
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Written By: Vidya Sharma | Updated : May 29, 2026 10:00 AM IST
Medically Verified By: Dr. Kapil Jain
Image Credit- ChatGPT
कई बार लोग पेशाब न आने पर खूब पानी पीते हैं, उन्हें लगता है कि शायद यह कम पानी पीने की वजह से हो रहा हो। ऐसा ही कुछ 77 साल के मरीज राकेश कुमार (बदला हुआ नाम) के साथ भी हुआ। उन्हें लंबे समय से पेशाब नहीं आ रही थी और अगर आ भी रही थी तो रुक-रुककर या भी बहुत ही कम आ रही थी। समस्या अधिक बढ़ने पर वह RG हॉस्पिटल्स गए, जहां यूरोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट डॉक्टर कपिल जैन की निगरानी में उनकी सर्जरी संभव हो पाई।
एडवांस्ड मिनी-HOLEP (MiLEP) तकनीक का उपयोग करके राकेश कुमार के बढ़े हुए प्रोस्टेट का इलाज किया गया। इस सर्जरी के दौरान डॉक्टर व मरीज को क्या परेशानी हुई? मिनी-HOLEP तकनीक क्या होती है? और बहुत से सवाल हमने डॉक्टर कपिल से पूछे, ताकि आपके मन में आने वाले हर सवाल का जवाब आपको मिल पाए। आइए पहले हम राजेश की केस स्टडी के बारे में विस्तार से जानते हैं।
डॉक्टर बताते हैं कि “मरीज को लंबे समय से पेशाब करने में दिक्कत हो रही थी और उसे बार-बार पेशाब रुकने की समस्या हो रही थी। इस समस्या की वजह से उसके रोजमर्रा के जीवन पर बहुत बुरा असर पड़ रहा था। वह अपनी बताई गई दवाएं भी नियमित रूप से नहीं ले रहा था, लेकिन फिर भी परेशानी का हल नहीं हो पा रहा था।”
डॉक्टर आगे बताते हुए कहते हैं कि “शुरुआती अल्ट्रासाउंड जांच से पता चला कि उसे यूरिनरी ब्लैडर में क्रोनिक सूजन, यानी कि सिस्टाइटिस है, और लगभग 300 cc का बहुत बड़ा प्रोस्टेट है। इसमें बीच वाला हिस्सा (जिसे मीडियन लोब कहा जाता है) काफी ज्यादा बढ़ा हुआ था। उसमें प्रोस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन (PSA) का स्तर भी काफी बढ़ा हुआ था। इसका बढ़ा हुआ स्तर प्रोस्टेट के बढ़ने का संकेत होता है। बाद में TRUS-गाइडेड बायोप्सी से बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया (BPH) के साथ-साथ क्रोनिक प्रोस्टेटाइटिस की पुष्टि हुई और कोई कैंसर नहीं पाया गया।"
ऑपरेशन से पहले अच्छी तरह से जांच के बाद मरीज को सर्जरी के लिए फिट पाया गया। हालांकि उसे हाइपोथायरायडिज्म और अर्थराइटिस जैसी बीमारियां थीं, लेकिन ये दोनों ही नियंत्रण में थीं। इसके बाद उसके लिए 'मिनी-HOLEP' सर्जरी की योजना बनाई गई। सर्जरी के दौरान डॉक्टरों ने पाया कि मूत्र मार्ग तो सामान्य था, लेकिन प्रोस्टेट का आकार काफी बढ़ गया था। साथ ही मूत्राशय में ऐसे बदलाव भी दिखे जो आमतौर पर तब नजर आते हैं, जब लंबे समय से पेशाब करने में तकलीफ हो रही हो। यह सर्जरी 22 Fr एंडोस्कोप और होल्मियम लेजर का उपयोग करके बहुत ही कम चीरफाड़ तरीके से हुई। इससे बढ़े हुए प्रोस्टेट टिश्यू को पूरी तरह से हटाया जा सका।
आइए, अब हम RG हॉस्पिटल्स के यूरोलॉजी कंसलटेंट डॉ. कपिल जैन से इस सर्जरी से जुड़े कुछ आम सवाल पूछें, तो सभी को पता होने चाहिए-
