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भारत में अभी भी कई बच्चे कैंसर अस्पताल देर से क्यों पहुंचते हैं? कैसे थोड़ी जागरूकता बच्चे की जान बचा सकती है

International Childhood Cancer Day: आपने देखा होगा कि भारत में बचपन से ही बच्चों में होने वाले कैंसर से मौतों के आंकड़े दिन ब दिन बढ़ते जा रहे हैं। लेकिन इसका क्या कारण है और लोगों को कैसे जागरूक कर सकते हैं, आइए विस्तार से जानते हैं।

भारत में अभी भी कई बच्चे कैंसर अस्पताल देर से क्यों पहुंचते हैं? कैसे थोड़ी जागरूकता बच्चे की जान बचा सकती है
VerifiedMedically Reviewed By: Dr. Santanu Sen

Written by Vidya Sharma |Updated : February 13, 2026 2:06 PM IST

Bachho Mai Cancer: भारत में हर साल हजारों मासूम बच्चे कैंसर की चपेट में आते हैं, लेकिन दुख की बात यह है कि इनमें से बहुत से बच्चे स्पेशलाइज्ड़ अस्पताल तब पहुंचते हैं जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। यह देरी एक आसान इलाज और एक लंबी, कठिन लड़ाई के बीच का बड़ा अंतर पैदा कर देती है। सच तो यह है कि बच्चों में होने वाले अधिकांश कैंसर का इलाज पूरी तरह मुमकिन है, बशर्ते उनकी पहचान समय रहते हो जाए। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर 'क्यों आज भी हमारे बच्चे सही समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पा रहे?'

कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल के बाल चिकित्सा हेमेटोलॉजिस्ट और ऑन्कोलॉजिस्ट डॉक्टर शांतनु सेन का कहना है कि

‘सबसे बड़ी बाधा है जानकारी की कमी। बच्चों में कैंसर के शुरुआती संकेत, जैसे बिना वजह बुखार, शरीर में गांठें, नीले निशान, लगातार दर्द या लंगड़ाकर चलना, अक्सर मामूली चोट या संक्रमण मान लिए जाते हैं। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और जहां शिक्षा का अभाव है, परिवार अक्सर 'रुको और देखो' की नीति अपनाते हैं या घरेलू नुस्खों में समय गंवा देते हैं, जिससे बीमारी बढ़ जाती है।’

शोध बताते हैं कि सही शिक्षा और जागरूकता ही वो ढाल है जो इन मासूमों को समय पर इलाज दिलाकर एक नई जिंदगी दे सकती है। इसलिए आइए हम डॉकटर से ही जानें कि आखिर लोगों को कैंसर के प्रति कैसे जागरूक किया जाए

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क्या है कैंसर से न लड़ पाने की सबसे बड़ी चुनौती?

डॉक्टर बताते हैं कि सबसे बड़ी चुनौती हमारे स्वास्थ्य तंत्र की विकास की आवश्यकता है | अक्सर स्थानीय डॉक्टर बच्चों में कैंसर के शुरुआती खतरे के संकेतों को पहचान नहीं पाते, जिससे इलाज की शुरुआत में कीमती समय बर्बाद हो जाता है। गलत पहचान, विशेषज्ञों के पास भेजने में देरी और बुनियादी जांचों (जैसे खून की जांच, इमेजिंग और बायोप्सी) की कमी इस समस्या को और बढ़ा देती है। शोध बताते हैं कि सिर्फ परिवारों की देरी नहीं, बल्कि अस्पतालों और सही व्यवस्था की कमी भी एक बड़ा कारण है।

दूसरी बड़ी चुनौती- इलाज की पहुंच और खर्च

दूसरी बड़ी चुनौती है इलाज की पहुंच और खर्च है। जी हां खुद डॉक्टर सेन कहते हैं कि भारत में बच्चों के कैंसर के बड़े अस्पताल ज्यादातर शहरों में ही हैं। ऐसे में गांव-देहात से आने वाले परिवारों के लिए सफर की दूरी, मजदूरी का नुकसान और रहने-खाने का भारी खर्च एक बड़ी दीवार बन जाता है।

आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी के कारण कई परिवार बीच में ही हिम्मत हार जाते हैं। भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की असलियत यह है कि बच्चों के कैंसर का सही इलाज हर जगह और हर अस्पताल में एक जैसा नहीं है, सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में मिलने वाली खास सुविधाओं में बहुत बड़ा अंतर है।

चाइल्ड कैंसर के प्रति लोगों को जागरूक करना क्यों जरूरी है?

