अंगदान के बाद जब ऑर्गन को सफलतापूर्वक बॉडी में ट्रांसप्लांट कर दिया जाए तो फिर जीवनभर दवाएं क्यों खानी पड़ती हैं?

World Organ Donation Day: विश्व अंगदान दिवस के मौके पर हम ऑर्गन डोनेशन के बारे में कुछ बेहद महत्वपूर्ण बातें जानेंगे और इसकी पूरी प्रोसेस के बारे में समझने की कोशिश भी करेंगे।

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Written By: Mukesh Sharma | Published : August 12, 2026 9:51 AM IST

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Medically Verified By: Dr Manoj Gupta

ऑर्गन डोनेट करने को जीवन का सबसे बड़ा गिफ्ट कहा जाता है और कहा जाता है कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को इससे बड़ा दान नहीं दे सकता है। हालांकि, किसी व्यक्ति के ब्रेन डेड घोषित किए जाने से लेकर उसके किसी अंग को किसी दूसरे व्यक्ति में ट्रांसप्लांट करने तक बहुत सी अलग-अलग प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है जैसे कि इसमें मेडिकल जांच, कानूनी प्रक्रिया, कई टीमों के बीच तालमेल और सबसे जरूरी समय पर सही फैसला लेना शामिल होता है। अगर आप ऑर्गन ऑर्गन ट्रांसप्लांट के बारे में समझना चाहते हैं, तो सबसे पहले आपको ब्रेन डेथ और हार्टबीट रुकने के बीच के बारे में समझना होगा। Dr. Manoj Gupta ने TheHealthSite.com के साथ खास बातचीत में कई ऐसी महत्वपूर्ण जानकारियां दी हैं जिनके बारे में हम इस लेख में जानेंगे।

ब्रेन डेथ क्या होती है?

डॉ. मनोज के अनुसार ब्रेन डेथ का मतलब मस्तिष्क की सभी गतिविधियों को रुक जाना का खत्म हो जाना है, जिसमें प्रमुख रूप से ब्रेनस्टेम प्रोसेस भी शामिल हैं। ब्रेन डेथ, मेडिकल साइंस और कानूनी रूप से कोमा या वेजिटेटिव स्टेट से एक अलग स्थिति है। ब्रेन डेड व्यक्ति खुद सांस नहीं ले सकता और मस्तिष्क की कार्यक्षमता वापस आने की कोई संभावना नहीं होती।

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ब्रेन डेथ की पुष्टि करना भी अपने आप में एक बड़ी जांच और क्लीनिकल प्रोसेस होती है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि मस्तिष्क की कार्यक्षमता पूरी तरह और स्थायी रूप से खत्म हो चुकी है। साथ ही यह भी देखा जाता है कि मरीज किसी ऐसी दवा के प्रभाव में तो नहीं है या कोई दूसरी मेडिकल समस्या तो नहीं है, जिसकी वजह से उसकी स्थिति ऐसी दिखाई दे रही हो।

ब्रेन डेड के बाद ऑर्गन डोनेशन

ब्रेन डेड के बाद ही मरीज के किसी ऑर्गन को किसी जरूरतमंद व्यक्ति के शरीर में ट्रांसप्लांट किया जाता है। लेकिन यह सिर्फ कहने जितना आसान नहीं है, बल्कि अगर मरीज ने पहले अंगदान की इच्छा जताई हो या परिवार ने इसके लिए जरूरी सहमति दी हो, तो ब्रेन डेथ की पुष्टि के बाद अंगदान की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। इतना ही नहीं इस प्रक्रिया में मेडिकली अप्रूवल होने के साथ-साथ कानूनी नियमों को साथ लेकर चलना पड़ता है।

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अंगों की जांच की प्रक्रिया

जब ऑर्गन डोनेशन की सहमति मिल जाए तो उसके बाद स्पेशलिस्ट ट्रांसप्लांट कोर्डिनेशन टीम जांच क मदद से यह पता लगाती है कि ब्रेन डेड पेशेंट के कौन-कौन से अंग और टिश्यू ट्रांसप्लांट के लिए सही हैं। इसके लिए डोनर की निम्न जांच की जाती है -

