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Why is childhood cancer on the rise in India : भारत में आज भी कैंसर शब्द सुनते ही हमारे मन में एक डर बैठ जाता है। लेकिन जब यह बीमारी बचपन में सामने आती है, तो पेरेंट्स के दिमाग में डर के साथ-साथ असहायता और अपराध बोध भी जुड़ जाता है। बचपन में होने वाले कैंसर को चाइल्डहुड कैंसर (childhood cancer) कहा जाता है। भारत जैसे तमाम देशों में हजारों बच्चों में कैंसर के मामले सामने आते हैं। सवाल यह नहीं है कि कैंसर होता क्यों है, बल्कि यह है कि भारत में बच्चों में कैंसर के मामले लगातार क्यों बढ़ रहे हैं? और उससे भी ज्यादा अहम सवाल- पेरेंट्स क्या कर सकते हैं?
बचपन में होने वाले कैंसर को चाइल्डहुड कैंसर कहा जाता है। वैश्विक स्तर पर बचपन में होने वाले कैंसर के प्रति जागरूकता लाने के लिए हर साल 15 फरवरी को इंटरनेशनल चाइल्डहुड कैंसर डे (International Childhood cancer day 2026) के रूप में मनाते हैं। इस दिन हॉस्पिटल, स्कूल, कॉलेज, एनजीओ और अन्य संस्थाओं में तरह-तरह के कैंपेन और प्रोग्राम के जरिये बच्चों में होने वाले जानलेवा कैंसर के जोखिम, कारण एवं उपाय को लेकर लोगों के बीच जागरूकता फैलाने की कोशिश की जाती है।
हरियाणा के सोनीपत स्थित एंडोमेड्रा अस्पताल के सीनियर ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अरुण कुमार गोयल के अनुसार, बचपन का कैंसर (Childhood Cancer) वे कैंसर होते हैं जो आमतौर पर 0 से 14 वर्ष की उम्र में पाए जाते हैं। बच्चों में होने वाले कैंसर वयस्कों को होने वाले कैंसर से अलग होता है। बच्चों को होने वाला कैंसर न सिर्फ अलग होता है, बल्कि इसके इलाज का तरीका भी अलग होता है।
भारत में बच्चों में सबसे ज्यादा पाए जाने वाले कैंसर हैं:
हमारे साथ बातचीत में डॉ. अरुण कहते हैं कि यह सवाल बहुत गहरा है और इसका जवाब केवल एक कारण में नहीं छिपा। पहले भी बच्चे बीमार होते थे, लेकिन अब उन्हें पहचाना जा रहा है। 20 साल के मेडिकल इतिहास पर गौर किया जाए, तो भारत में पहले के मुकाबले कैंसर का डायग्नोसिस बेहतर हुआ है। इतना नहीं, पहले ग्रामीण इलाकों में कैंसर की पहचान ही नहीं हो पाती थी। लेकिन अब सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में जांच की सुविधाएं बढ़ी हैं। कैंसर रजिस्ट्रियों का नेटवर्क मजबूत हुआ है।
ऑन्कोलॉजिस्ट बताते हैं कि भारत जैसे विकासशील देशों में आज वायु और जल का प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है। वायु प्रदूषण में मौजूद PM2.5 फेफड़ों को प्रभावित करते हैं। इस तरह की प्रदूषित हवा में बच्चे अगर लंबे समय तक सांस ले, तो उसमें फेफड़ों के कैंसर होने की संभावना 10 गुणा तक बढ़ जाती है। वायु के बाद बात आती है पानी की। हमारे देश में आज भी एक बड़ा तबका कीटनाशकों से दूषित पानी पी रहा है। गंदा पानी पीने से सिर्फ हैजा जैसी बीमारी नहीं बल्कि कैंसर जैसी घातक बीमारी भी होती है। वायु और जल प्रदूषण सभी बच्चों के डिवेलप हो रहे सेल्स को नुकसान पहुंचा सकते हैं। बच्चों का इम्यून सिस्टम अभी पूरी तरह मजबूत नहीं होता, इसलिए वे ज्यादा संवेदनशील होते हैं। ऐसे में उनमें कैंसर का खतरा ज्यादा हो सकता है।
कई रिसर्च बताती हैं कि बच्चे का कैंसर कभी-कभी मां की प्रेग्नेंसी से जुड़ा होता है। जो महिलाएं प्रेग्नेंसी के दौरान स्मोकिंग सेकेंड हैंड स्मोक, शराब, कोल्ड ड्रिंक, बिना सलाह दवाओं का सेवन और रेडिएशन एक्सपोजर में रहती हैं, उनके बच्चों में कैंसर का खतरा ज्यादा होता है। डॉ. अरुण कुमार गोयल का कहना है कि प्रेग्नेंसी के दौरान स्मोकिंग और शराब का सेवन करने से बच्चे के जीन स्तर पर बदलाव हो सकते हैं। जिससे कैंसर का खतरा बढ़ता है।
आज के बच्चे जंक फूड ज्यादा खाते हैं। जंक फूड में इस्तेमाल होने वाला तेल, सोडियम और तेल का बार-बार इस्तेमाल करने से भी कैंसर का खतरा बढ़ता है। इसके अलावा बच्चों का मोबाइल, टीवी और स्क्रीन टाइम ज्यादा होना भी कैंसर के खतरे को बढ़ावा देता है।
मोया क्लीनिककी वेबसाइट पर छपी एक रिसर्च के अनुसार, इन दिनों बच्चे अपना ज्यादा समय मोबाइल और टीवी के सामने गुजारते हैं। ऐसी परिस्थिति में बच्चों का दौड़ना, कूदना और खेलना कम होता है। आसान भाषा में कहें तो डिजिटल जमाने में बच्चों की फिजिकल एक्टिविटी कम हो गई है, जिसके कारण मोटापा, हार्मोनल बदलाव और कमजोर इम्यूनिटी की समस्या बच्चों में देखी जाती है। ये सब कैंसर के जोखिम को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाते हैं।
डॉ. अरुण कुमार गोयल का कहना है कि भारत जैसे देश में कैंसर का सबसे बड़ा दुश्मन है देरी। वयस्कों और बच्चों में कैंसर के लक्षण जब हल्के होते हैं, तब लोग ध्यान नहीं देते हैं। इसके कारण कैंसर के इलाज में देरी होती है। इसलिए बचपन में होने वाले कैंसर को शुरुआती स्टेज में पहचानना जरूरी है। बचपन में होने वाले कैंसर के सामान्य लक्षणों में शामिल हैः

