नॉर्मल फेफड़े और अस्थमा वालों के फेफड़ों में क्या फर्क है? जानिए अस्थमा में फेफड़े कैसे बदल जाते हैं

सामान्य फेफड़ों और अस्थमा रोगियों के फेफड़ों में काफी अंतर होता है। अस्थमा रोगियों की सांस नलियों में भी सूजन होती है। इससे सांस लेने में मुश्किल होने लगती है।

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Written By: Anju Rawat | Updated : May 5, 2026 7:47 AM IST

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Medically Verified By: Dr. Neetu Jain

जब कोई पैदा होता है, तो सबसे पहला काम जो वह करता है…वो है सांस लेना। जब फेफड़े पहली बार खुलते हैं, तो उसी पल से हमारी जिंदगी की शुरुआत होती है। उसके बाद से, हम बिना रुके हर पल सांस लेते हैं। हंसते, दौड़ते, खाते, पीते, सोते समय सांस लेते हैं और सांस लेने की प्रक्रिया चुप-चाप चलती रहती है। लेकिन क्या आपने सोचा है, कभी अगर सांस लेना मुश्किल हो जाए तो क्या होगा? अगर हम सांस लेने की कोशिश करें, लेकिन सीने में जकड़न महसूस हो, सीने में दर्द होने लगे या सांस अंदर जाते-जाते ही रुक जाए... तो क्या होगा? कुछ ऐसी ही कहानी होती है, अस्थमा मरीजों की। जिन्हें अक्सर ही सांस लेने में मुश्किल होती है। सीढ़िया चढ़ते समय हो या थोड़ा-सा परफ्यूम छिड़कते समय हो, अस्थमा रोगियों को खांसी होने लगती है और उनके लिए सांस लेना सबसे बड़ा टास्क बन जाता है। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर अस्थमा रोगियों के साथ ऐसा क्यों होता है? तो आपको बता दें कि जब एक व्यक्ति को अस्थमा होता है, तो उसके फेफड़ों में बदलाव आ जाते हैं। उसके फेफड़े, नॉर्मल लंग्स से अलग हो जाते हैं। यही वजह है कि उसे सांस से जुड़ी तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ता है। आइए, इस अंतर को PSRI hospital की सीनियर कंसल्टेंट पल्मोनोलॉजी क्रिटिकल केयर एंड स्लीप मेडिसिन डॉ. नीतू जैन से विस्तार से और सरल भाषा में समझते हैं। आपको बता दें कि हर साल 5 मई को विश्व अस्थमा दिवस (World Asthma Day) मनाया जाता है। इस मौके पर हम आपको सामान्य फेफड़ों और अस्थमा वाले फेफड़ों में अंतर बताने जा रहे हैं-

सांस लेने में मुश्किल होता है अस्थमा का संकेत!

अस्थमा रोगियों और सामान्य लोगों के सांस की आवाज से ही अस्थमा का संकेत आसानी से मिल जाता है। इसलिए अगर सांस से जुड़ा कोई संकेत दिखे तो इसकी अनदेखी न करें।

एक सामान्य व्यक्ति की सांस कैसी होती है?

जब एक सामान्य व्यक्ति सीढ़िया चढ़ता है या दौड़ता है, तो उसकी सांस भले ही तेज हो जाती है। लेकिन, थोड़ी ही देर में उसकी सांस सामान्य हो जाती है। स्वस्थ व्यक्ति को सीढ़िया चढ़ते या दौड़ लगाते समय छाती में दर्द या घबराहट जैसा महसूस नहीं होता है। इसका मतलब होता है कि फेफड़े स्वस्थ है और बिना किसी रुकावट के काम कर रहे हैं।

अस्थमा मरीजों की सांस कैसी होती है?

सांस के जरिए ही अस्थमा रोगियों का आसानी से पता लगाया जा सकता है। अस्थमा रोगियों को थोड़ी-सी मेहनत के बाद ही सांस लेने में परेशानी होने लगती है। सीढ़िया चढ़ते या दौड़ लगाते समय उनकी सांस फूलने लगती है। कई बार सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज आती है। अगर आपके साथ भी ऐसा होता है, तो इसका मतलब है कि वायुमार्ग संकरा हो गया है और आपको अस्थमा है।

अस्थमा लंग्स और नॉर्मल लंग्स में क्या अंतर होता है?

