4 साल व्हीलचेयर पर रही महिला, सेल बेस्ड थेरेपी के बाद फिर चलने लगी

आज हम आपको इस लेख में एक ऐसे मरीज की केस स्टडी के बारे में बताने वाले हैं, जो 4 साल से व्हीलचेयर पर थीं, लेकिन सेल बेस्ड थेरेपी की मदद से वह धीरे-धीरे चलने लगी है।

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Written By: Anju Rawat | Updated : August 14, 2026 10:36 AM IST

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Medically Verified By: Dr. Pradeep Mahajan

कई सालों तक बीमारी से जूझने के बाद अगर किसी मरीज के लिए सामान्य तरीके से चलना-फिरना भी मुश्किल हो जाए, तो जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है। ऐसा लगता है जैसे अब सब खराब हो गया है और कुछ भी सही नहीं हो सकता है। ऐसा ही 28 वर्षीय तानिया मोडक पाइक के साथ भी हुआ, जो ऑटोइम्यून मायोसाइटिस और स्जोग्रेन सिंड्रोम से जुड़ी गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्या के कारण करीब चार साल तक व्हीलचेयर पर निर्भर रहीं। उन्हें इन बीमारियों के दौरान होने वाली शरीर में कमजोरी, जकड़न, संतुलन बिगड़ने और चलने में परेशानियों के लिए ट्रीटमेंट भी लिए, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली।

हालांकि, सेल-बेस्ड थेरेपी और रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम के बाद उनकी स्थिति में सुधार हुआ और अब वह सहारे से चल पा रही हैं। आखिर तानिया को कौन-सी दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल समस्या थी और उनके इलाज में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा? आइए, रिजेनेरेटिव्ह मेडिसिन एक्सपर्ट और स्टेम रेक्स हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के संस्थापक डॉ. प्रदीप महाजन से विस्तार से समझते हैं।

मरीज को क्या समस्या थी?

मरीज पहले से ऑटोइम्यून मायोसाइटिस से भी पीड़ित थीं। कई वर्षों तक उन्हें आंखों और मुंह में ज्यादा सूखापन, मांसपेशियों में कमजोरी, थकान, शरीर का संतुलन बिगड़ना, हाथ-पैर सुन्न होना और धीरे-धीरे चलने-फिरने में परेशानी जैसी समस्याएं थीं। उनकी स्थिति धीरे-धीरे इतनी गंभीर हो गई कि वह रोजमर्रा के सामान्य काम भी खुद से नहीं कर पा रही थीं। मरीज और उनके परिवार ने कई अस्पतालों में डॉक्टरों से सलाह ली। उन्हें बताया गया कि इलाज के विकल्प सीमित हैं और पूरी तरह ठीक होने की उम्मीद कम है।

इसके बाद उन्होंने स्टेम रेक्स हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में इलाज शुरू कराया। यहां उनकी बीमारी और स्वास्थ्य की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सेल बेस्ड थेरपी और रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम तैयार किया गया। इलाज के बाद उनकी हालत में सुधार हुआ। मांसपेशियों की जकड़न कम हुई, चलने-फिरने में सुधार आया और अब वह सहारे से चल पा रही हैं। इससे उनकी रोजमर्रा की जिंदगी भी बेहतर हुई है। आइए डॉक्टर से विस्तार से जानते हैं कि आखिर तानिया के इलाज में क्या-क्या परेशानियां आईं और उन्हें कौन-कौन सी बीमारियां थीं।

समस्या कब और कैसे शुरू हुई?

हमने डॉक्टर से जानना चाहा कि आखिर मरीज महिला को यह समस्या कब और कैसे शुरू हुई, तो उन्होंने बताया कि “कोलकाता की रहने वाली तानिया मोडक पाइक को वर्ष 2018 में चलते समय पैर में खिंचाव महसूस हुआ। उन्होंने कई डॉक्टरों से सलाह ली। डॉक्टरों ने बताया कि कोई गंभीर समस्या नहीं है और उन्हें विटामिन मेडिसिन दिए गए, जिससे कुछ समय के लिए राहत मिली। लेकिन करीब दो महीने बाद उनके बाएं पैर में जकड़न शुरू हो गई।”

4 साल तक व्हीलचेयर पर रही तानिया

वह आगे बताते हैं कि कुछ समय बाद तानिया की समस्या दोबारा बढ़ने लगी और फिर साल 2022 में शादी के बाद उनके दाएं पैर में भी जकड़न होने लगी। 2023 तक उनकी हालत और बिगड़ गई। उन्हें बहुत ज्यादा कमजोरी होने लगी और शरीर का संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो गया। वह सीढ़ियां चढ़ने और रोजमर्रा के काम खुद करने में असमर्थ हो गईं। तानिया करीब चार सालों तक व्हीलचेयर पर निर्भर रहीं।

