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Bache Ki Haddi Galat Badhna: कई बच्चे अपनी शारीरिक गतिविधियों के चलते उम्र के हिसाब से ज्यादा ही बढ़ जाते हैं, लेकिन कुछ बच्चे 3-4 साल की उम्र में भी हमउम्र बच्चों से छोटे ही रह जाते हैं। यानी कि बच्चे का कद बढ़ने का प्रोसेस धीमा हो जाता है। कई माता-पिता बच्चों की हाईट बढ़ाने के लिए उन्हें तरह-तरह के पाउडर देना शुरू कर देते हैं। लेकिन ये सही उपाय नहीं है।
आपको जरूरत है अपने बच्चे के ग्रोथ मॉड्यूल को मैनेज करना आना चाहिए। लेकिन कैसे करें? यही जानकारी पानी के लिए हमने नारायणा हॉस्पिटल के पीडियाट्रिक ऑर्थोपेडिक्स डॉक्टर तरल नागदा से बात की, और विस्तार से जानें की बच्चों को ग्रोथ को कैसे मैनेज किया जा सकता है।
डॉक्टर ने बताया कि बच्चों के स्वास्थ्य की बात हो तो ‘ग्रोथ’ और ‘डेवलपमेंट’दो अहम पहलू माने जाते हैं। ग्रोथ यानी शारीरिक रूप से लंबाई और वजन में बढ़ोतरी, जबकि डेवलपमेंट में बच्चे का चलना, बोलना और सामाजिक व्यवहार जैसे मील के पत्थर शामिल होते हैं। ये दोनों मिलकर जन्म से लेकर किशोरावस्था तक बच्चे की पूरी बढ़त और परवरिश को तय करते हैं।
अक्सर माता-पिता द्वारा ग्रोथ मॉड्यूलेशन के बारे में सवाल किया जाता है, खासकर जब बच्चे को नॉक-नी, बो लेग्स या हड्डियों से जुड़ी कोई अन्य बनावट की परेशानी होती है, तब ग्रोथ मॉडुलेशन एक अहम उपाय बनकर सामने आता है। चलिए आसान शब्दों में समझते हैं कि 'ग्रोथ मॉडुलेशन होता क्या है', 'कब किया जाता है', 'इसका तरीका क्या होता है' और 'इससे कैसी उम्मीद रखनी चाहिए'।
डॉक्टर तरल ने बताया कि 'ग्रोथ यानी शरीर में किसी हिस्से की लंबाई या आकार में बढ़ोतरी, जैसे कि बच्चे का कद बढ़नाया हड्डियों का लंबा होना। वहीं मॉड्युलेशन का मतलब होता है किसी प्रक्रिया को नियंत्रित करना या उसकी दिशा सही करना। इन दो शब्दों को मिलाकर बना है ग्रोथ मॉड्यूलेशन।'
आगे बताते हुए उन्होंने शेयर किया कि 'हड्डियों के सिरों पर मौजूद 'ग्रोथ प्लेट्स' बच्चों की लंबाई बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती हैं। ये नरम हिस्से हड्डियों को लंबा और आकार में बड़ा होने का मौका देते हैं। अगर किसी वजह से ग्रोथ प्लेट का एक हिस्सा रुक जाए और दूसरा बढ़ता रहे, तो हड्डी टेढ़ी हो सकती है। ग्रोथ मॉड्युलेशन इसी सिद्धांत का इस्तेमाल सुधार के लिए करता है, यानी खराबी के बजाय सुधार की दिशा में।
उदाहरण के लिए, नॉक नी (गेनु वैलगम) यानी पैरों का घुटनों की तरफ झुकना—इसमें जांघ की हड्डी के निचले हिस्से में अंदर की ओर झुकाव आ जाता है। ऐसे मामलों में ग्रोथ मॉड्युलेशन के जरिए ग्रोथ प्लेट के अंदरूनी हिस्से की बढ़त को थोड़ी देर के लिए रोका जाता है, जबकि बाहरी हिस्सा बढ़ता रहता है। इससे धीरे-धीरे हड्डी सीधी होने लगती है और लगभग आठ से नौ महीने में यह टेढ़ापन काफी हद तक ठीक हो जाता है।
इस प्रक्रिया में ग्रोथ प्लेट को स्थायी रूप से बंद कर दिया जाता है, जिसे एब्लेशन कहा जाता है। हालांकि, इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि यह एक बार हो जाने के बाद वापस नहीं की जा सकती, यानी यह प्रक्रिया अपरिवर्तनीय होती है। इसी वजह से आजकल इसका इस्तेमाल बहुत कम ही किया जाता है।
यह तरीका हड्डी की बढ़त को अस्थायी रूप से नियंत्रित करने के लिए अपनाया जाता है। इसमें स्टेपल, स्क्रू या प्लेट जैसे इम्प्लांट्स का उपयोग किया जाता है। यह आज का ज्यादा आधुनिक और पसंदीदा विकल्प है। जब टेढ़ापन ठीक हो जाता है, तब इम्प्लांट को हटा दिया जाता है। इम्प्लांट हटने के बाद हड्डी की बढ़त फिर से सामान्य रूप से शुरू हो जाती है।
स्टेपल्स- पहले काफी इस्तेमाल किए जाते थे, लेकिन अब इनका प्रयोग बहुत कम होता है क्योंकि ये कड़े होते हैं और मुड़ने या टूटने का खतरा बना रहता है।
8-प्लेट- डॉ. पीटर स्टीवंस द्वारा लोकप्रिय की गई यह खास प्लेट काफी असरदार है। इसे लगाने के लिए करीब 1.5 से 2 सेंटीमीटर का चीरा देना पड़ता है। कभी-कभी यह प्लेट उभरी हुई महसूस हो सकती है, जिससे बच्चों को असहजता हो सकती है।
पीईटी स्क्रू- आज सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला आधुनिक विकल्प। यह टाइटेनियम का बना होता है। सिर्फ एक टांके से स्क्रू लगाया जा सकता है। बच्चा अगले दिन चलना शुरू कर सकता है, कुछ ही दिनों में स्कूल जा सकता है और दो हफ्ते में खेल-कूद भी।
सलाह तब दी जाती है जब-
ग्रोथ मॉड्युलेशन बच्चों में हाथ-पैर की हड्डियों की बनावट से जुड़ी विकृतियों को सुधारने का सुरक्षित, असरदार और कम चीरे वाला तरीका है। अगर इसे सही उम्र में और सही स्थिति में किया जाए, तो यह न केवल हड्डियों को धीरे-धीरे सही करता है बल्कि बच्चे की पढ़ाई और दिनचर्या में कोई बड़ी रुकावट भी नहीं आती।
एक ऐसी प्रक्रिया या प्रणाली को संदर्भित करता है जो किसी चीज के विकास या वृद्धि को समझने, मापने और ट्रैक करने में मदद करता है।
बच्चों में ग्रोथ रुकने का सबसे बड़ा कारण जेनेटिक हो सकता है। इसके अलावा बच्चे का खानपान और फिजिकल एक्टिविटी भी निर्भर करता है।
बच्चे की डाइट में प्रोटीन,कैल्शियम,विटामिन D, जिंक,मैग्नीशियम और आयरन से भरपूर फूड शामिल करें।