
मुकेश शर्मा
मुकेश शर्मा दिल्ली यूनिर्विसिटी से जर्नलिज्म डिग्री होल्डर हैं और पिछले 8 साल से Health Journalism से जुड़े हुए ... Read More
Written By: Mukesh Sharma | Published : November 20, 2025 8:14 AM IST
Diabetes in Hormone Imbalance: महिलाओं में हार्मोनल असंतुलन, गर्भावस्था के दौरान होने वाला गर्भावधि डायबिटीज और मेनोपॉज के बाद ब्लड शुगर लेवल में उतार-चढ़ाव, तीनों ही स्थितियां शरीर के मेटाबॉलिज्म पर सीधा असर डालते हैं। गर्भावस्था के दौरान जब शरीर में इंसुलिन का असर कम हो जाता है और ब्लड शुगर का स्तर बढ़ने लगता है, तो इस स्थिति को गेस्टेशनल डायबिटीज कहा जाता है। यह समस्या मां और बच्चे दोनों के लिए जोखिम भरी होती है। गर्भवती महिला में बढ़ा हुआ शुगर स्तर बच्चे के अधिक वजन, समय से पहले डिलीवरी और भविष्य में डायबिटीज के खतरे को बढ़ा सकता है। वहीं, मां के लिए भी यह स्थिति आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज या हार्मोनल असंतुलन की संभावना बढ़ा देती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हर गर्भवती महिला को गर्भावस्था के 24 से 28वें सप्ताह के बीच ब्लड शुगर की जांच अवश्य करानी चाहिए ताकि समय रहते इसका पता लगाया जा सके। हार्मोनल असंतुलन, विशेष रूप से पीसीओएस (Polycystic Ovary Syndrome), महिलाओं में इंसुलिन रेसिस्टेंस बढ़ाकर ब्लड शुगर को असंतुलित करता है। इससे वजन बढ़ना, अनियमित माहवारी, थकान और हार्मोनल गड़बड़ी जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। इसलिए 20 से 40 वर्ष की महिलाओं को नियमित रूप से ब्लड शुगर और हार्मोन प्रोफाइल की जांच करवाने की सलाह दी जाती है ताकि शुरुआती बदलावों का इलाज समय पर हो सके।
संतुलित आहार और सक्रिय जीवनशैली ही डायबिटीज की रोकथाम का सबसे प्रभावी तरीका है। अपने भोजन में साबुत अनाज, मौसमी फल, हरी सब्जियां, प्रोटीन और फाइबर शामिल करें। जंक फूड, मीठे पेय और अत्यधिक नमक या तेल से बचें। साथ ही रोजाना 30 मिनट की वॉक, योग या हल्का व्यायाम न केवल ब्लड शुगर को नियंत्रित रखता है बल्कि हार्मोनल संतुलन बनाए रखने में भी मदद करता है। इस तरह छोटी उम्र से अपनाई गई स्वस्थ जीवनशैली भविष्य में डायबिटीज और उससे जुड़ी जटिलताओं से सुरक्षा प्रदान कर सकती है।
डॉ. मानिनि पटेल, सीनियर कंसल्टेंट ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, जयपुर कहती हैं, “महिलाओं में डायबिटीज को अक्सर देर से पहचाना जाता है क्योंकि शुरुआती लक्षण बहुत हल्के होते हैं, जैसे थकान, वजन बढ़ना या पीरियड्स में अनियमितता। अगर महिलाएं अपनी सेहत की नियमित जांच और संतुलित जीवनशैली पर ध्यान दें तो न केवल गर्भावधि मधुमेह बल्कि भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज का खतरा भी काफी हद तक टाला जा सकता है।”
महिलाओं को यह समझना जरूरी है कि हार्मोनल हेल्थ और ब्लड शुगर एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। पीसीओएस या गर्भावस्था में मधुमेह के समय अगर शुगर लेवल की जांच नियमित की जाए और खानपान में संतुलन रखा जाए, तो डायबिटीज की शुरुआती अवस्था में ही नियंत्रण संभव है।
डायबिटीज का खतरा उम्र, वजन या वंशानुगत कारणों से बढ़ सकता है, लेकिन डॉक्टरों का मानना है कि अगर महिलाएं 20 की उम्र से ही अपने हार्मोन और ब्लड शुगर की निगरानी पर ध्यान दें, तो यह बीमारी न केवल रोकी जा सकती है बल्कि बेहतर तरीके से नियंत्रित भी की जा सकती है।
अस्वीकरण: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।