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विश्व कैंसर दिवस: भारत में धूम्रपान नहीं करने वाली महिलाओं में क्यों बढ़ रहा है फेफड़ों का कैंसर?

Cancer in Women: फेफड़ों का कैंसर एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है. इसलिए कैंसर के प्रति जागरूक होना बहुत आवश्यक है.

Written By Atul Modi
Published : February 2, 2022 9:30 PM IST

फेफड़ों का कैंसर सबसे खतरनाक किस्‍म के कैंसर में से एक है जिसकी वजह से हर साल काफी बड़ी संख्‍या में मौतें होती हैं। चूंकि अक्‍सर यह तब पकड़ में आता है जब काफी एडवांस स्‍टेज में पहुंच जाता है, इसी वजह से विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (WHO) ने, लंग कैंसर को कैंसर से होने वाली मौतों में प्रमुख कारण बताया है, जिसकी वजह से 2018 में 2.09 मिलियन मौतें हुई थीं। अक्सर शुरुआत में इसके लक्षणों की पहचान नहीं हो पाती और लोग इन लक्षणों को आम समस्‍या मानकर नजरअंदाज करते हैं।

पुरुषों एवं महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर से जुड़े विभिन्‍न पहलुओं की सही ढंग से पड़ताल करने के लिए, 2013 से 2015 के दौरान एक अध्‍ययन कराया गया, जिसमें फेफड़ों के कैंसर से पीड़‍ित 250 से अधिक मरीज़ों को शामिल किया गया था। इस अध्‍ययन से संकेत मिले थे कि तंबाकू का सेवन फेफड़ों के कैंसर का प्रमुख कारण है और इसी वजह से इस कैंसर को अक्‍सर धूम्रपान करने वालों का रोग माना जाता है। लेकिन यह भी देखने में आया है कि धूम्रपान नहीं करने वाली महिलाओं में भी यह रोग काफी बढ़ा है।

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  • फेफड़ों के कैंसर से ग्रस्‍त कुल मरीज़ों में 75% मरीज़ पुरुष थे, जबकि एक-चौथाई संख्‍या महिलाओं की थी
  • इनमें से, 70% मरीज़ धूम्रपान करते थे जबकि 30% धूम्रपान नहीं करते थे, यह भी पाया गया कि 82% महिला मरीज़ धूम्रपान नहीं करती थीं
  • ये महिलाएं मुख्‍य रूप से दिल्‍ली-एनसीआर और टियर 2 एवं 3 शहरों जैसे कि मुरादाबाद, सहारनपुर, हाथरस, आगरा, मथुरा, वाराणसी, मुजफ्फरनगर आदि से थीं

भारत में, पिछले एक दशक में कैंसर के मामलों में काफी बढ़ोतरी देखी गई है। लेकिन साथ ही, यह भी देखा गया है कि महिलाओं में फेफड़े का कैंसर बढ़ा है, जिनमें से 82% महिलाएं धूम्रपान नहीं करती हैं। इसके प्रमुख कारणों में इंडोर वायु प्रदूषण में वृद्धि माना जा रहा है क्‍योंकि महिलाएं ज्‍यादातर समय घरों के अंदर गुजारती हैं और उनका अधिकांश समय कम हवादार रसोईघरों में बीतता है।

महिलाएं हमारे समाज का अहम हिस्‍सा होती हैं, और यह जरूरी है कि वे अपने स्‍वास्‍थ्‍य की देखभाल के लिए आगे आएं और सक्रियतापूर्वक इस ओर ध्‍यान दें। इस बारे में जागरूकता बढ़ाना, और खासतौर से टियर 2 एवं 3 शहरों में लोगों को सजग बनाया जाना जरूरी है तथा यह संदेश दिया जाना चाहिए कि चूल्‍हा और कम हवादार स्‍थानों में रहना स्‍वास्‍थ्‍य के लिए संकट पैदा कर सकता है।

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दिल्‍ली एनसीआर में, फेफड़ों का कैंसर पुरुषों में सबसे आम प्रकार का कैंसर है और यहां आबादी में एज एडजस्‍टेड रेट (AAR) प्रति 100,000 में 13.9 है जबकि महिलाओं में यह दर प्रति 100,000 की आबादी पर 4.2 है, तथा यह महिलाओं में सबसे आम प्रकार का कैंसर है। पिछले करीब दो दशकों में, 61% ज्‍यादा महिलाएं लंग कैंसर की शिकार बनी हैं जबकि पुरुषों में यह प्रतिशत सिर्फ 20% है।