2023 के आखिर में बता चली बीमारी

दिसंबर 2023 में वह बेंगलुरु गईं, जहां की गई मांसपेशियों की जांच (मसल बायोप्सी) में ऑटोइम्यून मायोसाइटिस की पुष्टि हुई। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से स्वस्थ मांसपेशियों पर हमला करने लगती है। इससे मांसपेशियों में सूजन और कमजोरी हो सकती है। हालांकि, स्टेरॉयड उपचार के बाद भी उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ और उनकी समस्याएं लगातार बढ़ती गईं।

स्जोग्रेन सिंड्रोम भी हुआ डिटेक्ट

डॉक्टर बताते हैं कि ऑटोइम्यून मायोसाइटिस बीमारी के पता चलने के करीब चार से पांच महीने बाद मरीज को स्जोग्रेन सिंड्रोम होने का भी पता चला। इससे आंखों और मुंह में लगातार सूखापन, स्वाद कम महसूस होना और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का कारण भी पता लग पाया। मई 2024 में उनका प्लाज्माफेरेसिस ट्रीटमेंट किया गया। इसके अलावा, साल 2025 में उन्हें मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेपी और रिटुक्सिमैब इन्फ्यूजन की सलाह दी गई। उन्होंने डॉक्टरों की निगरानी में दवाएं भी जारी रखीं। इन उपचारों के बावजूद उनकी हालत लगातार बिगड़ती रही।

इन बीमारियों के दौरान मरीज को क्या-क्या समस्याएं हो सकती हैं?

डॉक्टर प्रदीप महाजन कहते हैं कि स्जोग्रेन सिंड्रोम एक स्वप्रतिरक्षित बीमारी है। इसमें शरीर की रोगों से लड़ने वाली प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से शरीर की अपनी नमी बनाने वाली ग्रंथियों पर हमला करने लगती है। इसके कारण आंखों और मुंह में लगातार सूखापन रहता है। कुछ मरीजों में यह बीमारी केवल आंखों और मुंह तक सीमित नहीं रहती, बल्कि तंत्रिका तंत्र को भी प्रभावित कर सकती है।

इससे गैंग्लियोन्यूरोपैथी जैसी तंत्रिका संबंधी समस्या हो सकती है, जिसमें संवेदना महसूस कराने वाली नसों को नुकसान पहुंचता है। इसके कारण शरीर के कुछ हिस्सों में संवेदना कम होना, शरीर का संतुलन बिगड़ना, चलने में परेशानी, मांसपेशियों में जकड़न और कमजोरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। धीरे-धीरे मरीज के लिए रोजमर्रा के काम खुद करना भी मुश्किल हो सकता है। दवाएं शरीर की असामान्य प्रतिरक्षा प्रक्रिया को नियंत्रित करने में मदद करती हैं, लेकिन तंत्रिका तंत्र को हुए नुकसान से ठीक होने में समय लग सकता है। इसलिए ऐसे मरीजों के लिए लंबे समय तक पुनर्वास उपचार और उनकी स्थिति के अनुसार व्यक्तिगत उपचार बहुत जरूरी है।

1000 में से 1-10 लोगों को करता है प्रभावित

डॉ. महाजन ने कहा, “स्जोग्रेन सिंड्रोम हर 1,000 लोगों में से लगभग 1 से 10 लोगों को प्रभावित कर सकता है और यह आम स्वप्रतिरक्षित बीमारियों में से एक है। यह बीमारी मुख्य रूप से शरीर की उन ग्रंथियों को प्रभावित करती है, जो शरीर में अलग-अलग तरह के तरल पदार्थ बनाती हैं। इनमें लार बनाने वाली ग्रंथियां, आंसू बनाने वाली ग्रंथियां और योनि में नमी बनाए रखने वाली ग्रंथियां शामिल हैं। इसके कारण मुंह, आंखों, योनि, त्वचा और नाक के अंदर सूखापन हो सकता है।

Disclaimer: यह लेख सत्य घटना पर आधारित है। इससे सबक लें कि अगर आपको कभी शरीर में किसी भी तरह की परेशानी महसूस होती है तो उसे अनदेखा न करें। समय रहते डॉक्टर को दिखाएं ताकि समस्या का पता लगाकर उसे जड़ से खत्म किया जा सके।