सबसे बड़ा संकट है, हमारे मन का डर और सामाजिक झिझक। आज भी कई लोग कैंसर को एक 'मौत की सजा' मान लेते हैं। परिवारों को डर लगता है कि समाज उन्हें अलग-थलग कर देगा या इलाज का खर्च उन्हें बर्बाद कर देगा, यही डर उन्हें बीमारी छिपाने या इलाज में देरी करने पर मजबूर करता है। यही वजह है कि हमें खुलकर बात करने और कैंसर को मात देने वाले 'नन्हें विजेताओं' की दास्तां सुनाने की जरूरत है, ताकि दूसरों को भी हिम्मत मिल सके।

सवाल यह है कि जागरूकता जान कैसे बचाती है?

यह सिर्फ पोस्टरों या अभियानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वह समझ है जो पहली आहट मिलते ही हमें सही कदम उठाने की हिम्मत देती है। आइए आपको विस्तार से बताते हैं कि आप बच्चों के माता-पिता को कैंसर को लेकर कैसे जागरूक कर सकते हैं

परिवारों को सरल संदेशों से जागरूक करें: माता-पिता को उनकी अपनी भाषा में छोटे और स्पष्ट संदेश दें, जैसे ‘अगर आपके बच्चे को लगातार बुखार, शरीर में गांठें, नाक से खून आना या नीले निशान दिखें, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।’ यह छोटी सी सलाह सही समय पर इलाज शुरू करने में मदद कर सकती है।

डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षित करें: हमारे स्थानीय डॉक्टरों, नर्सों और आशा कार्यकर्ताओं को कैंसर के शुरुआती संकेतोंको पहचानने की खास ट्रेनिंग मिलनी चाहिए। क्लीनिकों में एक साधारण 'चेकलिस्ट' रखने से भी सही पहचान और इलाज में होने वाली देरी को कम किया जा सकता है।

स्कूलों और सामाजिक मंचों का उपयोग करें: स्कूल, आंगनवाड़ी और एनजीओ के माध्यम से इस बात को हर घर तक पहुंचाएं। जो बच्चे कैंसर को हरा चुके हैं, उनकी कहानियां दूसरों को हिम्मत देती हैं और यह बताती हैं कि कैंसर लाइलाज नहीं है।

आर्थिक और व्यावहारिक बाधाओं को दूर करें: सफर, रहने-खाने और इलाज के खर्च में सरकारी योजनाओं और एनजीओ के जरिए मदद मिलनी चाहिए। जब पैसे की चिंता कम होगी, तो कोई भी परिवार अपने बच्चे का इलाज बीच में नहीं छोड़ेगा।

एक डॉक्टर होने के नाते, मैंने अपनी आंखों से देखा है कि जब कैंसर की पहचान सही समय पर होती है, तो बच्चे कितनी अद्भुत तरीके से ठीक होकर मुस्कुराते हैं।

जागरूकता ही हमारी सुरक्षा की पहली ढाल है: यह बीमारी के लक्षणों और इलाज के बीच की दूरी को कम करती है, परिवारों का बोझ घटाती है और जीवन बचने की संभावना को कई गुना बढ़ा देती है। अगर आज हम सही जानकारी फैलाने, स्वास्थ्य कर्मियों को ट्रेनिंग देने और इलाज की राह आसान बनाने में निवेश करें, तो भारत का हर बच्चा समय पर अस्पताल पहुंच पाएगा और कैंसर को मात देकर एक नई ज़िंदगी जी सकेगा।

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Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।