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World Chronic Fatigue Syndrome Awareness Day: स्‍ट्रेस के कारण बढ़ जाती है क्रोनिक फटीग सिंड्रोम की समस्‍या, महिलाओं को है 4 गुना ज्‍यादा खतरा

क्रोनिक फटीग सिंड्रोम (Chronic Fatigue Syndrome) की चपेट में आने का खतरा महिलाओं को पुरुषों की तुलना में 2 से 4 गुना ज्यादा होता है। आइए जानते हैं इस डिसऑर्डर के बारे में जरूरी बातें

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Written By: Rashmi Upadhyay | Published : May 11, 2021 5:36 PM IST

क्रोनिक फटीग सिंड्रोम एक ऐसा डिसऑर्डर है जो शरीर के साथ साथ मस्तिष्‍क को भी प्रभावित करता है। जब कोई व्‍यक्ति इसकी चपेट में आता है तो उसे पर्याप्‍त सोने और आराम करने के बाद भी थकान होना, कमजोरी महसूस होना और दिमाग पर बोझ होना जैसे लक्षण महसूस होते हैं। अगर ये बीमारी ज्‍यादा समय तक रही तो ये शरीर के अन्‍य अंगों को भी प्रभावित करने लगती है। क्रोनिक फटीग सिंड्रोम को क्रोनिक फटीग एंड इम्यून डिसफंक्शन सिंड्रोम भी कहते हैं। अगर किसी व्‍यक्ति को लगातार 1 महीने तक काफी कमजोरी और थकान महसूस हो तो डॉक्‍टर से संपर्क करना चाहिए। कोरोना काल में स्‍ट्रेस और अन्‍य मानसिक बीमारियां काफी बढ़ गई है। अगर आपको स्‍ट्रेस या एंग्‍जाइटी है तो आपको क्रोनिक फटीग सिंड्रोम (Chronic Fatigue Syndrome) होने का काफी रिस्‍क है। इसलिए थकान, फोकस की कमी, हर बात को भूलना, सिर में दर्द और अचानक से मांसपेशियों में दर्द जैसे लक्षण महससू हो तो डॉक्‍टर संपर्क करें। 12 मई को वर्ल्‍ड क्रोनिक फटीग सिंड्रोम अवेयरनेस डे (World Chronic Fatigue Syndrome Awareness Day in hindi) मनाया जाता है ताकि इस डिसऑर्डर के बारे में लोगों केा जागरुक किया जा सके। आज इस मौके पर हम आपको इस सिंड्रोम से जुड़ी जरूरी बातें बता रहे हैं।

क्रोनिक फटीग सिंड्रोम होने के क्‍या कारण हैं (Causes of Chronic Fatigue Syndrome in hini)

डॉक्‍टर्स और रिसर्च कहती हैं कि अभी तक क्रोनिक फटीग सिंड्रोम के कारणों का पता नहीं चला है। हालांकि कुछ लोगों को यह बीमारी जेनेटिक मिलती है तो कभी ये वायरल इंफेक्‍शन के कारण भी हो सकती है। अभी तक किसी विशेष प्रकार के संक्रमण का पता नहीं चला है जिसे क्रोनिक फटीग सिंड्रोम (Chronic Fatigue Syndrome) के लिए जिम्‍मेदार ठहराया जा सके। लेकिन Epstein-Barr virus (EBV), human herpesvirus 6, Ross River virus (RRV), rubella virus, Coxiella burnetii और Mycoplasma pneumoniae ऐसे वायरल इंफेक्‍शन हैं जिन्‍हें कई रिसर्च में CFS का कारण माना गया है। इसके अलावा निम्‍न क्रोनिक फेटीग सिंड्रोम के कारण हो सकते हैं-

  • स्‍ट्रेस
  • हार्मोनल इम्‍बैलेंस
  • वायरस
  • कमजोर इम्‍युन सिस्‍टम

किसे हैं क्रोनिक फटीग सिंड्रोम का ज्‍यादा खतरा? (Who is at high risk of Chronic Fatigue Syndrome in hindi)

डॉक्‍टर कहते हैं कि वैसे तो ये बीमारी 40 और 50 साल की उम्र के दौरान होती है लेकिन कई कारणों की वजह से युवाओं को भी हो सकती है। रिसर्च बताती हैं कि क्रोनिक फटीग सिंड्रोम का खतरा महिलाओं को पुरुषों की तुलना में 2 से 4 गुना ज्‍यादा होता है। इसके अलावा इस सिंड्रोम के पीछे सेक्‍स भी बड़ी भूमिका निभाता है।

क्रोनिक फटीग सिंड्रोम का इलाज क्‍या है? (What is the treatment of Chronic Fatigue Syndrome in hindi)

वर्तमान में क्रोनिक फेटीग सिंड्रोम के लिए कोई स्‍पेसिफिक इलाज नहीं है। यानि कि कोई ऐसी दवाई नहीं है जिसका सेवन कर इसके सभी लक्षणों को कंट्रोल किया जा सके। क्रोनिक फटीग सिंड्रोम के लक्षण समय के साथ बदलते रहते हैं। कई बार CFS, डिप्रेशन का रूप भी ले सकता है। ऐसी स्थिति में डॉक्‍टर antidepressant therapy देते हैं। हालांकि इसके लक्षण हर व्‍यक्ति में अलग अलग दिखते हैं इसलिए डिसऑर्डर को मैनेज करने और लक्षणों को कंट्रोल करने के लिए अलग-अलग तरह के इलाज की जरूरत पड़ सकती है। इसके इलाज में डॉक्‍टर थेरेपी का इस्‍तेमाल भी कर सकते हैं।

क्‍यों घरेलू नुस्‍खों से इसे कंट्रोल कर सकते हैं? (Home Remedies for Chronic Fatigue Syndrome in hindi)

लाइफस्‍टाइल में बदलाव कर क्रोनिक फटीग सिंड्रोम को कंट्रोल किया जा सकता है। जैसे कि कैफीन को अवॉइड करें, एल्‍कोहल और निकोटिन से दूर रहें और नींद की क्‍वॉलिटी को बढ़ाकर इस सिंड्रोम को कंट्रोल किया जा सकता है। अगर आपको इनसोमनिया है तो अपना सोने का रुटीन बनाएं और इसे हर हाल में फॉलो करें। दिन में सोने से बचें। खुद को ज्‍यादा से ज्‍यादा हाइड्रेट रखें।