भारत में बचपन का कैंसर देर से क्यों पता चलता है? क्या है इसके कारण और चुनौतियां?

साल- दर- साल भारत में बचपन के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके पीछे गलत खानपान, जेनेटिक्स, प्रदूषण जैसे कई कारक जिम्मेदार हैं। आइए जानते हैं भारत में बचपन के कैंसर के मामले तेजी से क्यों बढ़ रहे हैं।

WrittenBy

Written By: Ashu Kumar Das | Published : April 10, 2026 2:29 PM IST

WrittenBy

Medically Verified By: Dr. Vikas Dua

भारत में बचपन के कैंसर (Childhood Cancer) के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। बचपन के कैंसर का इलाज सही तरीके से मिल सके, इसके कई प्रकार की रिसर्च, Artificial Intelligence, इंजेक्शन को डेवलप किया जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा लगातार बचपन के कैंसर को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, इसके बावजूद हमारे देश में बचपन के कैंसर के मामले देरी से पहचान में आते हैं। फोर्टिस हॉस्पिटल के प्रिंसिपल डायरेक्टर एवं प्रमुख - पीडियाट्रिक हेमेटोलॉजी, हेमेटो- ऑन्कोलॉजी एवं बोन मैरो ट्रांसप्लांट डॉ. विकास दुआ का कहना है कि अगर बचपन के कैंसर का पता समय के साथ चल जाए, तो इसका इलाज पहले के मुकाबले काफी आसान हो जाता है।भारत में बढ़ते बचपन के कैंसर के मामलों को देखते हुए आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि बचपन के कैंसर का पता लगाने के कारण, भारत में बचपन का कैंसर क्यों चिंताजनक है और इसके इलाज में क्या-क्या चुनौतियां हैं।

भारत में बचपन का कैंसर देर से क्यों पता चलता है?

डॉक्टर का कहना है- "हमारे देश में बचपन के कैंसर के प्रति जागरूकता में कमी है। जिसके कारण बच्चों में कैंसर जैसी घातक बीमारी का पता स्टेज - 2 या 3 में चलता है। इतना ही नहीं, हमारे देश में आज भी लोग समय-समय पर मेडिकल जांच को फालतू का खर्च समझते हैं और इससे बचते हैं। जिसके कारण कैंसर और अन्य बीमारियों का बोझ अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।"

1. जानकारी की कमी

डॉक्टर बताते हैं कि बचपन के कैंसर के शुरुआती लक्षण अक्सर बहुत सामान्य होते हैं। इसलिए 10 में से 9 लोग बचपन के कैंसर जैसी बीमारी को नजरअंदाज कर देते हैं। बचपन के कैंसर के लक्षणों में शामिल हैः

  1. लगातार बुखार
  2. थकान
  3. वजन कम होना
  4. शरीर में सूजन

ये लक्षण आम बीमारियों जैसे वायरल या इंफेक्शन से मिलते-जुलते हैं, इसलिए माता-पिता अक्सर इन्हें गंभीरता से नहीं लेते है। इस प्रकार की बीमारी में अक्सर लोग घर पर दवाएं दे देते हैं। जिसकी वजह से बच्चों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता है और बचपन के कैंसर का पता आखिरी स्टेज में चलता है।

cancer भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है।

2. स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी

भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में अभी भी स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं। कई जगहों पर आधुनिक डायग्नोस्टिक मशीनें नहीं होतीं, विशेषज्ञ डॉक्टर (पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजिस्ट) की कमी है और कई अस्पताल रेफरल सिस्टम को काफी स्लो प्रोसेस करते हैं. इस वजह से बच्चे सही अस्पताल तक देर से पहुंचते हैं, जिससे इलाज में देरी हो जाती है।

3. आर्थिक तंगी

भारत में कई परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं। बच्चे के बार- बार बीमार पड़ने पर बार-बार डॉक्टर के पास जाना, महंगे टेस्ट कराना और लंबा इलाज करवाना ये सब खर्चे बहुत ज्यादा होते हैं। कई बार परिवार पैसे की कमी के कारण इलाज टाल देते हैं या बीच में ही छोड़ देते हैं, जिससे बीमारी गंभीर हो जाती है।

4. जागरूकता की कमी

बहुत से माता-पिता को यह पता ही नहीं होता कि बच्चों में भी कैंसर हो सकता है। उनमें लक्षणों की जानकारी का अभाव, समय पर जांच न करवाना और घरेलू इलाज पर ज्यादा भरोसा करना। ये सभी बातें देर से बीमारी का पता चलने का कारण बनती हैं।

5. सामाजिक दबाव

भारत में कई जगहों पर आज भी लोग पहले घरेलू या पारंपरिक इलाज अपनाते हैं। कैंसर को लेकर डर और गलतफहमियां होती हैं। ऐसे में लोग बीमारी के प्रति जागरूक होने की बजाय उसे छिपाने लगते हैं। कई लोग कैंसर जैसी बीमारी को छुआ- छूत समझ कर भी मरीज से दूर भागते हैं। इन कारणों से सही इलाज शुरू होने में देरी होती है।

कैंसर का शब्द सुनते ही लोग इसे आर्थिक परेशानी समझ लेते हैं। कैंसर का शब्द सुनते ही लोग इसे आर्थिक परेशानी समझ लेते हैं।

बचपन के कैंसर को लेकर क्या हैं चुनौतियां?

डॉक्टर बताते हैं कि भारत की हेल्थकेयर सिस्टम में कुछ संरचनात्मक चुनौतियां भी हैं। जिसके कारण भी बचपन के कैंसर का पता काफी देरी से चलता है। बचपन के कैंसर की चुनौतियों में शामिल हैं-

  1. पर्याप्त स्क्रीनिंग प्रोग्राम का अभाव
  2. विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी
  3. कैंसर सेंटर का असमान वितरण
  4. अस्पतालों में भीड़ और लंबी लाइनें

क्या बचपन के कैंसर का इलाज हो सकता है?

इस सवाल का सीधा जवाब है हां। अगर बचपन के कैंसर का पता सही समय पर चल जाए, तो इसका इलाज हो सकता है।

डॉक्टर के साथ बातचीत के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि भारत में बचपन के कैंसर की देर से पहचान एक जटिल समस्या है, जिसमें जागरूकता की कमी, आर्थिक चुनौतियां, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और सामाजिक मान्यताएं सभी शामिल हैं।

अस्वीकरण: प्रिय पाठकों यह आर्ट‍िकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।

FAQs

बचपन में सबसे आम कैंसर कौन सा है?

बचपन में सबसे आम कैंसर ल्यूकेमिया (Leukemia - रक्त कैंसर) है, जो बच्चों में होने वाले सभी कैंसरों का लगभग 30% हिस्सा है। इसमें एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (ALL) सबसे अधिक पाया जाता है। इसके बाद दूसरे स्थान पर मस्तिष्क (Brain) और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के ट्यूमर होते हैं।

क्या एआई कैंसर के इलाज पर काम कर रहा है?

इसका उत्तर है नहीं । लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता कैंसर का पता लगाने, निदान करने और उपचार करने के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव ला रही है।

क्या पेट का कैंसर पूरी तरह ठीक हो सकता है?

अगर शुरुआती स्टेज में पेट के कैंसर का इलाज शुरू किया जाए, तो इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।

Add The Health Site as a Preferred Source Add The Health Site as a Preferred Source