैं। भारत में भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।
क्या है कैंसर
असल में कैंसर, इंसान के विकास की क़ुदरती प्रक्रिया का नतीजा है। इंसान जैसे बड़े जीव कैंसर जैसी बीमारी को इसीलिए झेलते हैं क्योंकि वो बड़े और पेचीदा हैं। जटिल विकास की प्रक्रिया के नतीजे में हमें कैंसर की बीमारी मिली है। कैंसर कैसे होता है, ये समझने के लिए हमें अपने अंदर होने वाली क़ुदरती प्रक्रिया को समझना होगा।
यह है विकास की प्रक्रिया
हर जीव और इंसान का विकास शरीर में मौजूद कोशिकाओं के बंटने से होता है। इंसान का शरीर एक कोशिका से ही बनना शुरू होता है। नर के शुक्राणु और मादा के अंडाणु के मेल से एक गेंदनुमा कोशिका बनती है। इसी कोशिका के बार-बार के बंटवारे से हमारा विकास होता है। जब हम 18 बरस की उम्र तक पहुंचते हैं तब तक हमारे शरीर की कोशिकाएं अरबों बार बंट चुकी होती हैं। कोशिकाओं के बंटने की ये प्रक्रिया बेहद नियंत्रित माहौल में होती है। जैसे कि जब आपके हाथ की उंगलियां बनती हैं तो उस दौरान कई कोशिकाएं ख़ुदकुशी करती हैं। तब जाकर आपकी दो उंगलियों के बीच जगह बनती है।
कैंसर की बीमारी भी कोशिकाओं के बंटवारे से ही होती है। फ़र्क़ बस इतना होता है कि यहां शरीर के अंगों के विकास के वक़्त कोशिकाओं का विभाजन बेहद नियंत्रित माहौल में होता है।
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क्या कहती है स्टडी
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक टिमोथी वील कहते हैं कि कैंसर असल में कोशिकाओं के विभाजन की प्रक्रिया का बेक़ाबू हो जाना है। हमारे शरीर में कोशिकाओं के इस बंटवारे पर हमारे जीन का कंट्रोल होता है। जब कोई जीन किसी वजह से ये ज़िम्मेदारी नहीं निभा पाता तो कोशिकाओं के विभाजन की प्रक्रिया आउट ऑफ कंट्रोल हो जाती है। कोशिकाओं के बंटवारे पर हमारे जीन्स की कड़ी निगाह होती है। जब भी कोई कोशिका, सिस्टम से बाहर होने लगती है तो जीन्स के आदेश पर उसे क़त्ल कर दिया जाता है ताकि कोशिकाओं के बंटवारे का काम आउट ऑफ कंट्रोल न हो।
ये है कैंसर का कारण
जब कोशिकाओं के बंटवारे की प्रक्रिया जीन के नियंत्रण से बाहर हो जाती है तब इंसान को कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी का सामना करना पड़ता है। यह बीमारी कुछ गिनी चुनी कोशिकाओं के बेक़ाबू होने से होती है। मगर यह इतनी तेज़ी से फैलती हैं कि इन्हें रोक पाना नामुमकिन सा हो जाता है। ये कोशिकाएं बेकाबू तब होती हैं, जब इनमें कोई अंदरूनी बदलाव होता है, तब ये जीन्स का फरमान मानने से इंकार करके अपनी मनमर्ज़ी से बढ़ने लगती हैं।
जारी है रिसर्च
चार्ल्स स्वांटन और उनकी टीम इस दिशा में काम कर रही है। वे कहते हैं कि कैंसर की कोशिका, म्यूटेशन नाम की क़ुदरती प्रक्रिया से बनती है। म्यूटेशन या तब्दीली आने का मतलब है कि उस कोशिका के जीन में अचानक से कोई हेर-फेर हो गया। इसी से कोशिकाएं बेकाबू होकर बंटने और बढ़ने लगती हैं।
वैज्ञानि कहते हैं कि कैंसर के ख़ात्मे के लिए किसी भी कोशिका के अंदर आए इस बदलाव को निशाना बनाने से बात बन सकती है। इटली के वैज्ञानिक अल्बर्टो बार्देली कैंसर की बाग़ी कोशिकाओं से लड़ने के लिए उनके क्लोन तैयार करते हैं और उनकी मदद से कैंसर की कोशिकाओं को मारने की कोशिश में जुटे हैं।
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लंबी हो रही है उम्र
वैज्ञानिक कैंसर के मरीज़ों की तादाद बढ़ने की एक वजह इंसान की औसत उम्र में आए बदलाव को भी मान रहे हैं। आज लोग पहले से ज़्यादा जीते हैं। लंबी उम्र होने का मतलब है कैंसर होने की ज़्यादा आशंका। अमरीकी वैज्ञानिक ओटिस ब्रॉव्ले कहते हैं कि सत्तर के पार की उम्र जाने पर कैंसर का डर बढ़ जाता है। चालीस के पार होने पर हमारे शरीर की कुछ कोशिकाओं में ऐसी तब्दीली आती है जो कैंसर की बुनियाद बन सकती है। हालांकि इनमें से ज़्यादातर पर हमारा शरीर ख़ुद ब ख़ुद काबू पा लेता है।