कैंसर के बाद क्यों बढ़ जाता है लिम्फेडेमा का खतरा? सुपर माइक्रोसर्जरी रोकथाम में कितनी प्रभावी?

कैंसर इलाज के बाद कई मरीजों को अचानक अंगों में लगातार सूजन का सामना करना पड़ता है, जिसे लिम्फेडेमा कहते हैं। लेकिन आखिर कैंसर सर्जरी या रेडिएशन के बाद यह खतरा इतना बढ़ क्यों जाता है और इसका इलाज क्या है?

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Written By: Mukesh Sharma | Updated : August 7, 2026 4:19 PM IST

कैंसर जैसी बीमारी एक या दो नहीं बल्कि कई चुनौतियां अपने साथ लेकर आती है, कैंसर एक व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए अपने आप में ही एक सबसे बड़ी चुनौती होती है। उसके बाद कैंसर का इलाज का असर भी मरीज के शरीर पर लंबे समय तक रहता है और उसके बाद भी अन्य कई समस्याएं होने का खतरा रहता है जिनमें से एक लिम्फेडेमा भी है। एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर के किसी हिस्से, खासकर हाथ या पैर में लिम्फ द्रव जमा होने के कारण लगातार सूजन आ जाती है। यह समस्या अक्सर स्तन कैंसर या स्त्री रोगों से संबंधित कैंसर के इलाज के दौरान लिम्फ नोड्स हटाने या रेडिएशन थेरेपी के बाद विकसित हो सकती है। अगर समय रहते इसकी पहचान करके सही समय पर इलाज न किया जाए तो इसके कारण बार-बार संक्रमण, दर्द व त्वचा में बदलाव होने लगते हैं और मरीज का रोजमर्रा का जीवन व्यस्त हो जाता है।

माइक्रोसर्जरी है विकल्प

लिम्फेडेमा जैसी समस्याओं की समय पर देखभाल व रोकथाम करना जरूरी है और ऐसा न होने पर ये मरीज लिए आने वाले समय में और ज्यादा बड़ी समस्या बन सकती हैं। डॉ. प्रीथा रेड्डी, एग्जिक्यूटिव वाइस चेयरपर्सन, अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप के अनुसार जिस प्रकार कैंसर के मामलों को गंभीरता से लिया जाता है उसी प्रकार उन समस्याओं को गंभीरता से लेना जरूरी है जिनका खतरा अक्सर कैंसर का इलाज होने के बाद बढ़ जाता है जैसे लिम्फेडेमा। अपोलो हॉस्पिटल्स के वीमेन कैंसर सेंटर, अपोलो एथेना ने भारत का पहला वन-स्टॉप कंप्रेहेंसिव लिम्फेडेमा क्लिनिक शुरू किया जो क्लिनिक लिम्फेटिक एजुकेशन एंड रिसर्च नेटवर्क से मान्यता प्राप्त है।

नजरअंदाज करना बन सकता है जानलेवा

कैंसर के बाद होने वाले लिम्फेडेमा के मामलों को गंभीरता से लेना बहुत जरूरी है ताकि कैंसर के बाद भी मरीज को होने वाले इन स्वास्थ्य समस्याओं के खतरे से बचाया जा सके। वन-स्टॉप कंप्रेहेंसिव लिम्फेडेमा का उद्देश्य मुख्य रूप से कैंसर से संबंधित लिम्फेडेमा के इलाज को पर जोर देना है। ऐसा इसलिए अगर इसका समय पर और सही इलाज न शुरू किया जाए तो यह गंभीर संक्रमण का कारण बन सकता है और कुछ मामलों में संक्रमण इतना ज्यादा फैल सकता है कि मरीज की जान के लिए भी खतरा बन सकता हैय़

भारत में तेजी से बढ़ रहे लिम्फेडेमा के मरीज

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में 6 लाख से भी ज्यादा लिम्फेडेमा के मामले हैं और इनमें से एक बड़ी संख्या में ऐसे मामले भी हो सकते हैं जो कैंसर के बाद विकसित हुए हैं। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि सिर्फ कैंसर के बाद होने वाले लिम्फेडेमा की समस्याओं पर ही ध्यान देना है। डॉ. समर्थ गुप्ता, सीनियर कंसल्टेंट प्लास्टिक एवं ब्रेस्ट रिकॉन्स्ट्रक्शन सर्जन अपोलो एथेना के अनुसार लिम्फेडेमा की देखभाल किसी एक नजरिए से नहीं की जा सकती है। इसके लिए एक कोऑर्डिनेटेड प्रोग्राम से काम करना पड़ता है, जिसमें समस्या का निदान और उसके अनुसार उसकी सर्जरी व रिहैबिलिटेशन थेरेपी आदि शुरू की जाती हैं।

क्या सभी मामलों में सर्जरी की जरूरत?

ऐसे में सवाल आता है कि क्या अगर कैंसर के बाद लिम्फेडेमा हुआ है, तो उसका इलाज सिर्फ सर्जरी से ही किया जा सकता है। इसपर डॉ. वेंकट रामकृष्णन, कंसल्टेंट प्लास्टिक एंड ब्रेस्ट रिकॉन्स्ट्रक्शन सर्जन, अपोलो एथेना ने बताया कि वह लिम्फेडेमा की गंभीरता और किस हिस्से में यह विकसित हुआ है आदि पर निर्भर करता है। आमतौर पर लिम्फेडेमा की सर्जरी तब करनी पड़ती है जब बीमारी ज्यादा बढ़ चुकी होती है और उससे टिश्यू परमानेंट डैमेज हो चुके होते हैं।

हालांकि, जिन कैंसर के जिन मरीजों में लिम्फेडेमा होने का ज्यादा खतरा रहता है उनके लिए कई बार प्रोफिलैक्टिक लिम्फोवेनस बाईपास (एलबीवी) प्रोसीजर की मदद ली जा सती है, जो इस बाद में इस समस्या के होने के खतरे से बचाव करती है। यह सुपर माइक्रोसर्जिकल प्रोसीजर एक्सिलरी लिम्फ नोड के किसी भाग को निकालते समय की जाती है और कैंसर सर्जरी के दौरान लिंफेटिक ड्रेनेज सिस्टम को वापस जोड़कर शुरु कर दिया जाता है।

डिसक्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल शैक्षणिक एवं सूचनात्मक है, जिसमें कैंसर के कारण बढ़ने वाले लिम्फेडेमा के मामलों और उससे बचाव व रोकथाम का ध्यान दिया जाता है। Thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।