
Also Read
Medically Verified By: Dr. Amit Malik
mental health Therapy
भारत ने मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बातचीत को सामान्य बनाने की दिशा में प्रगति की है। आज कई लोग एंग्जायटी, बर्नआउट, पैनिक अटैक और इमोशनल हेल्थ के बारे में खुलकर बात करते हैं, और थेरेपी को भी अब ज्यादा स्वीकार किया जाने लगा है। हालांकि, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल का एक महत्वपूर्ण पहलू अभी भी गलत समझा जाता है, और वह है साइकियाट्रिस्ट (मनोचिकित्सक) से सलाह लेना।
अमाह के सीईओ और को-फाउंडर डॉक्टर अमित मलिक के अनुसार “बढ़ती जागरूकता के बावजूद, कई लोग अभी भी साइकियाट्रिक देखभाल को इलाज का एक जरूरी हिस्सा मानने के बजाय आखिरी विकल्प के तौर पर देखते हैं। इस देरी की वजह से अक्सर लोगों को सही समय पर सही इलाज नहीं मिल पाता।” आइए डॉक्टर से विस्तार से जानते हैं कि लोग ऐसा क्यों सोचते हैं।
डॉक्टर कहते हैं कि हमारे क्लिनिक में अक्सर एक पैटर्न देखने को मिलता है। ऐसे कई मरीज पहली बार साइकियाट्रिस्ट से मिलने से पहले वर्षों तक थेरेपी ले चुके होते हैं। ऐसे लोग अक्सर-
थेरेपी से उन्हें निश्चित रूप से फायदा होता है, लेकिन कई मानसिक स्थितियों में सिर्फ थेरेपी काफी नहीं होती। साइकियाट्रिक असेसमेंट (जांच) और जब क्लिनिकली जरूरी हो, तब दवा भी इलाज के महत्वपूर्ण हिस्से होते हैं। अक्सर यही थेरेपी को अधिक प्रभावी और टिकाऊ बनाती है।
डॉक्टर बताते हैं कि जब तक कई लोग साइकियाट्रिस्ट के पास पहुंचते हैं, तब तक उन्हें लगता है कि ठीक न हो पाने के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं। जैसे- उन्होंने पर्याप्त कोशिश नहीं की, उनमें ठीक होने की इच्छाशक्ति की कमी थी या वह खुद थेरेपी में असफल रहे।
सबसे कठिन बातचीतों में से एक यह समझाना होता है कि यह कभी भी कोशिश की विफलता नहीं थी। अक्सर इलाज में कमी रह जाती है। ठीक होना सिर्फ कमिटमेंट पर निर्भर नहीं करता, बल्कि सही समय पर सही इलाज मिलने पर भी निर्भर करता है।
हालांकि थेरेपी को अब ज्यादा स्वीकार किया जाता है, लेकिन "साइकियाट्रिस्ट" शब्द को आज भी लोग अलग नजरिए से देखते हैं। इसकी वजह सिर्फ सोशल स्टिग्मा नहीं है, बल्कि सालों पुरानी गलतफहमियां और सांस्कृतिक मान्यताएं भी हैं।
पहले के समय में साइकियाट्री को मानसिक अस्पताल, गंभीर मानसिक बीमारी और जीवनभर चलने वाला डायग्नोसिस जैसी चीजों से जोड़कर देखा जाता रहा है। आज मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में काफी बदलाव आया है, लेकिन इन धारणाओं का असर अभी भी परिवारों पर दिखाई देता है।
कई बार जैसे ही साइकियाट्रिक देखभाल की बात होती है, माहौल बदल जाता है। लोग थेरेपी को "बात करने वाले व्यक्ति" के रूप में देखते हैं, जबकि साइकियाट्रिस्ट के पास जाना तब जरूरी मानते हैं जब स्थिति गंभीर हो जाए। दवा है सबसे बड़ा डर- पहली साइकियाट्रिक कंसल्टेशन के दौरान मरीजों की सबसे बड़ी चिंता दवाओं को लेकर होती है।
अक्सर वे पूछते हैं कि क्या मुझे हमेशा दवा लेनी पड़ेगी? क्या दवा मेरी पर्सनैलिटी (व्यक्तित्व) बदल देगी? क्या मुझे इसकी लत लग जाएगी? क्या मैं कभी इसे बंद कर पाऊंगा/पाऊंगी? ये डर अक्सर रिश्तेदारों, दोस्तों, इंटरनेट पर मौजूद गलत जानकारी और साइकियाट्रिक दवाओं से जुड़ी गलतफहमियों की वजह से पैदा होते हैं।
असल में साइकियाट्रिक दवाएं हमेशा के लिए नहीं दी जातीं। कई स्थितियों में इन्हें तय समय तक दिया जाता है, नियमित समीक्षा की जाती है, सुधार के अनुसार बदलाव किए जाते हैं और जब चिकित्सकीय रूप से उचित हो, तब इन्हें बंद भी किया जा सकता है। यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि दवा देना साइकियाट्रिक देखभाल का सिर्फ एक हिस्सा है।
साइकियाट्री सिर्फ दवा देने तक सीमित नहीं है। साइकियाट्रिस्ट की भूमिका केवल प्रिस्क्रिप्शन लिखने तक सीमित नहीं होती। साइकियाट्रिक देखभाल में ये बातें शामिल हैं-
सही डायग्नोसिस मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में साइकियाट्री के सबसे महत्वपूर्ण योगदानों में से एक है।
हालांकि साइकियाट्रिक इलाज को लेकर लोगों की चिंताएं समझी जा सकती हैं, लेकिन सही इलाज में देरी रिकवरी पर गंभीर असर डाल सकती है। कई मानसिक बीमारियां, जैसे-
इनकी जल्दी पहचान और समय पर इलाज होने पर बेहतर परिणाम मिलते हैं। लेकिन कई लोग तब साइकियाट्रिस्ट के पास पहुंचते हैं जब लक्षण घर पर संभालना मुश्किल हो जाते हैं।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अक्सर पूरे परिवार का सफर होती है। परिवार के सदस्य ही व्यवहार में बदलाव पहचान पाते हैं, प्रोफेशनल मदद लेने के लिए प्रेरित करते हैं, कंसल्टेशन का इंतजाम करते हैं, आर्थिक सहायता देते हैं और इलाज और रिकवरी के दौरान साथ देते हैं। हालांकि कई बार परिवार अनजाने में इलाज में देरी का कारण भी बन जाते हैं।
कई माता-पिता काउंसलिंग के लिए तो तैयार हो जाते हैं, लेकिन साइकियाट्रिक कंसल्टेशन की सलाह मिलने पर घबरा जाते हैं क्योंकि वे दवा को गंभीर बीमारी से जोड़कर देखते हैं। इसीलिए परिवारों को सही जानकारी देना भी बेहद जरूरी है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी विशेषज्ञ की राय पर आधारित है, लेकिन यह किसी भी तरह से पेशेवर चिकित्सीय सलाह, जांच या उपचार का विकल्प नहीं है। अगर आप मानसिक रूप से संघर्ष कर रहे हैं, तो मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक (साइकियाट्रिस्ट) से परामर्श लें।