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दरअसल, हम सभी लोग अस्थमा रोगियों में सिर्फ लक्षणों को देख पाते हैं। लेकिन, अस्थमा वाले फेफड़ों की कहानी अंदर से चल रही होती है, जिसमें काफी बदलाव हो चुके हैं जो कि व्यक्ति की सेहत को बिगाड़तते हैं।

हेल्दी फेफड़े कैसे होते हैं?

आपको बता दें कि एक स्वस्थ व्यक्ति के फेफड़ों में हवा के लिए रास्ता बिल्कुल साफ होता है। इन लोगों की नलियां खुली रहती हैं और उनमें कोई सूजन या रुकावट नहीं होती है। जब कोई स्वस्थ व्यक्ति सांस लेता है, तो हवा आराम से अंदर जाती है और उतनी ही आसानी से बाहर निकल जाती है। इसलिए उन्हें सांस लेते समय कोई दिक्कत महसूस नहीं होती है।

अस्थमा में फेफड़े कैसे होते हैं?

अस्थमा रोगियों के फेफड़ों की पूरी स्थिति ही बिगड़ चुकी होती है। अस्थमा में नलियां सूज जाती हैं और उनकी अंदरूनी परत मोटी हो जाती है। इनमें बलगम जमा होने लगता है, जिसकी वजह से बार-बार खांसी होती है। नलियों में सूजन की वजह से हवा के लिए जगह कम हो जाती है। इसलिए अस्थमा रोगियों को सांस लेने में काफी मुश्किल होती है।

सामान्य सांस नली और अस्थमा सांस नली में अंतर क्या है?

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स्वस्थ व्यक्ति की सांस नली सही तरीके से काम करती है और रास्ता चौड़ा और खुला हुआ होता है। वहीं, अस्थमा रोगियों में सांस नली का रास्त काफी संकरा होता है, इसकी वजह से सांस लेना मुश्किल होता है।

सामान्य सांस नली

सामान्य सांस नली में बलगम काफी कम होता है और अंदर की परत सूखी हुई होती है। सांस की नली की दीवार सामान्य होती है। इसमें हवा का रास्ता साफ और चौड़ा होता है। ऑक्सीजन का प्रवाह सामान्य रहता है। इसलिए सांस लेना काफी आसान होता है। इस स्थिति में खांसी और घरघराहट जैसी समस्याएं भी नहीं होती हैं।

अस्थमा सांस नली

वहीं, अस्थमा रोगियों में सांस नली में सूजन हो जाती है। अंदर का रास्ता काफी संकरा हो जाता है। इन रोगियों की नलियों में बलगम भी जमा रहता है। अस्थमा रोगियों की सांस नली में हवा का रास्ता संकरा होता है। ऑक्सीजन का प्रवाह कम होता है, जिसकी वजह से उन्हें सांस लेने में मुश्किल होती है। उन्हें घरघराहट और जकड़न जैसा महसूस हो सकता है।

प्रदूषण में स्वस्थ फेफड़े और अस्थमा वाले फेफड़े कैसा रिएक्ट करते हैं?

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प्रदूषण के संपर्क में आने पर स्वस्थ फेफड़े श्वसन-तंत्र को सुरक्षित रखने के लिए धूल और हानिकारक कणों को बाहर निकालने की कोशिश करते हैं, जिससे सांस लेने की प्रक्रिया सामान्य बनी रहती है। इनमें हवा और ऑक्सीजन का प्रवाह सही बना रहता है। वहीं, अस्थमा से प्रभावित फेफड़े प्रदूषण के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। प्रदूषण की वजह से अस्थमा वाले फेफड़ों में सूजन बढ़ जाती है, सांस की नलियां संकरी हो जाती हैं और बलगम बनने लगता है। इससे सांस लेने में कठिनाई, खांसी, घरघराहट और थकान जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।

नॉर्मल और अस्थमा रोगियों में ऑक्सीजन सप्लाई कैसा होता है?

