
... Read More
Written By: Anshumala | Published : January 25, 2019 4:01 PM IST
Even if a doctor has advised a patient or if they have taken the decision by themselves, several doubts persist in one’s mind while going for genetic testing. First, the test results are not always straightforward, and patients may be unable to differentiate between a positive and a negative test.
जेनेटिक परीक्षण का क्रेज पिछले 2-3 वर्षों से इसलिए बढ़ रहा है, क्योंकि अधिक से अधिक लोग विरासत में मिली बीमारियों के प्रति अपनी भेद्यता (Vulnerability) निर्धारित करने के इच्छुक हैं। जेनेटिक डायग्नोसिस कुछ विशिष्ट प्रकार की असामान्यताओं के लिए आनुवांशिक संवेदनशीलता को पहचानता है। यह परीक्षण रक्त या छोटे शरीर के ऊतकों के छोटे नमूनों का न केवल विश्लेषण कर सकता है, बल्कि विरासत में मिले विकारों की पहचान करने के लिए गुणसूत्रों, जीन और प्रोटीन संरचना में परिवर्तन की पहचान भी कर सकता है। एहतियाती उपाय बरतने के लिए लोगों में कुछ आनुवांशिक स्थिति के साथ विकसित होने या होने की संभावना की पुष्टि करने के लिए यह चिकित्सा परीक्षण अब लोगों के लिए सुविधाजनक हो गया है।
गलत डायग्नोसिस से बढ़ती हैं परेशानियां, लैब का चयन करें सोच-समझकर
बेहतर उपचार का विकल्प देता है यह टेस्ट
3 एच केयर की संस्थापक और सीईओ डॉ. रुचि गुप्ता का कहना है कि यदि परीक्षणों से प्राप्त परिणाम नकारात्मक अंतर प्रकट करते हैं, तो हम कह सकते हैं कि यह रोगियों के लिए एक बड़ी राहत की बात है। वहीं दूसरी ओर, अगर एक आनुवांशिक अंतर की पहचान की जाती है, तो ऐसे में इसका परिणाम आगामी स्थिति की रोकथाम कैसे की जाए, यह निर्णय लेने के लिए पर्याप्त समय प्रदान करते हैं। दरअसल, परिणाम प्रारंभिक उपचार विकल्पों की अनुमति देने में सहायक होते हैं, जिनके जीवन की गुणवत्ता और उनके जीवन प्रत्याशा पर प्रभाव के संबंध में बड़े पैमाने पर निहितार्थ हो सकते हैं।
आनुवांशिक जांच के उपलब्घ होने के कारण कई माता-पिता को प्रारंभिक अवस्था में पैदा हुए नवजात में असामान्य स्थितियों की पहचान करने में मदद मिलती है, जो कि अनुसंधान और परीक्षण के कारण बेहतर उपचार का विकल्प देता है। केवल यही नहीं, यह परीक्षण किसी विशिष्ट विकार के बारे में अधिक जानने के लिए कि किसी व्यक्ति या पारिवारिक इकाई को कैसे प्रभावित करता है, परीक्षण जीन और आनुवांशिकी के बारे में नई जानकारी खोजने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
भारत में बच्चों में बढ़ रही है मिर्गी की समस्या, कारण जानकर सही उपचार से ठीक हो सकती है समस्या
गर्भावस्था के दौरान अनुवांशिक परीक्षण
यूनिसेफ 2015-16 से प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार, 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की वार्षिक मृत्यु दर दुनिया में सबसे अधिक भारत में है - लगभग 1.4 मिलियन मामले। कुल प्रभावित प्रतिशत का 10 प्रतिशत से अधिक बच्चे जन्मजात विकृतियों और गुणसूत्र असामान्यताओं के कारण इस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। हालांकि, अनुवांशिक परीक्षण मुख्य रूप से क्लिनिकल डायग्नोसिस के माध्यम से किया जाता है, लेकिन अतिरिक्त लाभ में रोग का उपचार और जीन वाहक की पहचान करना भी इसमें शामिल है। ऐसे में डॉक्टरों का मानना है कि 35 वर्ष की आयु के बाद गर्भधारण करने वाली महिलाओं को जेनेटिक असामान्यताओं और विकारों वाले बच्चों को जन्म देने का अधिक खतरा बना रहता है।
डॉ. रुचि गुप्ता के अनुसार, जिस तरह से बच्चे की त्वचा के रंग, बालों और आंखों की बनावट को प्रभावित करने के लिए जीन जिम्मेदार होते हैं, ठीक उसी तरह जीन विभिन्न जन्म दोषों को भी प्रभावित करता है। दरअसल, इसी वजह से गर्भवती महिलाओं को पहली और दूसरी तिमाही में सभी संभावित अनुवांशिक जांच परीक्षणों से गुजरने की सम्यक सलाह दी जाती है। यह सलाह उनके लिए और उनके विकासशील भ्रूणों में संभावित समस्याओं के जोखिम का मूल्यांकन करने में मददगार होता है। सबसे महत्वपूर्ण दोषों में शामिल हैं - डाउन सिंड्रोम, स्प्लिट स्पाइन डिफेक्ट, सिकल सेल एनीमिया और कई अन्य लोगों में सिस्टिक फाइब्रोसिस।
परीक्षण के प्रकार क्या हैं?