  • मरीज को पहले क्या बीमारियां रही हैं
  • मरीज का ब्लड ग्रुप क्या है
  • क्या मरीज के किसी पहले अंग में कोई दिक्कत थी
  • क्या मरीज को कोई गंभीर इन्फेक्शन था और उसका इलाज हो गया था या नहीं
  • जरूरी नहीं हर अंग ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त हो

यह जरूरी नहीं है कि ब्रेन डेथ के बाद मरीज का हर अंग ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त हो। आमतौर पर हृदय, फेफड़े, लिवर, किडनी, पैंक्रियास और आंत जैसे अंग ट्रांसप्लांट किए जा सकते हैं। इसके अलावा कॉर्निया, त्वचा, हड्डी और हार्ट वाल्व जैसे टिश्यू भी जरूरतमंद मरीजों की मदद कर सकते हैं। लेकिन ब्रेन डेड पेशेंट का कौन सा अंग कितना उपयुक्त है यह सिर्फ सही मेडिकल जांच करके ही ट्रांसप्लांट एक्सपर्ट्स पता लगाते हैं।

सही डोनर का चुनाव

डॉ. गुप्ता के अनुसार, जब किसी अंग को ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त माना जाता है, तो डोनर और उपलब्ध अंग की जानकारी ऑर्गन ट्रांसप्लांट एलोकेशन सिस्टम में दर्ज की जाती है। इसके बाद डोनर और रिसिपिएंट के हेल्थ के अनुसार यह कुछ मानदंडों पर निर्भर करता है -

  • ब्लड ग्रुप सूट करता है या नहीं
  • दोनों की मेडिकल हिस्ट्री जैसे कोई गंभीर बीमारी
  • दोनों में से किसी को पहले हुए कोई गंभीर सर्जरी
  • रिसिपिएंट कितने समय से ऑर्गन की जरूरत है
  • ब्रेन डेथ हुए कितना समय हो गया है

इन सभी चीजों की जांच की जाती है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि ब्रेन डेड पेशेंट के डोनेट किए जा सकने वाले ऑर्गन का ट्रांसप्लांट सही तरीके से किया जा सके। ऐसा जरूरी नहीं है कि अंग हमेशा सिर्फ उस व्यक्ति को मिले जो वेटिंग लिस्ट में सबसे ऊपर हो।

ऑर्गन डोनेशन के बाद जीवन

जब किसी व्यक्ति के शरीर में कोई अंग ट्रांसप्लांट किया जाता है, तो उसे एक तरह से नया जीवन मिलता है। कोई अंग जो किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर में काम कर रहा था अब उसके शरीर में भी ऐसे ही काम करेगा और व्यक्ति को जिंदा रखने में मदद करेगा। हालांकि, एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ऑर्गन रिसीव होने के बाद व्यक्ति का जीवन लगभग पूरी तरह से सामान्य ही हो जाता है, लेकिन उसे अपनी हेल्थ का खास ध्यान रखना पड़ता है जो कि वैसे भी हर किसी को रखना चाहिए।

लेकिन यहां अब बात आती है आपके इम्यून सिस्टम की जिसे कोई भी बाहर की चीज शरीर के अंदर पसंद नहीं होती, चाहे फिर वह आपके जीवन को बचाने वाला कोई अंग क्यों न हो। इस कंडीशन को ऑर्गन रिजेक्शन कहा जाता है, क्योंकि इम्यून सिस्टम उस बाहर के ऑर्गन को नुकसान पहुंचाने लग जाता है। ऐसे में बारी आती है इम्यूनोसप्रासांट्स दवाओं की। ये दवाएं इम्यून सिस्टम को दबा कर रखती हैं, जिससे वह बाहरी अंग को नुकसान नहीं पहुंचा पाता है।

डिसक्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी उद्देश्य केवल शैक्षणिक एवं सूचनात्मक है, जिसमें ऑर्गन डोनेट करने की प्रोसेस के बारे में और उसके बाद के जीवन के बारे में बताया गया है। इस लेख में दी गई कोई भी जानकारी किसी भी समस्या के इलाज के लिए नहीं है और Thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।