मरीज का 300 cc का प्रोस्टेट निकला था। इस मामले में जो बात सबसे अलग थी, वह मरीज की रिकवरी और उसके पूरे इलाज का रिजल्ट था। ट्रेडिशनल ट्रीटमेंट में जहां अक्सर कैथीटेराइजेशन और हॉस्पिटल में रुकने का समय ज्यादा होता है। वहीं 'मिनी-HOLEP' सर्जरी के जरिए मरीज का कैथेटर दूसरे ही दिन निकाल दिया गया और उसे उसी दिन छुट्टी भी दे दी गई। इस तरह उसे हॉस्पिटल में कुल मिलाकर सिर्फ दो दिन ही रुकना पड़ा।
इसकी वजह से वह उम्मीद से कहीं ज्यादा जल्दी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट पाया। फॉलो-अप के दौरान मरीज ने बताया कि उसके यूरीन के फ्लो में क्लीयर रिजल्ट देखने को मिला है, पेशाब पर नियंत्रण रखने में कोई दिक्कत नहीं है, और उसका ब्लैडर भी पूरी तरह से खाली हो रहा है।
इसमें बार-बार पेशाब आना, रात में कई बार पेशाब जाना, पेशाब आने में समय लगना, पेशाब का फ्लो कम होना व पेशाब के बाद भी ब्लैडर पूरी तरह खाली न होने जैसा फील होना आदि बढ़े हुए प्रोस्टेट के लक्षण हो सकते हैं। कुछ मरीज अचानक पेशाब रुक जाने की समस्या भी फेस करते हैं। अगर लंबे समय तक इन लक्षणों को अनदेखा किया जाए तो ब्लैडर पर दबाव बढ़ जाता है और स्थिति गंभीर हो जाती है।
राजेश की सर्जरी के दौरान पेशाब में कंट्रोल रखने का खास ध्यान रखा गया था। खासकर उन क्षेत्रों के आसपास काम करते समय यह कंट्रोल बहुत जरूरी था, जो संवेदनशील हैं। बता दें कि प्रोस्टेट के एपिकल एरिया के आसपास काम करते समय अत्यधिक सावधानी और सर्जिकल सटीकता की जरूरत होती है क्योंकि यही हिस्सा यूरिन कंट्रोल मैकेनिज्म के बेहद करीब होता है। अगर इस एरिया से टिश्यू हट जाए तो दुर्लभ मामलों में स्थायी यूरिन लीकेज की समस्या हो सकती है।
इस केस में हमारे लिए सबसे बड़ा चैलेंज उनकी उम्र था, और फिर इस उम्र में प्रोस्टेट का इतना बढ़ा हुआ साइज। मरीज को पहले से हाइपोथायरायडिज्म और अर्थराइटिस जैसी बीमारियां थीं, इसलिए एनेस्थीसिया और पोस्ट-ऑपरेटिव रिकवरी को लेकर सतर्कता जरूरी थी।
इसके अलावा 300cc का प्रोस्टेट तकनीकी रूप से बेहद जटिल माना जाता है क्योंकि इसमें ब्लीडिंग, लंबे ऑपरेशन समय और यूरिन कंट्रोल को सुरक्षित रखने जैसे चैलेंज भी बढ़ जाते हैं। इसलिए हमने और हमारी टीम ने प्री-ऑपरेटिव एवोल्यूशन, कंट्रोल्ड लेजर तकनीक और सावधानीपूर्वक सर्जिकल प्लानिंग के जरिए इन सभी चुनौतियों को सफलतापूर्वक मैनेज किया।
हमने राजेस के भी कुछ टेस्ट करवाएं और पाया कि उन्हें कैंसर नहीं है। देखें, PSA लेवल बढ़ना हमेशा कैंसर का संकेत नहीं होता। यह BPH, प्रोस्टेटाइटिस या इंफेक्शन के कारण भी बढ़ सकता है। हम पहले मरीज के लक्षणों और मेडिकल हिस्ट्री का मूल्यांकन करते हैं। इसके बाद डिजिटल रेक्टल एग्जामिनेशन, अल्ट्रासाउंड, TRUS (Transrectal Ultrasound) और जरूरत पड़ने पर MRI जैसी जांचें की जाती हैं।
अगर कैंसर की आशंका बनी रहती है, तो TRUS-guided बायोप्सी की जाती है, जिसमें प्रोस्टेट टिश्यू का सैंपल लेकर उसकी जांच की जाती है। यही जांच बताती है कि मरीज को कैंसर है या सिर्फ शुरुआती प्रोसेटेटिक हाईपरप्लासिया।
डिस्क्लेमर: प्रोस्टेट का बढ़ा आपको यूरीनेशन में परेशानी पैदा कर सकता है। 77 साल के राजेश की तरह आप संकेतों की पहचान देरी से न करें, बल्कि समय-समय पर जांच करवाते रहें। अगर आपको भी पेशाब के दौरान रुकावट या अन्य कोई दिक्कत हो रही है तो डॉक्टर से परामर्श लें।