डॉक्टर बताते हैं कि बच्चों में ये लक्षण आम बीमारियों जैसे लग सकते हैं, लेकिन यह अगर लगातार बने रहते हैं या बार-बार बच्चों को इस तरह की परेशानी हो रही है, तो पेरेंट्स को सावधान होना चाहिए और इस बारे में डॉक्टर से बात करनी चाहिए।


2 दशक पहले भारत में बचपन में होने वाले कैंसर का इलाज काफी मुश्किल और महंगा हुआ करता था। पर अब कई सरकारी अस्पतालों में बचपन के कैंसर का मुफ्त या कम लागत पर इलाज हो जाता है। वर्तमान में केंद्र सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिसमें इनरोल करके आप कैंसर का इलाज मुफ्त या बाजार से कम लागत पर करवा सकते हैं। इसके अलावा NGO और चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा बचपन के कैंसर का इलाज कम पैसों पर करवाने से मरीजों का सर्वाइवल रेट लगातार बेहतर हो रहा है।

हेल्थ एक्सपर्ट इस बात को मानते हैं कि बचपन होने वाला कैंसर सिर्फ एक बच्चे, पेरेंट्स या सिर्फ एक परिवार की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की लड़ाई है। स्कूलों में हेल्थ एजुकेशन, वायु और जल प्रदूषण नियंत्रण, सुरक्षित फूड पॉलिसी और बच्चों के लिए हेल्दी एनवायरनमेंट ये सब मिलकर ही बदलाव ला सकते हैं और बचपन में होने वाले कैंसर के आंकड़ों को घटा सकते हैं।
याद रहे कैंसर या किसी भी बीमारी की शुरुआत 1 दिन या 1 महीने में नहीं होती है। कैंसर को शरीर के अंदर पनपने के लिए कई सालों का वक्त लगता है। ऐसे में हमें खुद के शरीर पर ध्यान देने की जरूरत है। छोटी सी लापरवाही शरीर में बीमारी को बढ़ा सकती है। वहीं, दूसरी ओर थोड़ी सी सावधानी हमें कई प्रकार की बीमारियों से बचाने में मदद कर सकती है।
Disclaimer : प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।