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सामान्य स्थिति में फेफड़ों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति सही तरीके से होती है। सांस की नलियां खुली और साफ रहती हैं, जिससे हवा आसानी से अंदर पहुंचती है और ऑक्सीजन युक्त खून में मिल जाती है। इससे शरीर के सभी अंगों को पर्याप्त ऊर्जा मिलती है। वहीं, अस्थमा में सांस की नलियों में सूजन आ जाती हैं और ये संकरी हो जाती हैं। इन नलियों में बलगम भर जाता है। इससे ऑक्सीजन का प्रवाह बाधित हो जाता है और सांस फूलना, थकान और कमजोरी जैसी समस्याएं बढ़ने लगती हैं।

इनहेलर लेने से पहले और बाद में एयरवे कैसा होता है?

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अस्थमा में इनहेलर लेने से पहले सांस की नलियां सूजी हुई और संकरी हो जाती हैं, जिससे हवा का प्रवाह कम हो जाता है। इसमें बलगम ज्याद बनता है, जिसकी वजह से सांस लेने में मुश्किल होती है और घरघराहट की समस्याएं होती हैं। वहीं, इनहेलर लेने के बाद दवा सीधे एयरवे तक पहुंचकर सूजन कम करती है और मांसपेशियों को रिलैक्स करती है। इससे सांस की नलियां खुल जाती हैं और हवा का प्रवाह बेहतर हो जाता है।

ये चीजें कर सकती हैं अस्थमा रोगियों को ट्रिगर

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asthma trigger cause- ai generatedआपको बता दें कि अस्थमा रोगियों को हर व्यक्त सांस लेने में तकलीफ नहीं होती है। वे सामान्य जीवन जी रहे होते हैं, लेकिन कुछ चीजें उनके जीवन को ट्रिगर कर सकते हैं। जैसे-

धूल, धुआं, ठंडी हवाएं और एक्सरसाइज आदि। अस्थमा रोगियों को धूल-मिट्टी से खांसी और सांस की दिक्कत हो सकती हैं। वहीं, धुआं गले और फेफड़ों में इरिटेशन का कारण बन सकता है। ठंडी हवाओं की वजह से सीने में जकड़न और सांस फूलना जैसा महसूस हो सकता है। इसलिए अस्थमा रोगियों के लिए इन चीजों से दूरी बनाए रखना बहुत जरूरी होता है। वैसे तो सामान्य व्यक्ति को भी धूल-मिट्टी और धुआं से दिक्कत हो सकती है, लेकिन आमतौर पर ये ज्यादा परेशान नहीं होते हैं।

अस्थमा का जोखिम ज्यादा किसे रहता है?

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अस्थमा रोग किसी को भी हो सकता है। लेकिन, कुछ लोगों में अस्थमा होने का खतरा ज्यादा रहता है। इसमें शामिल हैं-

  • बच्चे और बुजुर्ग: बच्चों और बुजुर्गों में अस्थमा का खतरा ज्यादा रहता है। दरअसल, बच्चों और बुजुर्गों की इम्यूनिटी कमजोर होती है। कमजो इम्यूनिटी वाले लोगों में अस्थमा का जोखिम ज्यादा बना रहता है।
  • धूम्रपान और प्रदूषण: जो लोग धूम्रपान करते हैं या प्रदूषित वातावरण में रहते हैं, उनमें भी अस्थमा का खतरा ज्यादा रहता है। धूम्रपान करने से वयस्कों में अस्थमा का जोखिम ज्यादा रहता है। यानी अस्थमा किसी भी उम्र और लिंग के लोगों को हो सकता है।

Disclaimer: अस्थमा रोगियों में फेफड़े सही तरीके से कार्य नहीं करते हैं। इसकी वजह से उन्हें खांसी, सांस लेने में तकलीफ और जकड़न जैसी समस्याएं होने लगती हैं। वहीं, स्वस्थ लोगों के फेफड़े सही कार्य करते हैं और उन्हें इन दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ता है। इसलिए अगर अस्थमा के लक्षण महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर के पास जाएं और जांच कराएं।

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