रोबोट की मदद से खुद में खोए रहने वाले बच्चों का हो सकेगा इलाज

एक्सपर्ट की माने तो जो बच्चे खुद में खोए रहते हैं वो एक मानसिक बीमारी के शिकार हो सकते हैं। इस बीमारी में बच्चों के दिमाग के विकास पर असर पड़ता है।

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Written By: akhilesh dwivedi | Published : July 1, 2018 2:30 PM IST

बदलती लाइफ स्टाइल और परिवेश के कारण आजकल के दौर में बच्चों में एक गंभीर समस्या देखने को मिलती है। बच्चा अपने में ही खोया रहता है, वह अन्य बच्चों के साथ आसानी से घुल-मिल नहीं पाता है। इस तरह की समस्या अगर आपके बच्चे में भी है तो यह नया रिसर्च आपके बच्चे के लिए सहायक हो सकता है।

हाल ही में हुए एक रिसर्च में यह नयी खोज की गयी, जो रोबोट के माध्यम से बच्चे के मन को पढ़ सकेगा। वैज्ञानिकों ने एक गहन अध्ययन के बाद एक ऐसे नेटवर्क को विकसित किया है जो रोबोट से कनेक्ट किया जा सकता है। यह रोबोट खुद में खोए रहने वाले बच्चों से प्राप्त डाटा के अनुसार बातचीत करके उनके मन को समझने की कोशिश कर सकता है।

एक्सपर्ट की माने तो जो बच्चे खुद में खोए रहते हैं वो एक मानसिक बीमारी के शिकार हो सकते हैं। इस बीमारी में बच्चों के दिमाग के विकास पर असर पड़ता है। इस बीमारी के कारण बच्चों में समझ और किसी बात की प्रतिक्रिया देने की क्षमता कमजोर होती जाती है।

इस नये शोध में इजाद किये गये तरीके में बच्चों को एक रोबोट एनएओ से जोड़ा जाता है जो बच्चे की हरकतों और उसकी पसंद और नापसंद का आकलन करता है। आकलन के बाद उन आंकड़ो के आधार पर बच्चों की जिंदगी को आसान किया जा सकता है।

यह अध्ययन 35 बच्चों पर किया गया है। अध्ययन में पाया गया कि इसकी मदद से खुद में खोए रहने वाले बच्चों के जीवन को बेहतर बनाए जाने की संभावना है।

शोध से जुड़े वैज्ञानिक ऑगी रुडोविक के अनुसार '' इस तरह के शोध का यह मतलब नहीं है कि मानव चिकित्सक की भूमिका समाप्त हो जाएगी और इसकी जगह रोबोट ले लेंगे। इस रिसर्च का उद्देश्य बच्चों को आवश्यक सूचनाओं से सामना कराना है, जिससे चिकित्सक को बच्चों और रोबोट के बीच होने वाले संवाद को सक्रिय रखने में मदद मिले।"

शोध से जुड़े वैज्ञानिकों की माने तो इस अध्ययन में बच्चों की प्रतिक्रियाओं को लेकर रोबोट के अनुभव और चिकित्सकों के अनुमान में काफी समानताएं थी। इस अध्ययन में समानता का प्रतिशत लगभग 60 प्रतिशत के आस-पास था।

इस अध्ययन में रोबोट की मदद से बच्चों के इलाज में सामान्य चिकित्सकों की तरह किए जाने वाले प्रयोगों को शामिल किया गया था। प्रयोगों में जैसे चेहरे के अलग-अलग हाव-भाव, खुशी, नाराजगी, डर जैसी संवेदनाओं और प्रतिक्रियाओं को शामिल किया गया था।

अध्ययनकर्ताओं ने पाया कि बच्चा आसानी से रोबोट के साथ घुल-मिल जाता है और वह सीखता है कि आगे उसे कैसे क्या करना है। अध्ययन में उपयोग किया गया एनएओ रोबोट 2 फीट का एक लंबा रोबोट है।

चित्रस्रोत:Shutterstock.

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