
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Medically Verified By: Dr Tushar Tayal
platelets
मानसून का मौसम अपने साथ बारिश की फुहारें और गर्मी से राहत तो लाता है, लेकिन इसी मौसम में मच्छरों और संक्रमणों से होने वाली कई बीमारियां तेजी से फैलती हैं। इम्यूनिटी वीक होने के कारण बच्चे, बड़े व बूढ़े सभी इन बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। डेंगू के अलावा मलेरिया, स्क्रब टायफस और लेप्टोस्पायरोसिस जैसी बीमारियों में प्लेटलेट्स कम होने की संभावना अधिक होती है।
लेकिन अगर हम समय-समय पर अपने प्लेटलेट्स की जांच करवाएं तो? इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने सीके बिरला हॉस्पिटल के एसोसिएट डायरेक्टर, इंटरनल मेडिसिन डॉ. तुषार तायल से बात की। उनका कहना है कि बारिश के मौसम में बुखार होने पर सीबीसी (Complete Blood Count) और प्लेटलेट्स की जांच करवाना बेहद जरूरी माना जाता है। लेकिन क्यों और शरीर में प्लेटलेट्स की रेंज कितनी होनी चाहिए, आइए इन विषयों पर डॉक्टर से विस्तार से जानते हैं।
प्लेटलेट्स हमारे खून में मौजूद बहुत छोटी रक्त कोशिकाएं होती हैं। इनका मुख्य काम शरीर में चोट लगने पर खून बहने को रोकना और थक्का जमाना है। अगर खून में इनकी संख्या बहुत कम हो जाए, तो शरीर के अंदरूनी हिस्सों से ब्लीडिंग (रक्तस्राव) होने का खतरा बढ़ जाता है।
एक हेल्दी इंसान के शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या लगभग 1.5 लाख से 4.5 लाख प्रति माइक्रोलीटर रक्त के बीच होती है। चिंता की बात तब होती है जब प्लेटलेट्स की संख्या 1.5 लाख से कम हो जाए। ऐसे में डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। उससे भी ज्यादा खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब प्लेटलेट्स 50,000 से नीचे चले जाएं। ऐसी स्थिति में मरीज को तुरंत मेडिकल मॉनीटरिंग की जरूरत पड़ सकती है। वहीं 10,000 से नीचे जाने पर गंभीर रक्तस्राव का खतरा काफी बढ़ जाता है।
डेंगू-डेंगू वायरस बोन मैरो (जहां प्लेटलेट्स बनते हैं) को प्रभावित कर सकता है। इससे नए प्लेटलेट्स कम बनते हैं और पुराने तेजी से नष्ट होने लगते हैं।
मलेरिया-मलेरिया में भी प्लेटलेट्स कम होना बहुत आम है। खासकर Plasmodium falciparum संक्रमण में थ्रोम्बोसाइटोपीनिया (platelet count कम होना) अक्सर देखा जाता है।
स्क्रब टायफस-यह एक बैक्टीरियल संक्रमण है जो झाड़ियों और घास वाले क्षेत्रों में पाए जाने वाले माइट्स से फैलता है। इसमें तेज बुखार के साथ प्लेटलेट्स कम हो सकते हैं और गंभीर मामलों में लीवर, किडनी और फेफड़ों पर असर पड़ सकता है।
लेप्टोस्पायरोसिस- बारिश के मौसम में दूषित पानी के संपर्क से फैलने वाला यह संक्रमण भी प्लेटलेट्स कम कर सकता है। इसके साथ पीलिया, किडनी की समस्या और मांसपेशियों में तेज दर्द हो सकता है।
अन्य वायरल संक्रमण- चिकनगुनिया और कई अन्य वायरल बुखारों में भी प्लेटलेट्स सामान्य से कम हो सकते हैं, हालांकि हर बार बहुत ज्यादा गिरना जरूरी नहीं होता।
अगर आपको मानसून में इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो इसे सामान्य वायरल बुखार समझकर नजरअंदाज न करें। जैसे-
ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और सीबीसी जांच करवाएं, जिससे प्लेटलेट्स और अन्य रक्त कोशिकाओं का सही स्तर पता चल सके। बिना डॉक्टर की सलाह के दर्द निवारक दवाएं न लें, क्योंकि ये कुछ संक्रमणों में ब्लीडिंग का खतरा बढ़ा सकती हैं।
खूब पानी पिएं- शरीर को हाइड्रेटेड रखना सबसे जरूरी है। पानी, नारियल पानी और ओआरएस (ORS) का घोल लेते रहें।
संतुलित आहार लें- हरी पत्तेदार सब्जियां, फल और पर्याप्त प्रोटीन वाला भोजन लें।
मच्छरों से बचें- घर के आसपास पानी जमा न होने दें, पूरी बांह के कपड़े पहनें और मॉस्किटो रिपेलेंट का इस्तेमाल करें।
बारिश के गंदे पानी से बचें- लेप्टोस्पायरोसिस जैसी बीमारियों का जोखिम कम होता है।
झाड़ियों और घास वाले क्षेत्रों में सावधानी रखें- स्क्रब टायफस से बचाव में मदद मिलती है।
डिस्क्लेमर: मानसून में प्लेटलेट्स कम होना केवल डेंगू का संकेत नहीं है। मलेरिया, स्क्रब टायफस, लेप्टोस्पायरोसिस और अन्य संक्रमण भी इसका कारण हो सकते हैं। इसलिए बुखार के साथ प्लेटलेट्स कम मिलने पर सही जांच और डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार कराना सबसे महत्वपूर्ण है।