न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग - जन्मजात विकारों की पहचान और जन्मों का परीक्षण असामान्यताओं के लिए किया जाता है, ताकि उन्हें शुरुआती उपचार या रोकथाम के विकल्प प्रदान किए जा सके।
डायग्नोस्टिक परीक्षण - इसका उपयोग विशिष्ट अनुवांशिक या गुणसूत्र स्थिति को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। जन्म से पहले या जीवन में किसी भी समय क्लिनिकल परीक्षण किया जा सकता है। दरअसल, यह परीक्षण आहार नियंत्रण, व्यायाम आदि जैसे जीवन शैली की आदतों में बदलाव करके स्थिति को रोकने में सहायक होता है।
भारत 2020 तक डायग्नोस्टिक विकास में अग्रणी होगा
करियर टेस्टिंग - यह परीक्षण उन लोगों की पहचान करने के लिए किया जाता है, जो एक जीन परिवर्तन के वाहक होते हैं, जो कि दो श्रेणियों में होने पर अनुवंशिक का कारण बनता है। जिन व्यक्तियों में अनुवांशिक विकार का पुस्तैनी इतिहास होता है, वे इससे गुजरते हैं। कभी-कभी माता-पिता दोनों का परीक्षण किया जाता है। यह परीक्षण एक दंपति को अनुवांंशिक स्थिति वाले बच्चे के होने के जोखिम के बारे में जानकारी प्रदान करता है।
शारीरिक परीक्षण - यह एक महत्वपूर्ण परीक्षण है, जो जन्म से पहले भ्रूण के जीन या गुणसूत्रों में परिवर्तन का पता लगाने के लिए किया जाता है। अनुवांशिक या क्रोमोजोमल विकार वाले बच्चे के बढ़ते जोखिम की जांच करने के लिए गर्भावस्था से पहले इसका परीक्षण किया जाता है।
प्री-इम्प्लांटेशन टेस्टिंग - इसे प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस (पीजीडी) भी कहा जाता है, जो एक विशेष तकनीक है। किसी विशेष अनुवांशिक या क्रोमोजोमल विकार वाले बच्चे के होने के जोखिम को कम कर सकती है। भ्रूण में आनुवांशिक परिवर्तन का पता लगाने के लिए यह परीक्षण भी बहुत फायदेमंद है जो कि इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन जैसी सहायक प्रजनन तकनीकों का उपयोग करके बनाए गए थे।
कैसे किया जाता है अनुवांशिक परीक्षण ?
रक्त, बाल, त्वचा और गाल के अंदर मौजूद ऊतक या यहां तक कि गर्भ में भ्रूण को घेरने वाले अम्निओटिक तरल पदार्थ के नमूनों का परीक्षण किया जा सकता है। पुख्ता देखरेख और सबसे अच्छे परिणामों के लिए उच्च योग्य पेशेवर प्रोफेसर्स द्वारा निगरानी करने की जरूरत है। नवजात शिशु की जांच के मामले में डॉक्टर को रक्त परीक्षण करते समय सावधानी बरतने और माता-पिता की सहमति लेना जरूरी है।