
मुकेश शर्मा
मुकेश शर्मा दिल्ली यूनिर्विसिटी से जर्नलिज्म डिग्री होल्डर हैं और पिछले 8 साल से Health Journalism से जुड़े हुए ... Read More
Written By: Mukesh Sharma | Published : May 18, 2026 9:54 AM IST
Medically Verified By: Dr. Hemant H R
एक समय था जब एंटीबायोटिक दवाएं लगभग हर आम संक्रमण का असरदार इलाज मानी जाती थीं। ज्यादातर प्रकार के बैक्टीरियल इन्फेक्शन जैसे निमोनिया, यूरिन इन्फेक्शन या फिर सर्जरी के बाद होने वाले संक्रमण कुछ दिनों की दवा से ठीक हो जाते थे। लेकिन अब स्थिति तेजी से बदल रही है। कई संक्रमण ऐसे हो रहे हैं जिन पर दवाओं का असर कम होता जा रहा है। इसे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (ए.एम.आर) कहते हैं। ए.एम.आर का मतलब है कि बैक्टीरिया या दूसरे रोग पैदा करने वाले जीवाणु दवाओं के खिलाफ मजबूत हो जाते हैं और एंटीबायोटिक दवाएं उन पर असर करना बंद कर देती हैं और उसी समस्या का इलाज करने के लिए एंटीबायोटिक की पहले से ज्यादा स्ट्रॉन्ग खुराक देनी पड़ती है। इस लेख में हेल्थ एक्सपर्ट्स इस बढ़ती समस्या से निपटने के बारे में कुछ खास जानकारियां देंगे।
एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस तब होता है जब बैक्टीरिया, वायरस, फंगस या परजीवी उन दवाओं के प्रति प्रतिक्रिया देना बंद कर देते हैं, जो पहले उन पर असर करती थीं। इसका परिणाम यह होता है कि संक्रमण लंबे समय तक बना रहता है, इलाज अधिक जटिल हो जाता है और मरीज की रिकवरी में ज्यादा समय लगने लगता है और साथ ही उसे लंबे समय तक एंटीबायोटिक लेनी पड़ती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू.एच.ओ) के अनुसार, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस साल 2019 में सीधे तौर पर लगभग 12.7 लाख मौतों के लिए जिम्मेदार था, जबकि करीब 49.5 लाख मौतों से इसका संबंध पाया गया।
हाल ही में डब्लू.एच.ओ की ग्लोबल एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस सर्विलांस रिपोर्ट में भी ब्लड स्ट्रीम इंफेक्शन और यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन में बढ़ते रेजिस्टेंस ट्रेंड्स की ओर संकेत किया गया है। यह आंकड़े लगभग 100 देशों से जुटाए गए थे।
भारत में आजकल लोग इंटरनेट पर देखकर खुद ही मेडिकल स्टोर पर जाकर दवाएं ले लेते हैं और डॉक्टर से उस बारे पूछना जरूरी ही नहीं समझते हैं। यही कारण है कि भारत में भी एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस को लेकर चिंता और भी गंभीर होती जा रही है। सेल्फ-मेडिकेशन, मेडिकल स्टोर पर आसानी से दवाओं की उपलब्धता, संक्रमण नियंत्रण की कमजोर व्यवस्था और जांच में देरी जैसी कई वजहें इस समस्या को बढ़ा रही हैं।
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) भी अब अपने सर्विलांस नेटवर्क के जरिए एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस की लगातार निगरानी कर रहा है। खास तौर पर ई-कोलाई (E. coli) जैसे रेसिस्टेंट बैक्टीरिया पर फोकस किया जा रहा है, जो सेप्सिस, निमोनिया, यूरिन संक्रमण और अस्पतालों में होने वाले गंभीर संक्रमणों से जुड़े होते हैं।
डॉ. सूफी रूमी, मेडिकल स्पोक्सपर्सन, जॉली हेल्थकेयर कहते हैं पोस्ट-एंटीबायोटिक युग अब दूर की बात नहीं रह गई है, बल्कि यह रोजमर्रा की क्लीनिकल प्रैक्टिस में साफ दिखाई देने लगा है। जिन संक्रमणों का इलाज पहले आसानी से हो जाता था, अब उनके लिए ज्यादा मजबूत एंटीबायोटिक और सटीक जांच की जरूरत पड़ रही है। इस चुनौती से निपटने के लिए सही डायग्नोसिस, एंटीबायोटिक का विवेकपूर्ण इस्तेमाल और हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स के बीच जागरूकता बेहद जरूरी है। भारत को अनुमान के आधार पर बार-बार एंटीबायोटिक देने की बजाय एविडेंस-बेस्ड ट्रीटमेंट की ओर बढ़ना होगा।
डॉ. हेमंत एच. आर, सीनियर कंसल्टेंट एवं हेड- क्रिटिकल केयर मेडिसिन, स्पर्श हॉस्पिटल, इन्फेंट्री रोड़, बेंगलुरु ने कहा, एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस सीधे तौर पर मरीजों की सुरक्षा को प्रभावित करता है। रेजिस्टेंट संक्रमण सामान्य रिकवरी को भी लंबे हॉस्पिटलाइजेशन में बदल सकता है, खासकर बुजुर्गों, आईसीयू पेशेंट्स, सर्जरी के बाद भर्ती लोगों और पहले से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों में यह देखा जा रहा है। अस्पतालों को संक्रमण रोकथाम, हैंड हाइजीन, एंटीबायोटिक स्टीवार्डशिप और कल्चर-बेस्ड ट्रीटमेंट को मजबूत करना होगा। वहीं मरीजों के स्तर पर भी सेल्फ-मेडिकेशन से बचना और एंटीबायोटिक का कोर्स बीच में न छोड़ना बेहद जरूरी है। आज इस्तेमाल की गई हर गैर-जरूरी एंटीबायोटिक भविष्य के इलाज के विकल्प कम कर सकती है।
डिसक्लेमर: इस लेख का उद्देश्य केवल एंटीबायोटिक के इस्तेमाल और उनका स्वास्थ्य पर असर से जुड़ी सही जानकारी देना है और इसमें दी गई किसी भी जानकारी का इस्तेमाल किसी भी बीमारी के इलाज के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। इसके लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।