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Medically Verified By: Dr. Aashish Chaudhry
घुटनों में दर्द की समस्या
आजकल बड़े-बूढ़ों को तो छोड़िए, युवा भी घुटनों के दर्द से परेशान रहने लगे हैं। कुछ समय पहले तक, घुटनों का दर्द ज्यादा उम्र बढ़ने से जुड़ी समस्या माना जाता था। आज पूरे भारत में ऑर्थोपेडिक क्लीनिकों में 20 से 30 वर्ष की उम्र के ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ रही है जो सीढ़ियां चढ़ते समय दर्द, घंटों बैठे रहने के बाद बेचैनी, घुटने से चटकने की आवाज या वर्कआउट के दौरान परेशानी की शिकायत लेकर आते हैं।
हमने इसका कारण जानने के लिए आकाश हेल्थकेयर के ऑर्थोपेडिक डॉक्टर आशीष चौधरी से बात की। उन्होंने बताया कि यह ट्रेंड अब सिर्फ सुनी-सुनाई बात नहीं रह गया है। यह युवा भारतीयों के रहने, काम करने और एक्सरसाइज करने के तरीकों में में आए बदलाव को दिखाता है। यह केस क्यों बढ़ रहे हैं, आइए हम इस विषय पर विस्तार से जानते हैं।
डॉक्टर बताते हैं कि सबसे आम प्रतिक्रिया जिम को दोष देना होता है। हालांकि, सच तो यह है कि जिम समस्या का सिर्फ एक हिस्सा है। मुख्य समस्या को डॉक्टर "इनएक्टिव-एक्टिव" (निष्क्रिय-सक्रिय) लाइफस्टाइल कह सकते हैं। युवा प्रोफेशनल आमतौर पर डेस्कटॉप पर काम करने और घर लौटने के लिए गाड़ी चलाने में लगभग 8-10 घंटे बिताते हैं।
वे उम्मीद करते हैं कि काम से निकलने के बाद उनका शरीर सही फ्लेक्सिबिलिटी वर्कआउट कर पाएगा और मैराथन के लिए भी ट्रेनिंग करेगा। असल बात यह है कि जोड़ ट्रेनिंग सेशन के दौरान पड़ने वाले लगातार बोझ के आदी नहीं होते, जिससे चोटें लगती हैं। मांसपेशियों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
घुटने में खुद कोई मांसपेशी नहीं होती, यह सभी गतिविधियों के दौरान भार को सही ढंग से बांटने के लिए मजबूत क्वाड्रिसेप्स, हैमस्ट्रिंग, ग्लूटियस मांसपेशियों और कोर मांसपेशियों की स्थिरता पर निर्भर करता है। अगर लगातार बैठे रहने के कारण पैरों की ये मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं, तो घुटने पर ज्यादा बोझ पड़ता है।
शरीर का बढ़ा हुआ वजन रोजमर्रा की गतिविधियों के दौरान घुटनों पर पड़ने वाले मैकेनिकल लोड को बढ़ा सकता है। भारत में युवा वयस्कों में ज्यादा वजन और मोटापे में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है, जिसका मतलब है कि पिछली पीढ़ियों की तुलना में उनके घुटने कम उम्र में ही ज्यादा मैकेनिकल बोझ उठा रहे हैं। वजन में थोड़ी सी भी कमी जोड़ पर पड़ने वाले तनाव को काफी हद तक कम कर सकती है।
ऑर्थोपेडिक सर्जन ऐसे मरीजों की बढ़ती संख्या की रिपोर्ट कर रहे हैं जो बिना सही कंडीशनिंग या देखरेख के डीप स्क्वैट्स, हेवी लंज, बॉक्स जंप या लंबी दूरी की दौड़ जैसी गतिविधियां करते हैं। समस्या शायद ही कभी एक्सरसाइज खुद होती है। समस्या गलत तकनीक, बहुत ज्यादा तीव्रता, अपर्याप्त रिकवरी और बहुत तेजी से आगे बढ़ने की कोशिश में होती है। अगर बार-बार होने वाली छोटी-मोटी चोटों को नजरअंदाज किया जाए, तो आगे चलकर कार्टिलेज को जल्दी नुकसान पहुंच सकता है।
अपार्टमेंट बिल्डिंग में बार-बार सीढ़ियां चढ़ना, लंबे समय तक दो-पहिया वाहन चलाना, लंबे समय तक पालथी मारकर बैठना और रोजमर्रा के कामों में बार-बार उकड़ू बैठना, पहले से ही कमजोर घुटनों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। अकेले-अकेले ये चीजें शायद नुकसान न पहुंचाएं, लेकिन मिलकर ये पहले से मौजूद किसी समस्या को और बढ़ा सकती हैं।
असल में, घुटने के मरीजों में चोटें और कई तरह की समस्याएं आम हैं, जैसे घुटने का दर्द, टेंडन की चोट, लिगामेंट की चोट, घुटने के कार्टिलेज की चोट, मांसपेशियों का असंतुलन और इनसे जुड़ी अन्य समस्याएं। लगातार होने वाले दर्द को सिर्फ कमजोरी कहकर या लगातार पेनकिलर देकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। शुरुआती दौर में ही डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर फिजियोथेरेपी के जरिए सही इलाज किया जा सके।
अच्छी बात यह है कि घुटने की ज्यादातर शुरुआती समस्याओं से बचा जा सकता है। घुटने की समस्याओं से बचने के लिए, ऑफिस में सही तरह से हिलना-डुलना और नियमित रूप से फिजिकल एक्टिविटी करना। हिलने-डुलने के अलावा, सही स्तर की फिजिकल एक्टिविटी चुनना और जीवन भर उसे जारी रखना, अच्छे जूते पहनना और शरीर को पर्याप्त आराम देना भी जरूरी है।
यह सोचना कि 40 साल से कम उम्र के लोगों में जोड़ों का दर्द, खासकर घुटनों का दर्द इसलिए आम हो रहा है या ॉ सिर्फ उम्र बढ़ने के कारण हो रहा है, बिल्कुल बेतुका लगता है। घुटने के दर्द का असली कारण आधुनिक जीवनशैली है, जो जोड़ों पर बहुत ज्यादा दबाव डालती है और जिनका ठीक से ध्यान नहीं रखा जाता।