महिलाओं में फेफड़ों का कैंसर बढ़ने के संभावित कारण

पश्चिम में महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर के मामले बढ़ने का कारण अधिकाधिक महिलओं का धूम्रपान करना माना गया था, जबकि भारत में यह इंडोर और आउटडोर पर्यावरण प्रदूषण बढ़ने के कारण हो रहा है। खाना पकाने के लिए ईंधन के अकुशल साधनों जैसे लकड़ी और मिट्टी का तेल बड़ी मात्रा में प्रयोग करने और इनके चलते काफी अधिक मात्रा में पैदा होने वाले कार्बन कण फेफड़ों में काफी गहरायी तक पहुंच जाते हैं। घरों के अंदर पैदा होने वाला वायु प्रदूषण और भी खतरनाक होता है क्‍योंकि महिलाएं इसके अधिक संपर्क में आती हैं।

  • पुरुषों के मुकाबले महिलाएं इंडोर वायु प्रदूषण के अधिक संपर्क में आती हैं क्‍योंकि वे लंबे समय तक रसोईघरों में काम करती हैं, अगरबत्‍ती का धुंआ और पारंपरिक चूल्‍हों में लकड़ी तथा उपलों के जलाने की वजह से पैदा होने वाला धुंआ भी उन्‍हें ज्‍यादा प्रभावित करता है।
  • 2006 में, विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने चेताया था कि इंडोर वायु प्रदूषण की वजह से करब 5 लाख लोगों की जान हर साल जाती है। दक्षिणपूर्वी एशिया में हर साल समय पूर्व प्रसव (प्रीमैच्‍योर) की वजह से होने वाली 6,00,000 मौतों में लगभग 80% भारत में दर्ज की जाती हैं जो कि इंडोर वायु प्रदूषण की वजह से होती हैं।
  • 2015 में लैंसेट रिपोर्ट के अनुसार, चूल्‍हे की वजह से पैदा होने वाले इंडोर वायु प्रदूषण के कारण लगभग 1.2 लाख प्रीमैच्‍योर मौतें दर्ज हुईं।
  • इसकी एक बड़ी वजह यह है कि 70%भारतीय घरों में हवा के आने-जाने की समुचित व्‍यवस्‍था नहीं है और 3 अरब से अधिक लोग खाना पकाने के लिए ठोस ईंधन पर निर्भर हैं। यह जानना महत्वपूर्ण है कि ठोस ईंधन का घरों के अंदर इस्‍तेमाल करने से कार्बन मोनोऑक्‍साइड, बेंज़ीन, प्रदूषणकारी कणों, फॉर्मेल्‍डीहाइड, आदि का खतरा बढ़ जाता है जो कि फेफड़ों के कैंसर का बड़ा कारण है।
  • इसी तरह, अगरबत्तियों का धुंआ भी घरों के अंदर वायु गुणवत्‍ता बिगाड़ने में योगदान करता है और इसकी वजह से फेफड़ों के कैंसर का जोखिम बढ़ता है। ये अगर‍बत्तियां चारकोल वुड की बनी होती हैं जिन्‍हें जलाने पर वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स, प्रदूषणकारी कणों के अलावा सल्‍फर डाइऑक्‍साइड, फॉर्मेल्‍डीहाइड, कार्बन मोनोऑक्‍साइड तथा नाइट्रोजन के ऑक्‍साइड जैसी कई गैसें पैदा होती हैं।

हमें इंडोर और आउटडोर दोनों ही प्रकार के प्रदूषणों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। कम हवादार घरों और रसोईघरों के खतरों क बारे में लोगों को सचेत करना जरूरी है। इसी तरह, चूल्‍हे के स्‍थान पर एलपीजी का इस्‍तेमाल करने से इंडोर प्रदूषण को काफी हद तक कम किया जा सकता है, जो कि देश के टियर 2 एवं 3 शहरों में काफी कारगर साबित होगा। उधर, दिल्‍ली-एनसीआर जैसे महानगर में, इंडोर एवं आउटडोर प्रदूषण की वजह से महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर के मामले बढ़ने की आशंका जतायी जा रही है।

निदान और उपचार में प्रगति के बावजूद, फेफड़ों का कैंसर भारत में असामयिक मौतों का एक बड़ा कारण बना हुआ है। इसकी प्रमुख वजहों में वायु प्रदूषण, धूम्रपान और किसी भी प्रकार के तंबाकू का सेवन आदि हैं। हालांकि महिलाएं और पुरुष दोनों ही इसकी वजह से प्रभावित होते हैं, जो कि जागरूकता में कमी के कारण है, और इसके चलते इस रोग का निदान देरी से होता है, या फिर लोग डॉक्‍टर के पास जाकर जांच कराने से बचते हैं। इस परिप्रेक्ष्‍य में यह जरूरी हो जाता है कि महिलाएं इस बात को लेकर जागरूक बनें कि वे कैसे खुद को इस रोग के जोखिमकारी प्रभावों से बचा सकती हैं।

(Inputs By: Dr. Anil Kumar Anand, Senior Director & HOD, Radiation Oncology, Fortis Memorial Research Institute, Gurugram.)

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