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Written By: Editorial Team | Published : November 21, 2017 12:34 PM IST
कई ऐसे देश हैं जहां इलाज के मामले में दूसरी राय यानि दूसरे डॉक्टर की राय लेना जरूरी समझते हैं, खासकर कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियों के मामले में। वहां खुद डॉक्टर इस बात की राय देते हैं और इसे मानना या नहीं मानना मरीज पर निर्भर होता है। लेकिन भारत में दूसरी राय के लिए कोई स्पष्ट नियम नहीं है। यहां तो इलाज के लिए मरीज को रूम ही मिल जाए, उतना हि काफी होता है। खैर, डॉक्टर और मरीज का रिश्ता विश्वास पर आधारित है और विश्वास की कमी के कारण डॉक्टर उसे दूसरी राय के लिए कह सकता है।
बेशक आपने गूगल पर उस बीमारी के बारे में बहुत कुछ पढ़ा है और आप काफी जानते हैं। लेकिन आपको बता दें कि जब आप इस ज्ञान को डॉक्टर के सामने रखने लगते हैं, तो वो उसे पसंद नहीं करते हैं।
वास्तव में देश में स्वास्थ्य सेवा प्रणाली बहुत लचर है। कई बार जहां आप उपचार करा रहे होते हैं, उनके पास कुछ रिकॉर्ड ही नहीं रहता है जिससे आपको दूसरी राय लेने में परेशानी हो सकती है। ऐसे में डॉक्टर आपको बार-बार एक ही टेस्ट कराने के लिए कह सकते हैं जिससे आपका काफी पैसा खर्च होता है। उदाहरण के लिए डेंटिस्ट आपको इस आधार पर कि डेंटल एक्स-रे साफ नहीं आया है आपको दूसरी बार भी कराने को कहा जा सकता है जबकि आपने पहले ही करा रखा है। इस मामले में आपके लिए दूसरी राय लेने का विकल्प व्यवहार्य नहीं लगता है। भारत में अधिकतर लोग ऐसे जान पहचान या किसी जान पहचान द्वारा बताए गए डॉक्टर के पास ही इलाज कराने जाते हैं। ऐसे में कुछ डॉक्टर आपकी हिस्ट्री को अच्छी तरह जानते हैं या आपको जबरदस्ती उन पर भरोसा करना पड़ता है। जाहिर है आप ऐसे डॉक्टर से अपना इलाज करा रहे हैं जो आपकी पुरानी पीढ़ी का इलाज किया करते थे। अब आप खुद ही सोचिए आपके माता-पिता की पीढ़ी के मरीज़ों को ब्रांडेड दवा और एक जेनेरिक दवाओं के बीच का अंतर नहीं पता है और आप आंख बंद करके उनकी सलाह को मान रहे हैं।
स्वास्थ्य के मामले में लोगों का दृष्टिकोण भी बदल रहा है क्योंकि अब ज्यादातर मरीज अपनी बीमारी के लक्षणों को जानते हैं बल्कि ऑनलाइन पोर्टल पर चिकित्सा सलाह भी मांगते हैं। आज के समय में, ऐसे कुछ डॉक्टर हैं जो अपने मरीज़ों को ऑनलाइन जानकारी को क्रॉस-चेक करने की सलाह भी देते हैं लेकिन सही जानकारी जुटाने की सलाह देते हैं। इस परिदृश्य में डॉक्टर को दूसरी राय देने से बचना चाहिए क्योंकि पहली राय भी तो किसी एक्सपर्ट ने ही दी है।
ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉक्टर प्रदीप चंद्रमाओ के अनुसार, भारत में घुटने यानि 'नी रिप्लेसमेंट सर्जरी' लगभग फैशनेबल हो गई है। उनके अनुसार आपको इससे तब तक बचना चाहिए, जब तक कि यह जरूरी न हो। यहां यह बात समझ आती है कि सर्जरी कराने से पहले आप दूसरी राय ले सकते हैं।
कई बार ऐसी स्थिति होती है जब आपको दूसरी राय के ही नहीं डॉक्टर बदलने का भी फैसला लेना पड़ता है। यानि जब लक्षण काफी गंभीर होने लगते हैं और आपको दवाओं से भी कोई असर नहीं हो रहा होता है। कई बार डॉक्टर सही होता है लेकिन इलाज के बारे में स्पष्टीकरण देने में सक्षम या तैयार नहीं होता है। इसलिए आपके लिए क्रोस चेक करना ही बहार विकल्प होता है। उदहारण के लिए कई बार एक्स-रे या एमआरआई के जरिये आपको कोई बड़ा जोखिम प्रकट हो सकता है। लेकिन उसका इलाज कराना जरूरी है या नहीं यह सलाह आपको डॉक्टर ही दे सकता है। जाहिर है इसकी पुष्टि करने के लिए आप कई डॉक्टर की सलाह ले सकते हैं। खैर इन मामलों में दूसरी राय की जरूरत पड़ सकती है।
बीमारी और उसके बढ़ने पर पुष्टिकरण लेने के लिए
कभी-कभी बीमारी को लेकर डॉक्टर की राय से स्पष्ट नहीं होता है और वो इस बात को लेकर सहमत नहीं होता है कि बीमारी बढ़ सकती है। ऐसे मामले में आप तीसरी राय ले सकते हैं ताकि आपको सही मार्गदर्शन मिल सके।
विभिन्न विशेषज्ञों के दृष्टिकोण से रोग को और अधिक जानने के लिए
हालांकि ऐसा इमरजेंसी में लागू नहीं होता है। बेशक आप डायबिटीज जैसी स्थिति में ऐसा कर सकते हैं। अगर आप डायबेटोलॉजिस्ट के पास जा रहे हैं, तो आपको अभी भी डायबिटिक फूट या नेफ्रोलॉजिस्ट में स्पेशलिस्ट की जरूरत है।
लेटेस्ट ट्रीटमेंट ऑप्शन के लिए
डेंटिस्ट्री से लेकर यूरोलॉजी तक के लिए कई सारे उपचार विकल्प हैं। संभव है आप जिस क्लिनिक या हॉस्पिटल में इलाज करा रहे हैं, वहां यह उपचार उपलब्ध ना हो।
सस्ते या चैरिटेबल इलाज के लिए
जब आप सस्ती दवाइयों या फिजियोथेरेपिस्ट के पास जाने की सोच रहे हों। जैसे टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल कैंसर के इलाज का एक सस्ता विकल्प बन गया है। ऐसे ही कई सार स्थानीय अस्पताल और ट्रस्ट हैं जो बहुत कम शुल्क में उपचार प्रदान करते हैं।
अल्टरनेटिव ट्रीटमेंट
कुछ डॉक्टर एलोपैथिक थेरेपी के साथ आयुर्वेद या हर्बल उपचार जैसे कई वैकल्पिक उपचारों की सलाह भी देते हैं।
रोगी के देखभाल के विकल्पों के लिए
आपके डॉक्टर को आपके एरिया के होम-नर्स या अटेंडेंट के बारे में नहीं पता है। कुछ मामलों में मरीजों की घर पर देखभाल नहीं हो पाती है, ऐसे मामले में आप एक बेहतर सेंटर के लिए कह सकते हैं जो कि आपके घर के पास हो।
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अनुवादक – Usman Khan
चित्र स्रोत - Shutterstock
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