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world asthma day 2022 : फेफड़ों के वायुमार्ग में किसी तरह की अवरुद्धता की एक सबसे बड़ी वजह है अस्थमा, जिसके बढ़ते मामले डॉक्टरों की लिए चिंता का सबब बन रहे हैं। यह बीमारी बच्चों और युवाओं में समान रूप से बढ़ती जा रही है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि विश्व में अस्थमा के 10 फीसदी मामले भारत में ही हैं, इनमें से 15 फीसदी मामले बच्चों (5—11 साल) में ही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के हालिया आंकड़ों के मुताबिक सांस की गंभीर बीमारियों के कारण मृत्यु के मामले में चीन के बाद भारत का ही स्थान है। आइए जानते हैं कैसे ये बीमारी तेजी से बढ़ रही है और कैसे इसे बढ़ने से रोका जा सकता है।
शालीमार बाग स्थित मैक्स हॉस्पिटल में पल्मोनोलॉजी के निदेशक डॉ. इंदर मोहन चुघ का कहना है कि अस्थमा की सही समय पर पहचान और इस पर प्रभावी नियंत्रण के लिए जरूरी दवाओं का सेवन बहुत ही जरूरी है।
मरीजों के लिए दवाई कितनी जरूरी है इस बारे में बताते हुए हुए डॉ. चुघ ने कहा कि अस्थमा की स्थिति से पूरी तरह निजात नहीं मिल सकती है, इस सच्चाई को समझते हुए इसका प्रभावी प्रबंधन ही जीवन की बेहतर गुणवत्ता सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाता है। इस मौके पर मैं लोगों को आगाह करना चाहता हूं कि
1-सही समय पर रोग की पहचान
2-नियमित दवाइयों का सेवन
इस स्थिति के प्रबंधन का एकमात्र उपाय है और इस स्थिति में मरीजों को दवाइयों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मरीजों और उनके तीमारदारों में जानकारी का अभाव, सही डायग्नोसिसकराने और इलाज पद्धति अपनाने की जानकारी का अभाव और कुछ मामलों में डायग्नोसिस स्वीकारने में आनाकानी जैसे कई कारणों से देश में अस्थमा के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अस्थमा के गंभीर से मामूली मामलों पर काबू पाने के लिए रोजाना लंबे समय तक दवाइयों को सेवन करना पड़ता है ताकि लक्षणों और अटैक से बचा जा सके।'
भारत में सांस लेने की गंभीर बीमारियों के बढ़ते बोझ का बड़ा कारण वायु प्रदूषण है जिसमें पराली जलाने और वाहनों का प्रदूषण प्रमुख है। हाल में वैश्विक स्तर पर किए गए सर्वे के मुताबिक, विश्व के शीर्ष 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में 13 शहर भारत के ही हैं। दिल्ली—एनसीआर, पटना, ग्वालियर और रायपुर में प्रदूषण कणों (पीएम2.5) की सर्वाधिक मात्रा है जो सांस की नलीऔर फेफड़ों को बुरी तरह क्षतिग्रस्त करते हुए अस्थमा, ब्रोनकाइटिस, हृदय रोग, स्ट्रोक और अन्य रोगों का कारण बनते हैं।
दुर्भाग्यवश हमारे देश में कई मरीज इनहेलर जैसी दवाइयों का इस्तेमाल करने से हिचकिचाते हैं या इनके प्रति गलत धारणा बनाए हुए हैं। इनहेलर डिवाइस और दवाइयां निश्चित रूप से अस्थमा पर काबू रखने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है, इसकी लत नहीं लगती है और न ही इसका कोई साइड इफेक्ट है। इसके इलाज के लिए एलर्जी से बचने के साथ साथ इसके लक्षणों की निगरानी और प्रबंधन जरूरी है।
डॉ. चुघ ने कहा, 'स्वस्थ जीवनशैली और खानपान का भी इस स्थिति पर काबू रखने में अहम भूमिका होती है। यदि किसी को डेयरी उत्पादों की एलर्जी है तो उसे दूध और अन्य डेयरी उत्पाद का सेवन नहीं करना चाहिए। दूध और अन्य डेयरी उत्पादों से हमें प्रोटीन, कैल्सियम और लैक्टोज मिलता है। यदि आपको सोया एलर्जी नहीं है तो आप दूध के बजाय सोया मिल्क का इस्तेमाल कर सकते हैं। जैसे—जैसे हमारी उम्र बढ़ती है हमारे शरीर में स्वाभाविक रूप से एंजाइम कम होने लगता है और लैक्टोज बिगड़ने लगता है। संतुलित खानपान के लिए हरी पत्तीदार सब्जियों और ताजे फल समेत स्वस्थ शाकाहारी खानपान अपनाएं। विटामिन सी और ई, मैग्नीशियम, ओमेगा—3 फैटी एसिड से परिपूर्ण खानपान करें।'